शबनम मौसी
"हमारे नेता इस देश की राजनीति को हिजड़ा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं तो क्या आप किसी हिजङे को अपना नेता नहीं चुन सकते? "
पिछले दिनों जब इस छोटे लेकिन विलक्षण "बुध्दू बक्से" यानी टेलीविजन पर एक कार्यक्रम देखा तो मेरा मन द्रवित हो उठा. एक ऐसे व्यक्तित्व के जीवन के दर्द को समझने का एहसास ही काफ़ी नहीं! हमें उसे स्वीकार भी करना होगा.क्योंकि वो समाज का अभिशाप बन चुके "मगंलामुखी" यानी हमारी भाषा में "हिजड़ा" हैआज से तकरीबन पांच-छः साल पहले मध्यप्रदेश के सुहागपुर के छोटे से सम्भाग "शाहदल" (Shadol) से चुनाव जीतकर इस साधारण किन्तु गजब के जीवट मगंलामुखी "शबनम मौसी" ने जब राजनीति में कदम रखा तो कुछ आश्चर्य हुआ! लेकिन आज जब शाहदल की उन्नति देखकर लगता है कि शायद हमारी सोच गलत हो सकती है लेकिन अगर कोई इस सोच को ही बदल दे तो क्या आश्चर्य?
लड्खडाती राजनीति में अगर कोई बैसाखी बनकर इस देश की सेवा करे तो हमें उसे तिरस्कार की नहीं गर्व की भावना से सम्मान देना चाहिये, बकौल शबनम मौसी "मैं कोई वेश्या, भिखारी यां रेलगाडी में तमाशा करने वाली नहीं, और ना ही किसी की दया की मोहताज हूं.लेकिन हम भी इनसान हैं, हमें भी भगवान ने बनाया है, हमने कभी किसी का दिल नहीं दुखाया, लेकिन जब लोग हमें घृणा की भावना से देखते हैं तो मन में एक टीस सी उठती है.भगवान से हमारा कोई कान्ट्रैक्ट नहीं है जो हम इस रूप में हैं, लेकिन अगले ही पल उत्तेजित किन्तु बदले हुए तेवर के साथ राजनीति पर पलटवार करते हुये कहती हैं "मैं इन नेताओं के लिये डिस्प्रिन की गोली भी हूं तो मुँह को कड्वी लगने वाली कुनैन भी हूं".
चलिये अब चलते हैं शाहदल की ओर और पूछते हैं वहां के निवासियों से. एक औटो रिक्शा चालक से जब पूछा तो उसका जवाब सुनकर मुझे खुशी हुई की एक आम इन्सान के दर्द को किस तरह शबनम मौसी ने समेटा है" किसी भी नेता ने आज तक हमारे लिये कुछ नहीं किया लेकिन शबनम मौसी ने हमारे लिये जो कुछ भी किया वो तारीफ़ के काबिल है. हमारा छोटा सा शहर और छोटा होता जा रहा था लेकिन उन्होने यहां गांवों में कई स्कूल खुलवाये, पक्की सड़कें बनवायीं, नालियां-खरंजे बनवाये.किसी भी नेता ने आज तक यह नहीं किया और ना ही इस बारे में सोचा तो क्यों न हम किसी हिजडे को अपना नेता चुनें शबनम मौसी ने आज तक किसी से कोई एक रुपया नहीं लिया बल्कि लोगों के दुख-दर्द को अपने भीतर समेटा है.
वो गरीबों के दुख-दर्द को समझने वाली शबनम मौसी ही हैं जिनके प्रयासों के रूप में शाहदल ने देश के मानचित्र पर अपनी अमिट छाप छोडी है.
फ़िर क्यों हम उन्हें तिरस्कृत करते हैं, जो सच्चे मन से देश की सेवा करना चाहता है ? यह सवाल हमें उन नेताओं से भी करना चाहिये जिन्हे लक्जरी गाडियों और एअर-कन्डीशन युग से बाहर निकलने की फ़ुर्सत नहीं।



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