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कल का कर्ज-1

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शाम से आंख में नमी-सी है
नगरों-महानगरों में हम सभी अपनी दुनिया में मस्त हैं। सांप्रदायिकता पर चिंतित होते हैं, मोदी को लेकर गालीगलौज तक कर डालते हैं, इराक में बुश की दादागिरी से खफा होते हैं, वेनेजुअला के राष्ट्रपति शावेज को शाबासी देते हैं, देश के भ्रष्टाचार पर परेशान होते हैं, यौन शिक्षा पर बहस करते हैं, चीनी-कम पर चर्चा करते हैं, व्यवस्था न बदलने पर शोक करते हैं। काम या दफ्तर से लौटकर घर पहुंचते हैं, खाते-पीते और सो जाते हैं। अगले दिन फिर चिंता और काम के चक्र में रम जाते हैं। दुख-सुख, चिंता, मोहमाया सबसे रू-ब-रू होते हैं, दार्शनिक भाव से जिंदगी जीते हैं। अवसाद की हालत में कभी-कभी अपने होने का मतलब तलाशने लग जाते हैं। वैसे, अवसाद की स्थिति होती है बड़ी मजेदार। मन नम-सा हो जाता है, अजीब शीतलता छा जाती है, निराशा में डूबते-उतराते हुए अक्सर स्थितिप्रज्ञता का भाव आ जाता है।

ऐसी ही अवस्था में मैं भी अपने होने का मतलब तलाशने बैठ गया। तलाश यहां से शुरू की कि जहां मैं इस समय अवस्थित हूं, उसका समग्र स्वरूप क्या है। मैं किसी द्वीप पर हूं या आबादी और कोलाहल से भरे किसी समूचे भूखंड का हिस्सा हूं। मुझे अहसास हुआ कि नगरो-महानगरों से गुजरता हुआ जहां मैं इस समय मौजूद हूं, हिंदुस्तान की जिस तकरीबन तीस करोड़ की आबादी में मैं शामिल हूं, वह तो चारो तरफ से सत्तर करोड़ से ज्यादा ऐसी आबादी से घिरी हुई है, जहां जिंदगी तड़क गई है, जहां दिलों में त्राहिमाम-सा मचा हुआ है। जहां के बारे में कभी गांव के मेरे हरवाह नरायण ने गाकर सुनाया था कि सूखि गइली नदियां, झुराय गइल पानी हो मुए ला चिरई, कैसइ होइहैं मोर गुजारा हो मुए ला चिरई।

मैं लौट गया करीब तीस साल पहले। पहुंच गया अवध इलाके के अपने एक गांव में। उस दौरान जाड़ों की तीन महीने की छुट्टियों में बाबा-अइया के पास गांव आया करता था। खेती किसानी का पूरा चक्र मजे में चलता था। चार जोड़ी बैल, तीन भैंस, पांच गाय और उनके कूदते-फांदते बच्चे। उपले बनाने के बाद बचा हुआ गोबर और घर का कचरा पास के घूरे में डाल दिया जाता। जो कई महीनों तक सड़ने के बाद खाद बन जाता। खाद की डेरियां खेतों में डाल दी जातीं। फिर जुताई के बाद वो खाद खेत की मिट्टी का हिस्सा बन जाती। मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए कुछ खेतों में साल भर के लिए अरहर बो दी जाती। गरमियों के दिनों में खेतों में रात भर के लिए भेड़ भी बैठायी जाती। गड़ेरियों की भेड़ें पूरे सीजन के लिए बुक रहतीं। कभी इस खेतिहर के यहां, तो कभी उस खेतिहर के यहां। खेतों में लहलहाती फसल उगती। बाबा-अइया का ही नहीं, हमारा भी कलेजा हरियाली से भरे खेतों को देखकर बाग-बाग हो जाता।

 हमारे दो हलवाह थे। नरायण और सुखराम। उनका पूरा परिवार हमारे यहां जुताई से लेकर बोवाई और गोबर पाथने तक का काम करता। इसके बदले में उन्हें खाना-खुराकी और मजदूरी के अलावा दो-दो बीघा खेत भी मिला हुआ था। इसके अलावा हमारे घर से पांच घर नाई, दो घर कुम्हार, दो घर कोंहार, एक घर बढ़ई और एक घर लोहार का जुड़ा हुआ था। ये लोग खुद को हमारी परजा (प्रजा) बताते थे। शादी-ब्याह हर मौके पर हाजिर रहते थे। फसल का एक हिस्सा ये लोग भी ले जाते थे। साथ ही खेत का टुकड़ा भी इन सभी को मिला हुआ था। नाइयों के परिवार तो हमारे संयुक्त परिवार की जमीन पर ही बसे हुए थे। जाड़ों में उनके घर के मर्द और बच्चे हमारे ओसारे में तपता सेंकने आते थे और खाने के समय ही बुलौवा आने पर ही वहां से उठते थे। शायद परजा की इस व्यवस्था को जजमानी कहते हैं, जो अंग्रेजों द्वारा 1793 में स्थायी बंदोबस्त के तहत लागू की गई जमींदारी व्यवस्था से अलग थी।

लेकिन अब सारा तानाबाना बिखर गया है। खेती-किसानी की आत्मनिर्भर व्यवस्था टूट गई है। न हरवाह रहे, न परजा। अच्छा है। सभी अपने हुनर और काम से शहरों में पैसा कमाने लगे हैं। जो जमीनें उन्हें हमसे मिली थीं, ज्यादातर उन्हीं के नाम हो गई हैं। नरायण ने शादी नहीं की थी। छोटा भाई जगदीन दिल्ली में बाबा जर्दा फैक्टरी में काम करता था। फिर न जाने क्यों लौटकर घर आ गया। नरायण को उसने अपने घर से अलग कर दिया। नरायण का पीठ का फोड़ा इतना बढ़ा कि वह एक दिन भगवान को प्यारा हो गया। सुखराम के दोनों भाई बुधिराम और मुन्नी लखनऊ में माल लदाई का काम करते थे। बुधिराम ने सुल्तानपुर में कुछ दिन रिक्शा भी चलाया। फिर बुधिराम को टीबी हो गई और मेरी ही उम्र का बुधिराम एक दिन मर गया। खबर सुनकर लगा कि मेरा भाई मर गया है क्योंकि उसकी मां का दूध मैंने भी पिया था। मां जब बाहर ट्रेनिंग करने गई थी और महीनों तक बाहर रहती थी तो उस दौरान बुधिराम की माई मुझे अपनी गोंद में सुलाकर कभी-कभी दूध पिला दिया करती थी। मुन्नीराम को एक बार दिसंबर के महीने में तेज बुखार आया। बताते हैं कि डिग्री-विहीन डॉक्टर साहब ने उसे रात में ठंड़े पाने से नहाने को कह दिया। फिर उसे ऐसा जूड़ी-बुखार आया कि वो भी सुबह होते-होते इस दुनिया से कूच कर गया।

 अतीत की इन गलियों से गुजरते हुए मैं सोचने लगा कि हमारे गांवों की इतनी बदतर हालत क्यों हुई जा रही है। तभी मुझे याद आया कि महात्मा गांधी ने 1942 में अंग्रेजों भारत छोड़ो के साथ Land to Tiller यानी जमीन जोतनेवालों की...का नारा भी दिया था। फिर ऐसा क्यों है कि आज भी हमारे गांव के 43 फीसदी लोग या तो भूमिहीन हैं या उनके पास आधे एकड़ से भी कम जमीन है। और, मैं भूमि सुधार के सवाल का जवाब और प्रासंगिकता तलाशने में जुट गया।

हिसाब ज्यों का त्यों, कुनबा डूबा क्यों?
 भूमि के सवाल पर मैं सोच ही रहा था कि प्रमोद का फोन आया। उनका कहना था कि इस जटिल सवाल पर प्यार से लिखना चाहिए। दिक्कत ये है कि इस मसले पर मेरी समझ और अध्ययन बहुत छिछला और अनुभवजन्य है। जैसे, जब कोई भूस्वामियों की जमीन छीनकर जोतनेवालों को जमीन देने की बात करता है तो मुझे उपहास करने का मन होता है। आखिर जिस देश में औसत जोत का आकार घटते-घटते तीन-साढ़े तीन एकड़ का रह गया हो, वहां जमीन के और टुकड़े करने का क्या तुक है। इलाके के इलाके छान मारिए, आपको 30-35 एकड़ से ज्यादा के किसान नहीं मिलेंगे। 10-12 एकड़ तक के किसान तो आपको हर तरफ रोते-बिलखते मिल जाएंगे। उनके लिए खेती घाटे का सौदा बन गई है। वो कोई ठीक-ठाक नौकरी पाकर शहर का रुख करना चाहते हैं। अच्छे दाम मिल जाए तो खेती की जमीन बेचकर निकल जाएंगे।

ये उत्तर भारत के किसानों का औसत हाल है। लेकिन औसत की बात चली तो एक साहूकार की कहानी याद आ गई। साहूकार महोदय अपनी बीवी और तीन बच्चों के साथ पास के शहर को जा रहे थे। रास्ते में एक नदी पड़ी। नांव का इंतजार किया। वो नहीं आयी तो साहूकार ने सोचा कि ये नदी तो घुसकर पार की जा सकती है। उन्होंने किनारे से लेकर बीच तक नदी की गहराई नापी – 1 फुट, 3 फुट, 7 फुट, 3 फुट और 1 फुट यानी नदी की औसत गहराई निकली 15/3=3 फुट। अब साहूकार ने अपने कुनबे में सभी की ऊंचाई नापी। वो खुद 5 फुट 10 इंच के, बीवी 5 फुट 2 इंच की, पहला बेटा 4 फुट 8 इंच का, छोटी बेटी 3 फुट 4 इंच की और गोद का बेटा 2 फुट का। उन्होंने गिना कि इस तरह कुनबे की औसत लंबाई हुई करीब 4 फुट ढाई इंच। यानी, कुनबे की औसत लंबाई नदी की औसत गहराई से पूरे 1 फुट ढाई इंच ज्यादा है। इसलिए कुनबा तो आसानी से नदी पार कर जाएगा। साहूकार बीबी-बच्चे समेत नदी में उतर गए। उन्हें तैरना आता था, सो नदी के उस पार पहुंच गए। बाकी सारा कुनबा बीच नदी में बह गया। साहूकार फेर में पड़कर कहने लगे – हिसाब ज्यों का त्यों, कुनबा डूबा क्यों...

देश में लघु और सीमांत किसानों के नाम पर, आर्थिक रूप से अव्यवहार्य जोत के आकार के नाम पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ऐसे ही औसत का हल्ला मचाकर ‘कुनबे’ को डुबाने की तैयारी में लगे हुए हैं। उत्तर प्रदेश की बात करूं तो वी पी सिंह के खानदान से जुड़ी डय्या और मांडा रियासतों के पास अब भी हजारों एकड़ जमीन है। इनमें से कुछ जमीनें तो पीपल के पेड़ और कुत्तों तक के नाम पर है। राजा भैया उर्फ रघुराज प्रताप सिंह की भदरी रियासत के पास सैकड़ों एकड़ जमीन है। कालाकांकर रियासत का भी हाल यही है। विजयी नेताओं ने उत्तराखंड की तराई से लेकर उत्तर प्रदेश के तमाम इलाकों में सीलिंग कानून को धता बताते हुए सैकड़ों एकड जमीन हथिया रखी है। ऊपर से सहारा जैसे ग्रुप नए जमींदार बन गए हैं। एसईजेड की जमीनों को शुमार कर लें तो रिलायंस, टाटा, बजाज, महिंद्रा एंड महिद्रा, गोदरेज, आईटीसी और आदित्य बिड़ला जैसे समूह ढाई हजार से लेकर तीस हजार एकड़ जमीन के मालिक बनने की होड़ में लगे हुए हैं।

ये सच है कि जमींदारी उन्मूलन जैसे कदमों से दस-बीस हजार एकड़ के मालिक बड़े राजा-महाराजा और जमींदारों की औलादें विरासत में मिलने वाली संपत्ति से बेदखल हो गईं। लेकिन एक तो उनमें से बहुतों ने कानूनी नुक्तों का फायदा उठाकर आज भी सैकड़ों एकड़ जमीन पर कब्जा बरकरार रखा है। दूसरे उनके हाथ से निकली जमीन से ठीक उनके नीचे की हस्ती वाले किसानों को फायदा मिला, न कि जमीन जोतने वालों को। सरकारी आंकड़ा भले ही बताए कि पिछले पचास सालों में ज्यादातर बड़ी भू-जोतें गायब हो गई हैं, लेकिन सच्चाई कुछ और है। अंग्रेजों के राज में 1941 की जनगणना के मुताबिक उस साल अविभाजित हिंदुस्तान की आबादी 31 करोड़ 86 लाख 60 हजार 580 थी, जबकि इस समय इससे ज्यादा लोग ठीक से दो जून की रोटी भी नहीं जुटा पाते।

हिम्मत है तो कर के दिखाओ
आगे बढ़ने से पहले दो बातें साफ कर देना चाहता हूं। एक तो मैं अर्थशास्त्री नहीं हूं, न ही किसी विकासशील अर्थव्यवस्था में ज़मीन के सवाल की समग्र समझ रखता हूं। बल्कि लेखों की इन कड़ियों के ज़रिए खुद भारत में ज़मीन के सवाल को समझने की कोशिश कर रहा हूं। इसके लिए मेरे पास एकमात्र स्रोत एकमात्र इंटरनेट पर मौजूद सामग्रियां हैं। इसलिए ज़मीनी कार्यकर्ताओं और इस मुद्दे पर जानकारी रखनेवाले बंधुओं से मेरी अपील है कि जहां भी मैं गलत डगर पर भटकता नजर आऊं, मुझे फौरन दुरुस्त कर दें।

 दूसरी बात जमीन का सवाल भू-दक्षिणा या भू-दान का मसला नहीं है। निर्धन सुदामा को किसी श्रीकृष्ण का उपहार नहीं चाहिए, न ही किसी बिनोबा भावे का यज्ञ। असल में भूमि सुधार का सवाल गरीबों को दो जून की रोटी मुहैया कराने तक सीमित नहीं है। न ही ये महज वंचित तबकों के हक़ का मसला है। बल्कि ये देश के तेज़ औद्योगिक विकास की ज़रूरी शर्त है। ऐसा मेरा नहीं, नोबेल विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन का कहना है।

हैदराबाद में पिछले साल 93वीं इंडियन साइंस कांग्रेस की बैठक में अमर्त्य सेन ने चेतावनी भरे लफ्ज़ों में कहा था कि भारत तब तक दुनिया की प्रमुख ताक़त नहीं बन सकता, जब तक वह भूमि सुधारों की प्रक्रिया को पूरा नहीं करता। अगर भारत को चीन जैसी स्थिति हासिल करनी है, (उत्पादक) शक्तियों को मुक्त करना है तो देश में भूमि सुधारों को लागू करना बेहद ज़रूरी है। इस बैठक में खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी मौजूद थे। ज़ाहिर है मनमोहन सिह ने खुद अर्थशास्त्री होने के नाते अमर्त्य सेन की बातों के मर्म को अच्छी तरह समझा होगा। लेकिन ‘भक्तवत्सल’ मनमोहन ने अपनी आंखों पर उद्धव के निष्ठुर ज्ञान की ऐसी पट्टी बांध रखी है कि उन्हें इसमें अर्थ तो नज़र आया होगा, इंसानी प्रेम और गरिमा नहीं।

भूमि का सवाल सामाजिक न्याय के पैरोकारों को भी हजम नहीं होता, जबकि सामाजिक न्याय की पूर्णाहुति भूमि सुधारों के बिना हो ही नहीं सकती। मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करनेवाले वी पी सिंह से पूछा जाना चाहिए कि क्या वो डय्या और मांडा रियासतों की हजारों एकड़ ज़मीन इलाके के कोल आदिवासियों और भूमिहीन दलितों को देने को तैयार हैं? उच्च शिक्षा में 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण का शिगूफा उछालने वाले अर्जुन सिंह से पूछा जाना चाहिए कि क्या वे मध्य प्रदेश में अपनी रियासत की सैकड़ों एकड़ ज़मीन गरीब पिछड़ों को देने को तैयार हैं? और, दलितों के सम्मान की वाहक मायावती से पूछा जाना चाहिए कि राजा भैया और उनके बाप उदय सिंह को जेल की हवा खिलाकर उन्होंने यकीनन दलितों का हौसला बढाया है, लेकिन क्या भदरी रियासत की तीन-चार सौ एकड़ ग़ैरक़ानूनी ज़मीन को वो इलाके के पासियों में बांटने को तैयार हैं? कहां दस-बीस हज़ार नौकरियों के लिए लड़ते दो-चार लाख नौजवानों की बात और कहां मेहनत से जिंदगी जीने को लालायित करोड़ों बे-जमीन किसानों की बात। आप ही तय कीजिए कि सामाजिक न्याय को व्यापक आधार देने का रास्ता क्या हो सकता है।

वैसे, हमारे संविधान के तहत कृषि एक ‘स्टेट सब्जेक्ट’ है। इसीलिए मुख्यमंत्री मायावती चाहें तो उत्तर प्रदेश में भदरी जैसी रियासतों की जमीनें भूमिहीन किसानों में बांटकर देश के इतिहास में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में लिखा सकती हैं। वो साबित कर सकती हैं कि वामपंथियों ने तो पश्चिम बंगाल और केरल में भूमि सुधार का कैरिकेचर ही लागू किया है, असली काम तो उन्होंने किया है।

लेकिन ये एक खूबसूरत ख्याल के अलावा कुछ नहीं है क्योंकि राजा भैया को जेल भिजवाना मौजूदा सत्ता के बांट-बखरे का निर्मम खेल है, जबकि उनकी जमीनें लेकर पासियों में बंटवाने से सत्ता के मौजूदा तंत्र में ही भूचाल आ सकता है। असल में कृषि का मामला इतना विस्फोटक है कि राज्यों से लेकर केंद्र सरकार तक इसके पास आने से घबराती है। इसीलिए वो दलितों और पिछड़ों को आरक्षण जैसे झुनझुनों में उलझाए रखना चाहती हैं। लेकिन सच तो ये है कि ओस की बूंदों से प्यास बुझाने की हिमायत करनेवाले लोग ही आरक्षण पर तालियां बजा कर नाच सकते हैं। वो चाहें तो सामने के तालाब से मन भर के पानी पी सकते हैं। लेकिन शर्त ये है कि इससे पहले इनको कई यक्ष प्रश्नों के उत्तर देने पड़ेंगे, जिसके लिए वो कतई तैयार नहीं हैं।

दूसरा भाग के लिये यहां क्लिक करें है.

साभार : एक हिन्दुस्तानी की डायरी

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