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मजे से दूधो नहाओ, पूतो फलो

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चिंता की कोई बात नहीं। ये आशीर्वाद अब बेधड़क दिया जा सकता है। आबादी का बढ़ना अब मुसीबत नहीं, भारत के लिए नेमत है। विकसित देशों की जनसंख्या वृद्धि दर ठहरी हुई है। कहीं-कहीं तो ये घटती जा रही है। जर्मनी में तो ज्यादा बच्चों पर इनसेंटिव दिया जाता है। आठ-दस बच्चे हो गए तो मियां-बीवी को नौकरी करने की कोई ज़रूरत नहीं। बच्चों की परवरिश के लिए सरकार से इतने यूरो मिल जाते हैं कि घर बैठे मौज कीजिए। अमेरिका, यूरोप और जापान से लेकर चीन तक बूढ़ों की तादाद बढ़ रही है, जबकि भारत की आधी से ज्यादा आबादी की उम्र 25 साल से कम है। कितना सुखद आश्चर्य होता है जब हम पाते हैं हमारी आधी से ज्यादा आबादी 1980 के बाद पैदा हुई है।

दुनिया में जो डेमोग्राफिक तब्दीलियां आ रही है, उसमें हालत ये हो गई है कि विकसित देशों के पास तकनीक तो है, लेकिन काम करनेवाले लोग नहीं हैं। एक अनुमान के मुताबिक साल 2020 में दुनिया भर में 4.7 करोड़ कामगारों की कमी होगी, जबकि भारत के पास 4.5 से 5 करोड़ कामगार ज्यादा रहेंगे। अगर हमने ज़रूरी कौशल वाले कामगार तैयार कर लिये तो दुनिया की इस ज़रूरत को पूरा कर सकते हैं।

विदेश में ही नहीं, देश में भी रोज़गार के नए अवसर दस्तक दे रहे हैं। अभी भारतीय आईटी उद्योग की जो विकास दर चल रही है, उसके हिसाब से अगले तीन सालों में देश में रोजगार के एक करोड़ नए अवसर पैदा होंगे। और कहा जाता है कि आईटी उद्योग के हर रोजगार से बाकी अर्थव्यवस्था में चार और नौकरियां पैदा होती हैं। यानी, अगले तीन सालों में रोजगार के कुल पांच करोड़ मौके पैदा होने वाले हैं।

 इन बातों को देखकर डंके की चोट पर कहा जा सकता है कि दो सदियों से योजनाकारों से लेकर आम लोगों के दिलोदिमाग में घर बना चुके माल्थस के सिद्धांत के अब परखचे उड़ गए हैं। ब्रिटेन में 1766 में जन्मे राजनीतिक अर्थशास्त्री थॉमस रॉबर्ट माल्थस खुद अपने संपन्न मां-बाप की सात औलादों में छठे नंबर पर थे। आबादी की समस्या उनका प्रिय विषय थी। 1798 में प्रकाशित अपने मशहूर सिद्धांत में उन्होंने कहा था कि आबादी की दर ज्यामितीय गति से बढ़ती है, जबकि खाद्यान्न उत्पादन अंकगणितीय दर से बढ़ता है। इसलिए आबादी की रफ्तार रोकी नहीं गई तो एक दिन खाद्यान्न की आपूर्ति इतनी घट जाएगी कि पूरी मानव जाति का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।

माल्थस ने 19वीं सदी में ही ऐसा होने का अंदेशा जताया था। लेकिन रासायनिक उर्वरकों से लेकर कई अन्य वजहों से उत्पादकता में भारी वृद्धि हुई और उनकी ये भविष्यवाणी गलत साबित हो गई। मगर चार्ल्स डारविन जैसे विकासवादियों से लेकर एडम स्मिथ और डेविड रिकार्डो जैसे अर्थशास्त्री माल्थस के सिद्धांत के मुरीद बने रहे। आज भी हमारे नेताओं से लेकर आम लोग तक कहते रहते हैं कि भारत के लिए सबसे बड़ी समस्या आबादी की है। संसाधन कितने भी बढ़ा लिये जाएं, बढ़ती आबादी उन्हें निगल जाएगी। वो ये नहीं देखते कि भारत में गरीबी रेखा से नीचे रह रही करीब 30 करोड़ की आबादी संसाधनों पर कोई बोझ नहीं डालती। एक आदमी के संसाधन में ऐसे दस-बीस लोग गुजारा करते हैं। फिर वो देश के संसाधनों पर बोझ कैसे हो गए?

पहले उपनिवेशों में आबादी का पलायन हुआ तो अब ग्लोबलाइजेशन के दौर में काबिल लोगों के लिए देशों की सीमाएं खत्म हो गई हैं। अगर आज अमेरिका या यूरोप में भारत जैसे विकासशील देशों के छात्रों और प्रोफेशनल्स को वीसा में छूट दी जा रही है, तो ये उनकी कोई कृपा नहीं, मजबूरी है। जिस तरह वायुमंडल में किसी जगह दबाव कम हो जाने पर दूसरी जगह की हवाएं उस दिशा में चक्रवात की तरह बढ़ती हैं, आबादी का वैसा ही चक्रवात अब विकासशील और गरीब देशों से विकसित और अमीर देशों की तरफ चलनेवाला है। और, इसमें नुकसान किसी का नहीं, सबका फायदा है।

साभार: http://diaryofanindian.blogspot.com/

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