भाषा एक पहचान है और एक परदा भी
जो लोग भाषा की शुद्धता को लेकर परेशान रहते हैं, शब्दों की व्युत्पत्ति के चक्कर में पड़े रहते हैं, पता नहीं क्यों मुझे उनकी बात जमती नहीं। हो सकता है ये मेरा देहाती नज़रिया हो। लेकिन मुझे इतना जरूर लगता है कि ज़िंदगी जैसे भाषा को उड़ाए, उसे उड़ने देना चाहिए। बीती रात लोकल से घर आते हुए मैंने पाया कि 18-20 साल का एक बेहद सामान्य पृष्ठभूमि का लड़का सीट पर बैठकर अंग्रेज़ी में कोई मोटी किताब खूब डूब कर पढ़ रहा था। मैंने ये भी देखा है कि मुंबई में आम लोग भी अंग्रेज़ी में बात करते हैं। अंग्रेजी मुंबई में आम पढ़े-लिखे लोगों की भाषा बन गई है, जबकि दिल्ली या उत्तर प्रदेश में ये ज्यादातर लोगों के लिए रौब झाड़ने की भाषा है।
अंग्रेज़ आए। दो सौ साल भारत पर राज किया। लेकिन अंग्रेज़ी अगर यहीं रह गई तो इसमें अनैतिक क्या है। अगर आज चंद्रभान प्रसाद दलितों के बच्चों को अंग्रेज़ी में पांरगत होने की सलाह देते हैं तो इसमें गलत क्या है। अगर आगे बढ़ने के लिए अंग्रेज़ी एक जरूरी शर्त बन गई है तो लोगों को अंग्रेज़ी सीखने से कैसे रोका जा सकता है। अगर आज ज़िंदगी में विकास के लिए भ्रष्टाचार ज़रूरी हो गया है तो लोग भ्रष्टाचार करेंगे। अगर आपको भ्रष्टाचार खत्म करना है तो विकास की शर्तें बदल दीजिए। लोग अपने आप धीरे-धीरे ईमानदार होने लगेंगे। भाषा पर भी यही बात लागू होती है। वैसे भी हिंदी एक ओढ़ी हुई भाषा है। असली भाषा तो हिंदवी या हिंदुस्तानी है, जिसे अरबी-फारसी के शब्द मिलाकर उर्दू बना दिया गया और संस्कृत के तत्सम शब्द ठूंस कर हिंदी बना दिया गया।
यहां एक बात और। उत्तर भारत की बोलचाल और सोच की भाषा हिंदी कभी मिट ही नहीं सकती। अगर ऐसा होता तो बिल गेट्स हिंदी में विंडोज़ नहीं लाता। गूगल हिंदी की ऐसी सेवा नहीं करता। एक मजेदार हकीकत का अहसास मुझे जर्मनी में रहने के दौरान हुआ था। मेरे एक पाकिस्तानी मित्र थे शकील भाई। वे किसी जर्मन को देखकर मां-बहन की शुद्ध गालियां देना शुरू कर देते थे। मैंने कहा – शकील भाई कोई समझ लेगा तो? बोले – उसे फौरन गले लगा लेंगे। कहेंगे – अरे इस परदेस में अपना भाई कहां से मिल गया। हम लोग आपस में मज़े से नितांत निजी बातें हिंदी-उर्दू में करते रहते। हमें पता था कि बगल वाले की समझ में कुछ नहीं आएगा।
तभी मुझे अहसास हुआ कि भाषा कितने बड़े परदे का काम करती है। दो तमिल या मलयाली बगल में बैठे कुछ बातें कर रहे हों, हमें क्या पता चलेगा। हां, ये अलग बात है कि हंसने की, रोने की, दुखी होने की भाषा सारी दुनिया में एक ही होती है। इसलिए गम और खुशी बांटना बहुत आसान है। ये भाषा हम न भूलें, बाकी भाषा तो जो आज है वो कल नहीं रहेगी। अंग्रेजी में जर्मन से लेकर फ्रेंच और हिंदी शब्द तक जगह बना चुके हैं। फिर हिंदी कैसे शुद्ध रह सकती है। जिंदगी का बहाव शब्दों को कहां का कहां पहुंचा देगा, इसे प्रवाह तय करेगा, हम या कोई बुद्धिजीवी, साहित्यकार या सरकारी अफसर नहीं।



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