इस लूट की छूट से विकास का कौन सा अध्याय शुरू होगा?
ऊपर से देखने पर बाजार में चहल-पहल वैसी ही है जैसे कल थी. लेकिन अंदर ही अंदर दिल्ली के दुकानदारों में हड़कम्प मचा हुआ है जो इस चहल-पहल का हिस्सा कतई नहीं है. दुकानदारों में यह हड़कम्प सीलिंग के डर से भी नहीं है.यह हड़कम्प रिलांयस, बिग बाजार और सुभिच्छा जैसी प्रतिद्वन्दियों ने पैदा किया है. मानों चूहों की लड़ाई में हाथी का पांव आ गया है. अब सारे चूहे एकता भी कर लें तो हाथी का क्या बिगाड़ सकते हैं. क्योंकि चूहों (दुकानदारों) के साथ न जनता की सहानुभूति है और न सरकार की. फिर इनकी चिंता करे कौन?
इस भागदौड़ और हड़कम्प के बीच दुकानदारों को इस संकट से उबरने का रास्ता कोई नहीं बता रहा है. पहले यही दुकानदार ब्राण्ड के नाम पर छोटे उत्पादकों का माल नकार चुके थे और अब बड़े ब्राण्डवाले रिटेलर इन छोटे दुकानदारों को समाप्त करने पर अमादा हैं. जब शुरूआत में ही यह हाल है तो आगे आनेवाले समय में क्या स्थिति होगी इसकी सहज अंदाज लगाना मुश्किल है. मार्केट एसोसिएशन भी इन दुकानदारों के लिए आर-पार की लड़ाई छेड़ने के मूड में नहीं है और सरकार ने तो जैसे इनके खिलाफ हांका लगा रखा है. बड़े रिटेलरों को हर तरह की सहूलियत दी जा रही है. सरकार को बड़े पैमाने पर मिलनेवाला टैक्स और उसके विभिन्न मंत्रालयों को मिलनेवाला संभावित अवैध टैक्स भी साफ दिख रहा है. इसलिए सरकार और उसके कारिंदे रिटेल क्रांति का डंका बजा रहे हैं. तो क्या सचमुच छोटे दुकानदारों के सामने खत्म होने के अलावा कोई रास्ता नहीं है?
मुकेश अंबानी या किशोर बियानी क्या कहते हैं इसको कुछ देर के लिए छोड़ देते हैं. उनके समर्थन में किस तरह के सर्वे आ रहे हैं इसकी चर्चा भी नहीं करते क्योंकि सबको कुछ न कुछ मालूम है. यही कि रिटेल के खुलने से उपभोक्ता की चांदी हो जाएगी, रोजगार पैदा होंगे, छोटे किसानों और उत्पादकों को इसका सीधा लाभ मिलेगा और बिचौलिये समाप्त हो जाएंगे, रुपये का सर्कुलेशन बढ़ने से विकासदर में बढ़ोत्तरी होगी आदि-इत्यादि. इन सबसे अलग हम एक ऐसे सर्वे को देखते हैं जो रिटेलर्स के फंड से नहीं किया गया है. यह सर्वे किया है नवधान्य ने जिसकी संचालक पर्यावरणविद वंदना शिवा हैं. इस संस्था ने दिल्ली के उन जगहों पर दुकानदारों से बात की है जहां एक किलोमीटर के अंदर कोई बड़ा स्टोर खुला है. इस सर्वे की जो मुख्य बातें निकलकर सामने आ रही हैं, वे हैं-
- 1. रिलांयस या फिर बिग-बाजार जैसे स्टोर खुलने से 88 प्रतिशत दुकानदारों की बिक्री में कमी आयी है.
- 2. इसमें 45 प्रतिशत दुकानदार ऐसे हैं जिनकी बिक्री आधी रह गयी है.
- 3. 66 प्रतिशत दुकानदार ऐसे हैं जो दस साल से अधिक समय से इस व्यवसाय में हैं. कुछ तो तीस साल से अधिक समय से यही कारोबार कर रहे हैं. अब उनके सामने समस्या यह है कि वे रातों-रात अपना व्यवसाय नहीं बदल सकते.
- 4. 59 प्रतिशत दुकानदार हताश हैं और उन्हें अपने भविष्य का डर सता रहा है.
- 5. इसी छोटी अवधि में 4 प्रतिशत दुकानदार अब रिलांयस से सामान लेकर बेच रहे हैं. 96 प्रतिशत अभी भी मंडी जाते हैं.
- 6. मुकाबले में बने रहने के लिए दुकानदार अब ज्यादा समय तक अपनी दुकानें खोलने लगे हैं. कुछ तो 14 घंटे तक.
- 7. दिल्ली के पहाड़गंज और लक्ष्मीनगर इलाके के कई छोटे दुकानदार सब्जी-भाजी बेचने का काम छोड़ चुके हैं.
यह छोटा सर्वे भविष्य की भयावह तस्वीर खींचता है. मुकेश अंबानी लाख कहें कि रिटेल को खोलने का सबसे अधिक फायदा आम आदमी और छोटे किसानों को मिलेगा लेकिन इसमें कोई सच्चाई नजर नहीं आती. आज जो खरीदार बिग-बाजार और रिलांयस फ्रेश की दुकानों पर जा रहा है उसका व्यवहार एक इंटरनेट यूजर की तरह है. जो खोजते-खोजते खो जाता है. रिटेल सेक्टर का भी यही हाल है. रिटेल की मनोरंजक खरीदारी का कमाल ही है कि हम खरीदने कुछ जाते हैं और खरीदते-खरीदते खो जाते हैं.
खुदरा कारोबार में बड़ी कंपनियों के प्रवेश से खरीदार अच्छे-भले इंसान से गिनीपिग बन जाता है, जिस पर कंपनियां तरह-तरह के प्रयोग करती रहती है. अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे विकसित देश इस बात के उदाहरण हैं. लेकिन खरीदारी का यह मनोरंजन केवल उपभोक्ता को ही भारी नहीं पड़ता. उत्पादकों को यह भारी पड़ता है और छोटे-बड़े उत्पादक दोनों ही घाटे में रहते हैं.
पहले बड़े उत्पादक. आज छोटे उत्पाद बनानेवाली ज्यादातर बड़ी कंपनियां अपने उत्पादों पर रिटेलर को 5 से 10 प्रतिशत का मार्जिन देती हैं. यानी पांच रूपये के उत्पाद पर 25 से 50 पैसा. किसी रिटेलर के लिए पांच रूपये के उत्पाद पर यह बहुत कम मार्जिन है. दुकानदार की मजबूरी है कि वह कम मार्जिन पर भी माल बेचे क्योंकि उन छोटे उत्पादकों की बाजार से विदाई हो चुकी है जो दुकानदारों को 20 से 30 प्रतिशत तक मार्जिन देते थे. इस तरह देखें तो खुदरा बाजार का यह स्वरूप बड़े उत्पादकों के लिए फायदे का सौदा था. लेकिन रिटेल में बड़ी कंपनियों के आने के बाद यह स्थिति नहीं रहेगी.
थोक खरीदारी में बड़े उत्पादकों के सामने बहुत सीमित विकल्प होते हैं. खुदरा कारोबार की थोक खरीदारी में उत्पादक कुछ कंपनियों की मर्जी पर निर्भर हो जाता है. इसका फौरी तौर पर लाभ भले ही उपभोक्ता को मिले लेकिन लंबी अवधि में बड़े उत्पादकों और बड़े वितरकों के समझौते में बदल जाता है और दोनों मिलकर उपभोक्ता को लूटते हैं.
छोटे उत्पादकों में सबसे बड़ा हिस्सा किसानों का है. अभी ऐसे किसानों के सामने अपने उत्पाद बेचने के तीन रास्ते हैं. पहला है आस-पास का बाजार. दूसरा आपस में अदला-बदली और तीसरा रास्ता है सरकारी खरीद. बड़ी कंपनियों के आने के बाद ये तीनों रास्ते बंद हो जाएंगे. ऐसा नहीं है कि खुदरा के कारोबार में उतरने वाली कंपनियां भंडारण की अपनी कोई व्यवस्था नहीं खड़ा करेंगी. रिलांयस के अलावा हाल में ही भारत होटेल्स ने घोषणा की है कि वह सन 2010 तक कृषि व्यवसाय में 3000 करोड़ रूपया खर्च करेगी. इस पैसे से वह देशभर में 30 नयी होलेसेल मार्केट स्थापित करेगी. इसलिए यह कहना कि रिटेल के खुलने से केवल छोटे दुकानदारों और उत्पादकों पर ही संकट है, ठीक नहीं है. बड़े दुकानदार, आढ़ती और मंडी व्यवस्था भी खतरे की परिधि में है. चाहे अनाज बाजार हो या फिर मंडी खतरा सभी पर है.
क्या रिलांयस, वालमार्ट, फ्यूचर ग्रुप इतना रोजगार और संसाधन उपलब्ध करा सकती हैं कि इससे पैदा होनेवाली बेरोजगारी से निपटा जा सके. रिटेल क्षेत्र में जो रोजगार पैदा हो रहे हैं उसके लिए डिग्री-डिप्लोमा की ऐसी बंदिशे हैं कि आम आदमी यहां तक पहुंच ही नहीं सकता. कोई बतायेगा इस लूट की छूट से विकास का कौन सा अध्याय शुरू होगा?
साभार: http://visfot.com



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