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एक धीमी मौत–4 एड्स : आईये जाने इसका वैज्ञानिक पक्ष

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पिछली मुलाकात में हमने भारत में एड्स की स्थिति को जाना था। इस बार का विषय है एड्स का वैज्ञानिक पक्ष क्या कहता है, अर्थात एड्स किस प्रकार हमारे शरीर में अपना जाल बुनता है व अंगों को खोखला कर देता है।
एड्स (एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिशिएंसी सिंड्रोम)
एच.आई.वी. का सबसे खतरनाक परिणाम एड्स के रूप में हमारे सामने आता है। इसके चलते रोगी के शरीर में रोगों से लड़ने की क्षमता बिल्कुल समाप्त हो जाती है। प्राय एड्स संक्रमित मनुष्यों को फेफड़ों, दिमाग, आंखों तथा कुछ अन्य अंगों में संक्रमण फैलता है। वजन में गिरावट आना भी इस रोग का प्रमुख लक्षण है। इसके साथ ही डायरिया और कई तरह के कैंसर से व्यक्ति ग्रस्त हो जाता है।
सर्वप्रथम हम यह जानने का प्रयास करेंगे कि हमारे शरीर में रोगों के विरुद्ध लड़ने वाले तत्व कौन – कौन से हैं?
एंटीबाडीज
एंटीबाडीज शरीर की प्रतिरोधक क्षमता के जरिये उत्सर्जित उस प्रोटीन को कहते हैं जिससे रोगों के संक्रमण के खिलाफ लड़ने में शरीर को मदद मिलती है।
एंटीजन
ऐसी कोई भी बाहरी चीज को शरीर में प्रतिक्रियास्वरूप एंटीबाडीज के निर्माण के लिये परिस्थितियों को जन्म देती है, एंटीजन कहलाती है। ये बाहरी वस्तुएं वायरस और कीटाणु भी हो सकते हैं।
सीडीफोरप्लस कोशिका
ये एक ऐसी प्रतिरोधक कोशिका है जो रोगों से लड़ने वाली प्रतिरक्षा प्रणाली की सहायता करती है। जब एच.आई.वी. का संक्रमण होता है तो ये कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं, और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली भी क्षीण होने लगती है। ये कोशिकाएं रक्त में प्रति घन मिलीलीटर के हिसाब से पाई जाती हैं। किसी स्वस्थ व्यक्ति में इनकी संख्या ६०० से १२०० प्रति घन मिलीमीटर और एड्स संक्रमित व्यक्ति के शरीर में २०० से भी कम इनकी संख्या पाई जाती है।
डी.एन.ए.
डी आक्सी राइबो न्यूक्लिक एसिड अर्थात डी.एन.ए. को जीवन की इकाई भी कहा जाता है। इनका कार्य कोशिकाओं के निर्माण में आवश्यक आनुवांशिक सूचनाएं देना है। साथ ही साथ डी.एन.ए. इस बात की भी पुष्टि करने का कार्य करता है कि सभी कोशिकाएं सही तरह से कार्य कर रही हैं या नहीं।
आर.एन.ए.
आर.एन.ए. ऐसे तत्व होते हैं जिनकी संरचना डी.एन.ए. से मिलती – जुलती होती है। इसका प्रमुख कार्य आनुवांशिक सूचनाओं को डी.एन.ए. से लेकर दूसरी कोशिकाओं तक पहुंचाना है। साथ ही ये कोशिका के भीतर होने वाले कुछ रसायनिक समीकरणों पर नियंत्रण भी रखते हैं।
टी-सेल
यह वह श्वेत रक्त कण होते हैं जिनका मुख्य कार्य शरीर की प्रतिरोधक क्षमता में समन्वय स्थापित करना होता है। ये संक्रमित कोशिका को शरीर की रोग से लड़ने की क्षमता का आभास भी कराता है। सीडी फोरप्लस कोशिकाएं भी एक प्रकार से टी-सेल ही होती हैं।
मैक्रोफेज
यह वह बड़ी कोशिकाएं होती हैं जो बिना नष्ट हुए लगातार संक्रमण फैलाने वाले तत्वों से लड़ती हैं। साथ ही अन्य दूसरी कोशिकाओं को भी इसके लिये प्रेरित करती हैं।

तो यह बात हुई रोगों से लड़ने वाले शरीर के तत्वों की। परन्तु एड्स की चपेट में जब व्यक्ति आता है तो शरीर के किन अंगों पर उसका प्रभाव देखने को मिलता है, आइये बात करते हैं -
ह्यूमन इम्यूनोडेफिसिएंसी वायरस टाइप-१ (एच.आई.वी.-१)
यह एक ऐसा वायरस है जो एड्स के अधिकतर मामलों का जिम्मेदार माना जाता है। यह वायरस अपने जींस को कोशिका में भेजकर उसके कार्य में बाधा डालता है तथा उसे एच.आई.वी. फैक्ट्री में तब्दील कर देता है।
ह्यूमन इम्यूनोडेफिसिएंसी वायरस टाइप-२ (एच.आई.वी.-२)
यह भी एच.आई.वी.-१ का मिला – जुला प्रतिरूप है, जो सक्रियता से एड्स को फैलाता है। इसका पीड़ित सर्वप्रथम दक्षिण अफ्रीका में सामने आया था।
कापोसी सरकोमा
ये एड्स से मिलने – जुलने वाले कैंसर की किस्म है। इसके लक्षण शरीर पर या मुंह के भीतर गुलाबी अथवा बैंगनी धब्बों के रूप में नजर आते हैं। आश्चर्य की बात यह है कि इन धब्बों में जरा भी दर्द का अहसास नहीं होता है।
ऑपर चुनिस्टिक इंफेक्शन
इस प्रकार का संक्रमण उन लोगों में पाया जाता है जिनके भीतर रोगों से लड़ने की क्षमता में कमी हो जाती है। यह एक ऐसे जीवाणु से होने वाला संक्रमण है जो मजबूत प्रतिरोध वाले व्यक्ति के शरीर में असर डालने में असफल रहता है।
ट्रांसमिशन
यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके तहत वायरस एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक पहुंचते हैं। एच.आई.वी. फैलने का सबसे आम कारण असुरक्षित यौन सम्बंध तथा दवाइयों को शरीर में डालने के लिये इस्तेमाल की जाने वाली सुईयां हैं, तथा संक्रमित स्त्री से दूध के जरिये बच्चे को भी हो सकता है।

यह सब एड्स फैलने के तरीके  व रोग के लक्षण थे। परन्तु एड्स के लिये बनायी गयी दवाईयां कौन सी हैं तथा यह कितनी प्रभावी हैं। आम आदमी तक उनकी कितनी पहुंच हैं? इस विषय को शामिल करेंगे हम अगली बार की चर्चा में।

Comments (2 posted):

Amita Sagar on 25 August, 2007 03:18:48
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aids jahaan aaj ki date mein puraaan muddaaa hotaa jaa rahaaa hai; so jaananke liye to kaafeee kuchh vibhinna vibhinna lekhs aur aalekhon ke jaariyaa AIDS ke bare mein jaanaa hai par EK DHEEMEEE MAUT-VAGYAANIK PAKSH BY Dipti Garjolaa waalke aalkeh se eskaa humaari jindagi par padane walaaa vegyaanik prabhaav bhi jaanankeko milaaa...AIDS ke baare mien mool jaankaaree wakaai sikshaaprad hai...after all, mein article kee behad sarahanaa karooongaaa aur lekhaak ko manviya mudde par likhane ke liye sukriyaa adaa karnaa chahooongaa saath hi wo humaaree jindagi se jude any muddon par bhe bewaak likhtee rahen; mein asha kartaa hoon..
thx
Afreena on 25 August, 2007 03:27:55
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AIDS; jwalant mudde par Dipti ji ka lekh kaafi SAARTHAK hai..., lekh ke dwaaraa aids ka vagyaanik paksh jaanaa...sachumuch paani ke tarah raastaa banati hui es bewaak beemari ki jaankaari ko har aam insaan tak pahunchanee chahiyee...

keep it up

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