एक धीमी मौत – ३ एड्स संक्रमित देशों की सूची में भारत ऊपर
पिछली बार की चर्चा में हम विश्व के एड्स पीड़ित देशों की समस्या से अवगत हुए थे। परन्तु हमारे देश में इस महामारी की क्या स्थिति है, आइये इस बार का अंक इसी को समर्पित है।
भारत में एड्स की मार
यह बात सच है कि एड्स की बीमारी ने भारत में देर से प्रवेश किया। परन्तु उतना ही कड़वा सच यह भी है कि आज भारत की गिनती सर्वाधिक एड्स पीड़ित देशों में की जाती है। यहां इसके फैलने की प्रमुख वजह लोगों का कम पढा – लिखा होना है। ग्रामीण परिवेश के लोग धन के अभाव के कारण इस्तेमाल हो चुकी सुईयों का उपयोग कर लेते हैं। खुला माहौल ना होने की वजह से समाज में लोग इस बीमारी पर चर्चा करने व अपनी समस्याओं को बताने से संकोच करते हैं।
भारत में एड्स की शुरुआत
भारत में एड्स का सबसे पहला मामला चेन्नई में सामने आया था। वहां के यौन कर्मियों में सर्वप्रथम एड्स के लक्षण देखने को मिले थे। इन लोगों में यह बीमारी कुछ विदेशी पर्यटकों के साथ सम्बंध रखने के माध्यम से आई थी।
शुरुआती दौर में यह बीमारी केवल महानगरों में ही देखी गयी। परन्तु वर्तमान में भारत के छोटे शहर व गांव आदि भी इस बीमारी के प्रकोप से अछूते नहीं रहे हैं। महानगरों से छोटी जगहों पर एड्स के ले जाने वाले वाहक ट्रक ड्रायवर या छोटे व्यापारी होते हैं जो महानगरों में यौन कर्मियों से सम्बंध बनाकर स्वयं तो इस बीमारी की गिरफ्त में आते ही हैं और अन्य जगहों पर इसे ले जाने के लिये वाहक का काम भी करते हैं।
एड्स नियंत्रण कार्यक्रम
भारत में एड्स के बढते प्रसार से चिंतित होकर इसकी रोकथाम के लिये सरकार द्वारा कुछ कार्यक्रम चलाये गये हैं।
१९८७ में सरकार ने राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम का आरम्भ किया, तथा इसके तहत लगभग ५२९०७ लोगों का परीक्षण किया गया जिसमें से १३५ लोग एड्स संक्रमित पाये गये थे।
अस्सी के दशक के अंत में भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य मणिपुर, मिजोरम तथा नागालैण्ड में एड्स के कई मामले सामने आये। इन स्थानों पर इसके फैलने का प्रमुख कारण इंजेक्शन के माध्यम से ड्रग्स लेना था। उपरोक्त सभी राज्य नशे लेने के मामले में सबसे ऊपर हैं। एक ही सुई से एक से अधिक बार व एक से अधिक लोगों के द्वारा इस्तेमाल किये जाने के कारण यह बीमारी इन जगहों पर तेजी से फैलती गई।
अब तक यह बीमारी केवल ड्रग्स लेने वालों अथवा यौन कर्मियों व उनसे सम्बंधित कुछ सीमित लोगों में देखी गयी थी, परन्तु ९० के दशक में यह बीमारी आम लोगों की जिन्दगी में भी प्रवेश कर चुकी थी।
सन् २०२ में नेशनल इंटीलेजेंस काउंसिल की गणना व भविष्यवाणी के अनुसार २०१० तक भारत में २० से २५ लाख व्यक्ति इस महामारी की चपेट में आ जाएंगे और यह आंकड़ा किसी भी अन्य देश की तुलना में बहुत अधिक होगा।
अगर यह गणना शुद्ध हुई तो भारत में एड्स पीड़ितों की मौत का आंकड़ा इस प्रकार होगा -
१९८० २००० २ से ७ लाख
२००० २०१५ १२.५ लाख
२०१६ २०५० ४९.५ लाख
इस समय भारत में एड्स विरोधी कई कार्यक्रम आयोजित किये जा रहे हैं। विशेषकर ग्रामीण तबके के लोगों को इसके संज्ञान में लाया जा रहा है। उन्हें एड्स के खतरनाक परिणामों व इससे बचने के उपायों के सम्बंध में अवगत कराया जा रहा है। साथ ही उन्हें यह हिदायत भी दी जा रही है कि एड्स पीड़ितों के साथ अछूतों सा बर्ताव ना करें क्योंकि यह कोई छूआछूत का रोग नहीं है।
अनपढ अथवा कम पढे-लिखे लोगों का इस बीमारी व इसके रोगों के प्रति घृणात्मक नजरिया तो समझ में आता है, परन्तु शहरी परिवेश के उच्च शिक्षित लोगों का इस बीमारी के प्रति संकीर्ण मानसिकता समझ से परे है। इसका ताजा उदाहरण अभी प्रकाश में आया जब एक सरकारी अस्पताल में डाक्टरों ने एक गर्भवती महिला की डिलेवरी करने से केवल इसलिये मना कर दिया क्योंकि वह महिला एड्स रोगी थी। हमारे समाज में जिन चिकित्सकों को ईश्वर का दर्जा दिया जाता है, उनकी निर्दयता की चरम सीमा उस समय देखने को मिली जब उस महिला के पति ने डाक्टरों से गुहार लगा कर व अंत में निराश होकर स्वयं अपनी पत्नी की डिलेवरी करवाई। यदि डाक्टर ही एड्स रोगियों के साथ इस तरह का व्यवहार करेंगे तो आम जनता से और क्या उम्मीद की जाना चाहिए।
महिलाओं पर एड्स की मार ज्यादा
अक्सर जब दुनिया पर कोई विपदा आती है तो इसका सबसे ज्यादा प्रभाव महिलाओं पर ही पड़ता है। एड्स भी इसका अपवाद नहीं है। लगभग हमारे समाज में अधिकतर गलतियों का जिम्मेदार महिलाओं को ही ठहराया जाता है। एड्स पीड़ित व्यक्ति की केवल पत्नी होना ही दोषारोपण के लिये काफी है। चूंकि हमारे समाज में स्त्रियों को अपनी बात रखने का कोई अधिकार नहीं होता, इसलिये वह अपनी मानसिक और शारीरिक समस्याओं से किसी को अवगत कराने में असमर्थ होती हैं। स्त्रियां भीतर ही भीतर इन समस्याओं से जूझती रहती हैं। सरकार को चाहिए वह स्त्रियों को अपनी बात करने का मौका दे व उनके इलाज में कोताही ना बरती जाए।
अब तक की चर्चा में हमारे मुख्य केन्द्र में वह देश रहे हैं जो एड्स की समस्या से ग्रस्त हैं। अगली बार हम एड्स का वैज्ञानिक दृष्टिकोण जानने की चेष्टा करेंगे।



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