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अबके जनम मोहे बिटिया न कीजो

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जाने-माने समजाशास्त्री रजनी कोठारी "राजनीति की किताब" में लिखते हैं कि स्त्रियों के प्रति भारतीयों का व्यवहार भारत की सबसे बड़ी समस्या है. रजनी कोठारी बिल्कुल सही कहते हैं. कोढ़ में खाज यह कि आधुनिक होने के घमंड ने सड़ी-गली सामाजिक व्यवस्था पर निर्णायक प्रहार कर दिया है. यह आधुनिक व्यवस्था है व्यवसाय का नजरिया. जो लोग सोचते हैं इस व्यावसायिक नजरिये ने स्त्रियों को अभिव्यक्ति के मौके दिये हैं, वे एक सीमा तक ही ठीक हैं. इस व्यावसायिकता का दूसरा पहलू घिनौना और निकृष्ट है. कन्या भ्रूण हत्या में तकनीकि का प्रयोग और इस तकनीकि प्रयोग में छिपा व्यावसायिक नजरिया रोंगटें खड़ा कर देता है.

यकीन नहीं होता तो इन आंकड़ो पर नजर डालिये. भारत में पिछले दो दशक में एक करोड़ से अधिक कन्या भ्रूण हत्या की गयी है और यह प्रतिवर्ष 9 फीसदी की दर से बढ रहा व्यवसाय बन गया है. तमिलनाडु की सुबु जार्ज पिछले 20 सालों से इस विषय पर शोध कर रही हैं. वे कहती हैं कि भारत में बेटिया पैदा होने के बाद कम, गर्भ में ज्यादा मारी जाती हैं. कानूनों का प्रावधान ऐसा कि अब तक कन्या भ्रूण हत्या के मामले में 4000 डाक्टरों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हुई है लेकिन सजा हुई है सिर्फ एक डाक्टर को. तो क्या कन्या भ्रूण हत्या को सामाजिक मान्यता के साथ-साथ अघोषित रूप से सरकारी मान्यता भी मिली हुई है या फिर इसमें हमारी व्यावसायिक नजरिया आड़े आता है?

जेंडर-मेंटर किट और भ्रूण-हत्या व्यवसाय
दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और महाराष्ट्र में जेंटर-मेंटर किट का व्यवसाय आजकल जोरों पर है. देहात में जन्तर-मंतर किट के नाम से मशहूर यह किट 25 अमरीकी डालर में उपलब्ध है. अल्ट्रासाउण्ड तकनीकि से लिंग निर्धारण ऐसी अवस्था में होता है जब गर्भपात कराना खतरनाक हो सकता है. इसका जवाब खोज निकाला है जेंटर-मेंटर किट ने. यह किट गर्भाधान के पांच सप्ताह के भीतर खून की जांच से बता देता है कि गर्भ में पलनेवाला शिशु लड़का है या लड़की. खून की इस जांच को व्यावसायिक भाषा में "बेबी जेंडर-मेन्टर" कहा जाता है. खून का सैंपल लेने के बाद इसे अमरीका स्थित मुख्य लैब में भेजा जाता है. इसके बाद रिपोर्ट जानने के लिए ग्राहक को 250 डॉलर और देना होता है. जैसे ही 250 डालर कंपनी को अदा किये जाते हैं 24 घंटे के अंदर रिपोर्ट वेबपेज पर डाल दी जाती है जिसे ग्राहक एक पासवर्ड के जरिए खोल सकता है.

इस रिपोर्ट के जानने के बाद अभिभावक निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं. वेबसाईट यह तो नहीं कहती कि उसका उद्येश्य ऐसा कुछ है जो लड़कियों को खत्म करने के लिए काम आता है लेकिन इसका उपयोग इसी काम के लिए हो रहा है. प्रेगनेन्सी स्टोर भी इस तरह के व्यवसाय में शामिल एक और समूह है. हो सकता है ऐसे और भी समूह हों जो काम कर रहे हों लेकिन यह "व्यवसाय" इतना फुल-प्रूफ है कि इसे रोकना मुश्किल है. पहली बात, यह देश के कानून की सरहदों से दूर है. दूसरे, यह टेस्ट नॉन मेडिकल टेस्ट की श्रेणी में आता है इसलिए भी इसे कानूनी रूप से रोका नहीं जा सकता. पंजाब और हरियाणा में यह उद्योग का रूप लेता जा रहा है. कुल खर्च 275 डालर यानि लगभग 10 हजार रूपये है. इसमें स्थानीय स्तर पर काम करनेवाले दलालों और डाक्टरों को भी अच्छी-खासी फीस मिल जाती है इसलिए वे इसे प्रचारित करने में लगे हुए हैं.

यह हमें क्या हो गया है? लड़कियों के प्रति हमारे दृष्टिकोण में यह आत्मघाती परिवर्तन क्यों आ गया है? हम कहां जाकर रूकेंगे? लड़की होना गुनाह क्यों है? हमारी सामाजिक परिस्थियां इसके लिए कहां तक जिम्मेदार हैं कि हम संतान के रूप में लड़की नहीं चाहते? अमरीका व्यवसाय के नाम पर भारत को और कितना ध्वस्त करेगा? यह कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब चाहिए.

साथ में, मीनाक्षी अरोड़ा हिसार से

साभार: http://visfot.blogspot.com

Comments (1 posted):

tara chandra parwaz on 28 August, 2007 04:56:05
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acchi rachnao ki fehrit hai. dhanvad

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