उन्हें हमेशा दूसरों की ही चिंता रही
जन्म और मृत्यु के बीच का फासला एक अनिवार्य नियति है, लेकिन इतिहास में हर कोई दर्ज नहीं हो पाता. इसके लिए इस फासले को एक मकसद बनाना पड़ता है. कबीर के अनुयायी दशरथ मांझी ने जीवन के इस मकसद को बखूबी पहचाना.उस दिन की भेंट आखिरी भेंट होगी, यह मुझे पता नहीं था. पटना में बुद्धमार्ग पर एक दुकान पर चाय पी रहा था. तब वे दिखे. मुख्यमंत्री से जनता दरबार में मिल कर आ रहे थे. बहुत प्रसन्न दिख रहे थे. मुख्यमंत्री ने उन्हें अपनी कुरसी पर बिठा कर सम्मानित किया था. बताने लगे-मुख्यमंत्री ने उस रास्ते पर सड़क बनाने की सहमति दे दी है. अस्पताल भी बनेगा. जल्दी ही शिलान्यास के लिए चलेंगे. उनकी छोटी-छोटी आंखें खुशी से चमक रही थीं.
यह दशरथ मांझी थे. जिन्हें मीडिया ने माउंटेन मैन, माउंटेन कटर और न जाने क्या-क्या नाम दे रखा है. बरसों पहले मैं उनसे पहली बार मिला था. वह 1988 का सितंबर था. किसी ने दशरथ मांझी के बारे में बताया कि एक ऐसा भी व्यक्ति है, जिसने लगातार 22 वर्षों तक अकेले अपने हाथों पहाड़ काट कर रास्ता बनाया है. उत्सुकता हुई तो उनकी खोज में लगा और एक दिन मैं उनके गांव की छोटी-सी कुटिया में उनके सामने बैठा था.
-क्या आपने ही पहाड़ी काट कर रास्ता बनाया है? क्या वह रास्ता मुझे दिखायेंगे?- मैं अब भी विश्वास नहीं कर पा रहा था.
-हां, हमने ही पहाड़ी काट कर रास्ता बनाया है- उनके चेहरे पर मासूम-सी मुस्कुराहट चली आयी थी, जिसमें थोड़ी झिझक भी शामिल थी, मानो किसी बच्चे ने गलती से कोई अच्छा काम कर दिया हो और अब उसे स्वीकार करने में झिझक रहा हो. तब उन्होंने वह पहाड़ी और वह रास्ता दिखलाया था. मैं देख कर दंग था. एक चट्टान पर छेनी से पहाड़ी काटने का विवरण लिखा हुआ था. उन्होंने उस पर हाथ रख कर बतलाया- यह देखिए, सारा कुछ इस पर लिखा हुआ है. वहां पहाड़ी काटने का विवरण अवश्य था, किंतु दशरथ मांझी का नाम कहीं नहीं था. हां, उस व्यक्ति ने चालाकी से वहां अपना नाम जरूर लिख दिया था, जिसने छेनी से यह सब लिखा था. तब लगा दशरथ बहुत भोले भी हैं. उनके भोलेपन की कहानियां और भी हैं. पहाड़ी काटने के दौरान लोग उन्हें पागल कहने लगे थे. पत्नी और पिता दोनों समझाते. पत्नी ने उन्हें झिड़का था- तुम पागल हुए हो क्या? तुम्हीं को चिंता है रास्ता बनाने की? और फिर यह दरार तो तबसे है, जबसे यह धरती बनी. पागल मत बनो, चुपचाप जाकर खेतों में काम करो. तब वह हंस कर रह जाते. पिता ने समझाना चाहा, तब उन्होंने कहा था- आज तक हमारा खानदान मजदूरी करता रहा है. मजदूरी करते-करते लोग मर गये. खाना, कमाना और मर जाना. इतना ही तो काम रह गया है. सिर्फ यहएक काम है जो मैं अपने मन से करना चाहता हूं. आप लोग मुझे रोकिए मत, करने दीजिए. उनका काम जारी रहा. बीच में उनकी पत्नी का देहांत हो गया.
-आपकी पत्नी नहीं रहीं, फिर भी आपने पहाड़ी काटने का काम क्यों जारी रखा?
-हां मेरी पत्नी जब मरीं, तो मैं बहुत दुखी हुआ था. मुझे लगा जब वे ही नहीं रहीं, तो पहाड़ क्यों काटूं? लेकिन फिर मुझे लगा मेरी पत्नी नहीं रहीं तो क्या हुआ? रास्ते के बन जाने से कितने लोगों की पत्नियों को फायदा होगा. हजारों, लाखों लोग इस रास्ते से आयेंगे-जायेंगे.
वे सीधे-सादे शब्दों में बहुत गहरी बात बोल गये थे. उन दिनों उनके काम की बहुत ज्यादा चर्चा नहीं थी. उन्होंने आर्यावर्त में छपी एक कॉलम की छोटी-सी खबर दिखलायी थी, जिसमें उन्हें इस काम के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री रामसुंदर दास से 500 रुपये मिलने की चर्चा थी. इस कतरन को उन्होंने बड़े जतन से प्लास्टिक की एक शीट के बीच में रखा था. बाद के दिनों में तो उन पर छपनेवाली खबरों का अंबार लग गया था. उन सारे अखबारों, पत्रिकाओं को वह एक बड़े थैले में हमेशा साथ लिये चलते थे. तब मीडिया में उन्हें अपनी खोज बतानेवालों में भी होड़ लग गयी.
उन्हीं दिनों कोलकाता से एक फिल्म निर्माता का पटना में आगमन हुआ. दशरथ मांझी पर फिल्म बनाने के नाम पर उन्होंने कलाकारों से खूब खुशामद करवायी और पैसे भी ऐंठे. दशरथ को भी उन्होंने सपना दिखलाया. वह फिल्म आज तक नहीं बनी.
दशरथ अद्भुत जीवटवाले थे. मैंने कभी उन्हें खाली नहीं देखा. वे एक ऐसी मोमबत्ती थे जो दोनों सिरों से जल कर रोशनी बिखेर रही थी. उन्हें पेड़-पौधे लगाने का भी बहुत शौक था. उनके लगाये न जाने कि तने पौधे अब पेड़ बन गये होंगे. कभी उन्हें अपने इलाके में चापाकल लगवाने की चिंता होती, तो कभी अस्पताल बनाने की. कभी पुल बनवाने की बात करते तो कभी बिजली पहुंचाने की. अपने परिजनों की चिंता में घुलते मैंने उन्हें कभी नहीं देखा. यद्यपि उनका एक मात्र बेटा अपंग है और बेटी विधवा.
दशरथ जी नहीं रहे. उनके सपने अब भी हैं. मरते वक्त भी उन्हें अपने सपनों की ही चिंता रही होगी. दशरथ जी से जब मैं पहली बार मिला था तो एक जिज्ञासा हुई थी क्या दशरथ इतिहास में दर्ज हो सकेंगे? इसका उत्तर मुझे मिल गया प्रतीत होता है. दशरथ जी जनश्रुतियों का हिस्सा बन गये हैं. बरसों बाद जब कभी कोई दशरथ मांझी की चर्चा करेगा तो मैं भी कह सकूंगा हां, मैं उस महामानव से मिल चुका हूं.
साभार:http://hashiya.blogspot.com/
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