खुदरा पर खुलकर मैदान में
खुदरा कारोबार के संगठित योजना पर असंगठित क्षेत्र ने धावा बोलना शुरू कर दिया है. 22 अगस्त को उत्तर प्रदेश के लखनऊ, मेरठ, मुजफ्फरनगर , अलीगढ़, आगरा, बनारस और इलाहाबाद में राष्ट्रीय व्यापार मंडल के कार्यकर्ताओं और व्यवसाइयों ने शापिंग माल्स के सामने प्रदर्शन किया. बकौल एक प्रदर्शनकारी "हमने तो शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया जब पुलिस ने हमें प्रदर्शन से भी रोका तो तोड़-फोड़ होना लाजिमी है." लखनऊ में ही राष्ट्रीय व्यापार मंडल ने ऐशबाग स्थित स्पेंशर्स के शोरूम को निशाना बनाने का ऐलान किया था लेकिन प्रदर्शन की आशंका को देखते हुए स्पेंशर्स के कर्ता -धर्ता शोरूम पहले ही बंद करके फरार हो चुके थे. प्रदर्शनकारी आलमबाग स्थित रिलांयस फ्रेश में जा पहुंचे और वहां जमकर तोड़फोड़ कर दी. चेतावनी यह कि अगर रिलांयस वाले खुद दुकान नहीं समेटते तो यह कार्य हम व्यापारी कर देंगे . फिलहाल यह काम उत्तर प्रदेश के व्यापारियों को नहीं करना पड़ेगा. क्योंकि अगले दिन यानी 23 अगस्त को मायावती ने एक साहसिक फैसला लेते हुए रिलांयस या फिर किसी भी बड़ी कंपनी के खुदरा स्टोर खोलने पर अगले आदेश तक रोक लगा दी . यह ऐतिहासिक कदम है. मायावती ने एक और अहम फैसले की घोषणा की कि 3 अगस्त को जारी नयी कृषि नीति को लागू नहीं किया जाएगा.
उत्तर प्रदेश में फौरी तौर पर भले ही थोड़ी राहत मिल गयी हो लेकिन देश के दूसरे हिस्सों में अभी भी विरोध जारी है. 9 अगस्त को भी देश के कई महानगरों में धरने प्रदर्शन हुए थे. दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर, रांची जैसे शहरों में एकसाथ प्रदर्शन किया गया था और नारा लगा था कंपनियों खुदरा क्षेत्र से बाहर जाओ . इन धरने प्रदर्शनों में लगभग 35 संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था. खुदरा व्यापार में कंपनियों के प्रवेश के विरोध में जितना कुछ हो रहा है उससे ज्यादा करने की योजनाएं बन रही हैं . राष्ट्रीय व्यापार मंडल के अध्यक्ष और पूर्व सांसद श्याम बिहारी मिश्र कहते हैं "हमने एक नारा दिया है. व्पायारी परिवार शापिंग माल का बहिष्कार करें . बड़ी कंपनियों के खुदरा व्यापार में उतरने से सबसे ज्यादा नुकसान हम व्यापारियों को ही हो रहा है इसलिए हमने सभी व्यापारियों से आह्वान किया है कि उनके परिवार का कोई सदस्य शापिंग माल्स में नहीं जाएगा . इसके साथ ही देशभर में हम शापिंग माल्स पर धरना जारी रखेंगे." व्यापारी संगठनों की योजनाएं व्यापक हैं. बहिष्कार उसका एक हिस्सा मात्र है .
भारतीय उद्योग व्यापार मंडल के अध्यक्ष बनवारी लाल कंछल राज्यसभा सांसद है. वे खुदरा कारोबार के खिलाफ आढ़तियों, व्यापारियों, छोटे दुकानदारों और रेहड़ीवालों को लामबंद करने का काम कर रहे हैं . वे कहते हैं "मैं संसद से सड़क तक अपनी यह लड़ाई जारी रखूंगा." और वे ऐसा कर रहे हैं. 22 अगस्त को लखनऊ में धरने से दो दिन पहले उन्होंने वाणिज्यमंत्री कमलनाथ से मुलाकात की . कमलनाथ ने उन्हें आश्वासन दिया है वे "खुद खुदरा कारोबार में बड़ी कंपनियों के प्रवेश के खिलाफ हैं. और इस बारे में कैबिनेट में चर्चा करेंगे ." बनवारी लाल कंछल दो-चार दिनों में फिर उनसे मिलनेवाले हैं और इस बार कई सांसदों के साथ. हो सकता है वाणिज्यमंत्री ने अभी तक कैबिनेट में चर्चा करने का मन न बनाया हो लेकिन व्यापारियों ने अपने सिरे से काम करना शुरू कर दिया है . खुद कंछल ने दिल्ली में 24 नवंबर से आमरण अनशन का ऐलान किया है. उधर राष्ट्रीय व्यापार मंडल ने भी घोषणा की है वह जंतर- मंतर पर 100 घंटे का धरना देगी. और आगे की रणनीति जंतर-मंतर पर ही तय होगी.
खुदरा व्यापार के असंगठित क्षेत्र के व्यवसायी एकजुट होकर मैदान में आ गये हैं. उन्होंने अपने-अपने हिसाब और क्षमता से विरोध भी शुरू कर दिया है. लेकिन संगठित क्षेत्र क्या कर रहा है? क्या वह चुपचाप बैठा तमाशा देख रहा है? या फिर सरकार में अपनी लाबिंग पर उसे इतना विश्वास है कि लाख-विरोध के बावजूद उसकी भविष्य की योजनाओं पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा . और भविष्य की योजनाएं क्या हैं? साल 2010 तक खुदरा व्यापार को एक लाख करोड़ के हिस्से पर कब्जा. इस कब्जे के लिए पूर्वतैयारियों में कोई कमी नहीं रखी जा रही है . अचानक ही खुदरा कारोबार पर पढ़ने-पढ़ानेवालों का ज्वार पैदा हो गया है. शोध अध्ययन के साथ-साथ प्रशासन , मीडिया और व्यावसायिक संस्थानों की तिकड़ी लगातार यह प्रचारित कर रहा है कि खुदरा कारोबार में बड़ी कंपनियों के आने से देश का बेड़ा पार हो जाएगा.
हाल-फिलहाल में फिक्की ने एक अध्ययन किया है. "संगठित व्यापारः अधूरा एजंडा और आगे की चुनौतियां." इस अध्ययन में कहा गया है " वर्तमान में भारत में खुदरा कारोबार 328 अरब डॉलर का है. वर्तमान में संगठित व्यापार का हिस्सा नगण्य है और वह अधिकांश बड़े शहरों में सिमटा है . कुल संगठित खुदरा व्यापार का 82 प्रतिशत सिर्फ छह शहरों में होता है." इसे और विस्तार देने के लिए फिक्की ने जो योजनाएं तैयार की हैं उसमें मुख्य हैं सरकार अपनी नीतियों में बदलाव करे , श्रम कानूनों को सरल करे, सरकार विदेशी पूंजी निवेश की भी छूट दे, लोगों में खर्च करने और खरीदने की मानसिकता बढ़े, आधारभूत ढांचा और मानव संसाधन का विकास हो. यह आधारभूत ढांचा है माल, सुपरमार्केट, हाईपर मार्केट, छोटी दुकानें , और इन सबको माल पहुंचानेवाली मंडी प्रणाली पर अपना कब्जा. सरकार के कामकाज को देखें तो समझ में आ जाता है कि फिक्की जैसे संगठन अपनी व्यावसायिक लाबिंग में सफल हो रहे हैं.
23 अगस्त को मायावती ने जिस नयी कृषि नीति को वापस लेने का ऐलान किया उसकी घोषणा 3 अगस्त को किया गया था . इसी दिन उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार ने कैबिनेट मीटिंग में इस बात पर विचार किया था कि प्रदेश के किसानों का भला कैसे हो. एजंडे में कई फैसले लिये गये. इन्हीं में एक फैसला किया गया कि "आज के समय में आधारभूत संसाधन के विकास के लिए बड़ी पूंजी बहुत सख्त दरकार है .इसलिए निजी कंपनियां अपनी मंडी प्रणाली विकसित कर सकती हैं. इसके लिए वे ही कंपनियां आवेदन कर सकती हैं जो 500 करोड़ का कारोबार करती हों और 5000 करोड़ रूपये तक के निवेश की क्षमता रखती हों ." यानी अपनी वितरण प्रणाली स्थापित करने के लिए अब कंपनियों को कानूनी लाइसेंस मिल गया है. श्याम बिहारी मिश्र कहते हैं " प्रदेश में कुल 356 मंडी स्थल हैं और हमें एक जिले से दूसरे जिले में जाने पर फिर से लाईसेंस लेना होता है . मायावती सरकार ने इन कंपनियों को एक ही लाइसेंस पर पूरे प्रदेश में खरीद, भंडारण और बिक्री का अधिकार दे दिया है ." असल में यह खुदरा कारोबार की रणनीति का हिस्सा है. जैसा कि फिक्की की रिपोर्ट का जिक्र पहले हो चुका है . रिलांयस पहले ही इस कारोबार में उतर चुकी है और भारत होटेल्स ने 3000 करोड़ के निवेश से कई राज्यों में अपनी मंडी प्रणाली विकसित करने का ऐलान कर दिया है .
इंडिया एफडीआई वाच के निदेशक धर्मेन्द्र कुमार सवाल करते हैं "अगर उत्पादन, भंडारण और विपणन एक हाथ में चला जाएगा तो उपभोक्ता बचेगा कहां? भारतीय कारोबार की विविधता का ही परिणाम है कि एक बड़ा मध्यवर्ग खड़ा हो सका है.एकाधिकारवादी नीतियों से वह सिमटकर कुनबे में तब्दील हो जाएगा." बाकी सारे देश का क्या होगा ? इसका जवाब किसी के पास नहीं है. अभी पूंजी के केन्द्रीकरण का जूनून है इसलिए कोई यह सवाल उठाना भी नहीं चाहता. नवधान्य की निदेशक वंदना शिवा कहती हैं " यूरोप में पूंजी का केन्द्रीयकरण 300 सालों का परिणाम है. 300 सालों के पूंजी के केन्द्रीयकरण को हम भारत में एक साल में आजमाना चाहते हैं . इसके परिणाम बहुत घातक होंगे" वंदना शिवा का यह सवाल प्रासंगिक है कि अगर उत्पादन, भंडारण, वितरण , निवेश और कमाई सबकुछ एक वर्ग के हाथ में रहेगा तो बाकी देश की जनता क्या आत्महत्या कर लेगी?" शायद नहीं. विरोध की शुरूआत यहीं से होती है जिसकी झलक पहले रांची और इंदौर में दिखा अब वही विरोध उत्तर प्रदेश में हो रहा है .
अब सरकार को तय करना है कि वह किसके साथ है. वंदना शिवा कहती हैं "सरकार कारपोरेट घरानों के लिए काम करती है न कि उनके लिए जिनके वोट से वह सत्ता में आती है . विरोध तो होगा. हो सकता है जगह-जगह यह विरोध हिंसक भी हो जाए. सरकार दिल्ली में छावनी बनाकर विरोध का शमन भले कर ले पूरे देश में यह संभव नहीं . सरकार और बड़े कारपोरेट घरानों दोनों के भले में यही होगा कि वे खुदरा कारोबार को खुदरा ही रहने दें. नहीं तो परिणाम बहुत भयानक होंगे." फिलहाल तो यह चेतावनी सुनने की फुर्सत न सरकार को है और न ही कारपोरेट घरानों को .



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