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मैं चाहूं तो तू तोता पाल ले!

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मेरे एक पुराने साईबर मित्र हैं धूमकेतू के समान अकस्मात प्रकट होते हैं और फ़िर लंबे समय तक गायब हो जाते हैं. जब उन्हें भूल सा ही जाता हूं फ़िर अचानक प्रकट हो कर कोई फ़ंडा दे कर गुमशुदा…गुमशुदा!

 वर्जीनिया टेक में हुई त्रासदी ने हथियारों के रखाव पर बहस को ताजा कर दिया है. प्रस्तुत है इसी विषय पर श्री ई-स्वामी का यह आलेख जो कहता है कि वस्तुयें अपने इस्तेमाल को उकसाती हैं.
पिछली बार जब वो मिले तो हम हमेशा की तरह एक दूसरे को फ़लसफ़े  झिलवाने लगे. हम ब्लागर्स में और हाई-प्रोफ़ाईल लेखकों में सबसे बडा फ़र्क ईमानदारी का होता है - अगर हम किसी और के फ़ंडे बांटते हैं तो सोर्स पहले बताते हैं. और तो और पर्देफ़ाश करने से भी नही चूकते. हां, तो हम फ़लसफ़े भी बता रहे थे और उनका सोर्स भी.

मैने मित्र को बोला की अधिकतर कोई भी काम तब तक नहीं होता जब तक वो एक बार विचारों में, कल्पनाओं मे अपना स्थान ना ले ले! लेकिन कभी कभी कोई क्रिया इसलिये होती है की उसके लिए बस माहौल तैयार था. तो माहौल क्रिया का जनक है या विचार?

मित्र बोले यार कथा कहो.
हमने सुनाई - “बंजर मे बाग उगाना हो तो ये सोच कर नही बैठ सकते की बंजर मे बाग नही उगते. पत्थर हटाओ कंकर हटाओ, जमीन के टुकडे पर मिट्टी उलट पलट कर प्रार्थना और इंतजार करो. शायद कोई बदरी बरसे, कोई पुराने बीज फ़ूट पडें बाग हो जाए!” माहौल बनाने की देर है - किस्मत में हो यदी बाग तो मेहनत और दैव से मिल जाए!” (रजनीश की किसी किताब में पढा था, काम आ गया)

मित्र बोली ठीक है - लेकिन बाग से पहले बाग का विचार जरूरी था - था ना!
मैनें बोला हां था तो. तो वो बोले लेकिन विचार किसी और का हो और क्रिया कोई और करे संभव है अगर माहौल बना दें!

वो बोले अब विचार के बीज पर एक छोटी कथा सुनो. उन्होने कहा कथा कच्ची-पक्की याद है पर संदेश देने के लिए काफ़ी होगी सो वो शुरु हुए - 

दो मित्र थे. एक ने दूसरे से कहा “अगर मैं चाहूं तो तू तोता पाल ले!”
दूसरा मित्र बोला - “भई कैसे?”
पहले मित्र ने कहा की मैं तुम्हें तोता नही दूंगा एक पिंजरा दूंगा और तुम खुद उस में तोता डाल दोगे.

तो पहले मित्र ने दूसरे मित्र को एक सुंदर सुनहरा पिंजरा दिया और बोला इसे इसका दरवाजा खोल के अपने ड्राईंग रूम में रख देना - देट्स इट!

तो दूसरे मित्र नें पिंजरा ड्राईंग रुम में रख दिया. एक दिन घर में मेहमान आए. पिंजरा देख के बोले “वाह कितना सुंदर पिंजरा है - अद्भुत!” “आपका तोता मर गया है क्या? पिंजरा खाली है!” अब ये बोले की नही खाली ही था. कुछ दिन बाद फ़िर कोई और मेहमान आए, वही बात -”मैंने ऐसा सुंदर पिंजरा आज तक नही देखा” “आपका तोता उड गया है क्या? पिंजरा खाली है! तोता होता तो और भी सुंदर लगता” अब जब भी कोई महमान आने वाले होते तो ये बंदा परेशान हो जाता - “आते ही पिंजरे की बात करेंगे! .. ये तो एक दम कन्वर्सेशन पीस है”  लेकिन अब तो बात तोते से शुरु होने लगी… “आपका तोता क्या हुआ? पुराना ना लौटे,नया ही डाल दो” अब बंदे को एहसास होता है की साला काल्पनिक तोता अपनी अनुपस्थिती में ज्यादा तंग कर रहा है और देखा जाए तो उपस्थित ही है! उसका जिक्र है बल्की उसकी उपस्थिती में जितना होता उससे अधिक जिक्र है! विचार आने लगा की मित्र आपस में मौज ना लेने लगें - “यार ये पहला है जो ड्राईंग रूम में खाली पिंजरा सजाए है!” तो दूसरे मित्र नें नौकर को बुला कर कहा इस पिंजरे मे एक तोता ला कर डालो यार!

कथा सुना कर ’धूमकेतू’ बोले “पिंजरा अगर हो तो तोता आ सकता है - अगर सही माहौल बने तो!” फ़िर विचार कोई और करे और तोता कोई और पाले - माहौल बनाने की बात है!

हाल ही में प्रवीण महाजन नें प्रमोद महाजन को गोलीयां मारीं. मेरे अनुभव में यह तीसरी घटना है जब कोई ऐसा व्यक्ति जो हमेशा अपने साथ बंदूक रखता है उसने अचानक एक दिन अपने किसी प्रिय की ही जान ले डाली! जान लेने का विचार अधिक हावी था या जान लेने के हथियार की उपस्थिती? मेरा सोचना है की आप कमजोर मनोबल या अधिक कल्पनाशील वाले किसी को भी बंदूक दे दो और उसके प्रयोग का माहौल बना दो वो उसका प्रयोग कर जाएगा.  जिसके खीसे में २४ घंटे बंदूक बंधी है उसके विचार आयेगा ही की बिना प्रयोग के इसे बांधना व्यर्थ है. बंदूक की उपस्थिती उस पिंजरे की उपस्थिती की तरह है - कोई निशाना बन ही जाएगा. बंदूक है अगर पास तो उसके प्रयोग का कोई कमजोर सा कारण भी कल्पनाओं में उसे प्रयोग कर लेने का नाटक रच जाएगा. बंदूक खरीदी ही इस लिए गई थी की उसके प्रति किसी प्रकार का आकर्षण था. 

जिस ब्राउनिंग .३२ को दिखाने की गरज से ही तान दिया जाए उसका प्रयोग होना तय है!जो आदमी हमेशा बंदूक बांध के रखे हो, उसे दिखा कर लोगों को इम्प्रेस करता रहा हो उसने कभी किसी से जरूर सुना होगा की “बस बांधी ही है या कभी इस्तेमाल भी किया है?” या “पास रखने और चलाने मे फ़र्क है - बंदूक का घोडा दबाना हर एक के बस की बात नहीं” - विचार कहीं से भी क्रीप-इन हो सकता है! जब लोगों को कहते सुनता हूं की बंदूकें किसी की जान नही लेतीं, लोग लेते हैं! तो लगता है इन्हें पता नही शायद की बंदूक की सतत उपस्थिती उसके इस्तेमाल हो जाने के विचार को कितना बलवती करती है इसका उन्हें क्या भान नहीं? ये बिल्कुल पिंजरे बनाओ और कभी ना कभी तोता अएगा ही वाला मामला है!

हां अब प्रवीण और प्रमोद के संबंधों और व्यक्तित्वों का एनालिसिस पेरालिसिस होता रहेगा लेकिन काश कोई इस पर भी खोज करता की बंदूक की सतत उपस्थिती का घोडा दबने से क्या कोई संबंध नही रहा था? क्या अपनी गुस्सैल छवि का, जो उसी बंदूक की सहायता से गढी गई थी, खुद वे शिकार नही हो गए! हथियारों की सतत उपस्थिती में हिंसा का होना जाना मेरी निगाह में कुछ कुछ एनादर इवेन्ट आफ़ अ सेल्फ़-फ़ुलफ़िल्लींग प्रोफ़ेसी जैसी चीज है! हर एक को कनूनी रूप से अनुमति ले कर हथियार रखने की स्वतंत्रता होनी ही चाहिए लेकिन धारक की मनःस्थिती मे आने वाले बदलाव और उसके परिणामों को कोई नियंत्रित नही कर सकता है!

साभार : http://hindini.com/eswami/?p=76

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