दरियागंज का पटरी किताब बाजार
मैं कहीं भी जाता हूं वहां सबसे पहले किताबों की दूकान देखता हूं. रजनी मेरी इस आदत से बहुत परेशान है. (वह मेरी किताबों को रद्दी कहकर पुकारती है.) दिल्ली पुस्तक प्रेमियों का स्वर्ग है. लेकिन आप मुझे बतायेंगे कि आप किताबें कहां से खरीदते हैं? शुरूआत मैं खुद से करता हूं.
दरियागंज का पटरी बाज़ार किताबें खरीदने का सबसे अच्छा स्थान है. पहले तो यह लोहे के ओवरब्रिज से लेकर दिल्लीगेट तक लगता था लेकिन अब यह और लम्बा होकर डिलाइट से भी काफ़ी आगे फ़ैल गया है. यहां आपको हर तरह की किताबें मिल जायेंगीं. यहां के हर विक्रेता की अपनी विशेषता है. साहित्य, कम्पटीशन, शैक्षणिक, पर्यटन, व्यापार जिस भी विषय पर आप किताबें चाहेंगे, आपको मिल जायेंगी. यहां के कुछ अच्छे किताब विक्रेताओं के अपने गोदाम हैं जिनमें आप सप्ताह के शेष दिनों में भी जा सकते हैं. कोतवाली के सामने, पंजाब नैशनल बैंक के दरवाजे पर बैठने वाले औंकार भाई के गोदाम में अगर आप चले गये तो आश्चर्यचकित हो जायेंगें. तो अगले हफ़्ते आप यहां आईये जरूर. वैसे आजकल यहां अमेरिकन लाइब्रेरियों की डिस्कन्टीन्यूड किताबें आयी हुईं है और आपको अच्छी अच्छी किताब केवल तीस तीस रुपये में मिल जायेंगी. (अमेरिकन लोग ज्यादा नहीं पढते इसका सबूत ये किताबें है जो कभी कभी तो एक बार भी नहीं खुली होंगीं)
एक और बात.
यहां पर हिन्दी की किताबें इंग्लिश की किताबों से ज्यादा महंगी मिलती हैं. जिस भी विक्रेता के पास हिन्दी की किताबें आती हैं वह उन्हें धीरे धीरे निकालता है ताकि अच्छे पैसे वसूल कर पाये. आजकल हिन्दी की किताबें ज्यादा छप नही रहीं है. आम तौर पर यह लाइब्रेरी की डिसकन्टीन्यूड पुराना माल होती हैं. हिन्दी की किताबों पर ज्यादा मोल भाव भी नहीं होता.
पटरी से खरीदते समय शर्माना मत.
मैंने यहां खुशवन्तसिंह जैसे ढेरों बडे लेखकों, प्रोफ़ेसरों आदि को यहां से किताबें खरीदते देखा है. अभी पिछले हफ़्ते मुझे मेरे परिचित डिप्टी इन्कमटैक्स कमिश्नर यहां किताबें टटोलते मिले.
आखिरी बात.
गाडी को कभी सडक पर पार्क न करें. ट्रेफ़िक वालो की सर्विस बडी टेरिफ़िक है. वो आपकी गाडी को तुरन्त उठा ले जायेंगे. इसे किसी पार्किंग प्लेस में ही खडी करके आये.



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Comments (2 posted):
Thanks a lot
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