हिन्दी के दुश्मन
आज हिन्दी की स्थिति त्रिशंकु की है। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान उसे राष्ट्रभाषा बनाने की मांग हुई और स्वाधीन भारत की वह राजभाषा बना दी गई। जैसे त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग जाने के लिए कहा गया था, लेकिन उसे अचानक बीच में इस तरह रोक दिया गया कि न वह स्वर्ग जा सका और न धरती पर वापस आ सकता था, वैसे ही हिन्दी को बना दिया गया है। वह न तो राजभाषा का दर्जा पाकर स्वर्ग जा सकती है और न ही गिरकर धरती पर आ सकती है। कभी-कभी लगता है कि भाषा के क्षेत्र में हिन्दी की स्थिति भारत के राष्ट्रपति जैसी है और अंग्रेजी को प्रधानमंत्री की हैसियत प्राप्त है। हिन्दी एक सम्मानजनक पद पर तो है, पर व्यवहार में दूसरे दर्जे पर है और सारे अधिकार अंग्रेजी के पास है। यह एक ऐसी हकीकत है जिसे बदलने का कोई तरीका फिलहाल दिखाई नहीं पड़ रहा। ऐसे में हमारा समूचा देश द्विभाषी होने के लिए अभिशप्त है।
आजादी के बाद हमारे देश में एक बड़ा मध्यवर्ग पैदा हुआ है। वह ताकतवर है। उसकी ताकत और यहाँ तक कि आजीविका भी मुख्यत: अंग्रेजी पर ही टिकी हुई है। शासन और इस ताकतवर तबक़े का एक गठजोड़ बन गया है जो निरंतर हिन्दी के लगभग नहीं के बराबर प्रयोग होने वाले एक-दो शब्दों को पकड़कर पूरी हिन्दी भाषा का मजाक उड़ाता है। राजभाषा होने के कारण भी हिन्दी को विरोध का सामना करना पड़ता है। आम तौर पर राजसत्ता का विरोध करने की एक प्रवृत्ति होती है। चूँकि राजसत्ता भ्रष्ट हो गई है, इसलिए कई लोग हिन्दी को भी इस भ्रष्टाचार में शामिल कर लेते हैं। कहा जाता है कि राजभाषा खाने-कमाने का धंधा बन गई है यानी समाज और राजनीति में आई हर तरह की गिरावट को हिन्दी के साथ जोड़कर देखने की हवा सी चल पड़ी है। यह हवा हमारे देश में सत्ता प्रतिष्ठान पर क़ाबिज़ वही अँग्रेज़ीदाँ तबक़ा बना रहा है, जिसका हिन्दी विरोध में खुद का स्वार्थ छिपा है।
एक जमाने में यह भी कहा गया कि हिन्दी ने उर्दू को खत्म कर दिया। चूँकि हिन्दी हिन्दुओं की भाषा है, इसलिए वह मुसलमान विरोधी है। इसी तरह हिन्दी को वर्चस्ववादी बताकर अन्य भारतीय भाषाओं के विरोध में भी खड़ा करने का प्रयास किया गया। हिन्दी के विरुद्ध सबसे ज्यादा दुष्प्रचार उन प्रचार माध्यमों ने किया, जिन पर अंग्रेजी का वर्चस्व है। हिन्दी विरोध से उनका व्यावसायिक हित जुड़ा है। यह अनायास नहीं है कि आज विश्व के जिन देशों में सबसे ज्यादा अंग्रेजी के लेखक पैदा हुए हैं, उनमें भारत ऊपर है। सिर्फ साहित्य ही नहीं, बल्कि समाज, राजनीति, अर्थ और ज्ञान-विज्ञान के अन्य विषयों पर दुनिया के सारे बड़े प्रकाशक भारतीय लेखकों की अंग्रेजी किताबें छाप रहे हैं और भारत को इसका एक बड़ा बाजार बनाने के अभियान में जुटे हैं। चूंकि हिन्दी की लोकप्रियता को घटाये बगैर भारत में अंग्रेजी का बाजार नहीं बढ़ेगा, इसलिए देश का अँग्रेज़ीदाँ तबका हिन्दी का विरोध कर रहा है।
एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि ग्लोबलाइजेशन के युग में अब राष्ट्र-राज्य की अवधारणाएं लगभग खत्म हो गई हैं। भारत भी अब एक राष्ट्र नहीं रहा। वह कई क्षेत्रीय अस्मिताओं का पुंज है। चूँकि एक राष्ट्र की बात ही खत्म हो रही है और उसके टुकड़े ज्यादा महत्वपूर्ण हो रहे हैं, तो फिर एक भाषा की जरूरत क्यों? हिन्दी को क्यों राष्ट्रभाषा माना जाए? जरूरत एक संपर्क भाषा की है जो अंग्रेजी ही हो सकती है। चूंकि यह अंतर्राष्ट्रीय संपर्क भाषा भी है, इसलिए इसे भारत की संपर्क भाषा बनाने से फायदा ही होगा। राष्ट्र-राज्य को समाप्त मानने वाली यह धारणा दुर्भाग्य से उन तथाकथित धर्मनिरपेक्ष अंग्रेजीदाँ बौद्धिकों की है जिन्होंने दो दशक पहले ‘सबाल्टर्न स्टडीज’ नाम से इतिहास लेखन के क्षेत्र में एक नये ‘स्कूल’ की स्थापना की थी। ये लोग अंग्रेजी में सोचते हैं और अंग्रेजी का ही खाते हैं। पश्चिम की नकल करते हैं और अपने समाज से कटकर वहीं के समाज में अपनी जड़ें तलाशते हैं। इस तबक़े ने जो नया दर्शन गढ़ा है उसे मैं ‘खंड-खंड पाखंड’ कहता हूँ। यह दर्शन न सिर्फ अंग्रेजी के वर्चस्व और पश्चिमी विचारधारा की रक्षा करता है बल्कि परोक्ष रूप से नवउपनिवेशवाद का हिमायती भी है।
इसलिए हिन्दी का प्रश्न सिर्फ अपनी भाषा के प्रति मोह का नहीं है बल्कि इसका संबंध एक नए किस्म के उपनिवेशवादी सोच के विरुद्ध लड़ने से भी है। दुर्भाग्य है कि इनमें से ज्यादातर अंग्रेजीदाँ बौद्धिक हिन्दी भाषी क्षेत्र के ही हैं। इसलिए मैं तो कहता हूँ कि हिन्दी को आज सबसे बड़ा खतरा हिन्दी क्षेत्र में जन्मे लेकिन वहाँ की जमीन से कटे इन अंग्रेजीदाँ बौद्धिकों से ही है। हिन्दी का सबसे बड़ा रिश्ता हिन्दी भाषी समाज से है। यह समाज सबसे पिछड़ा समाज माना जाता है और इसे ‘गोबर पट्टी’ कहा जाता है। इस इलाके का औद्योगिक विकास नहीं हुआ है, शिक्षा का प्रसार नहीं हुआ, साक्षरता नहीं फैलाई गई, सबसे ज्यादा दरिद्रता भी यहीं है। इसलिए केवल भाषा पर नहीं, बल्कि इन सारे सवालों पर हिंदी क्षेत्र में आंदोलन छेड़ने की जरूरत है। कुछ-कुछ जयप्रकाश नारायण की सम्पूर्ण क्रांति जैसा नारा देना पड़ेगा और एक ऐसे नवजागरण की शुरुआत करनी पड़ेगी जो जीवन की बुनियादी जरूरतों के साथ-साथ सांस्कृतिक विकास तक को संबोधित करे। दुर्भाग्य से आज कोई भी राजनीतिक दल इसको करने के लिए तैयार नहीं है, इसलिए नए किस्म के मंच बनेंगे और नई संस्थाएं बनेंगी। राजभाषा के नाम पर बनी पुरानी पड़ चुकी संस्थाओं की जगह ये नई संस्थाएं ही लेंगी।
साभार : http://srijanshilpi.com/?p=47



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