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भारतीयता और भारतीय बैंक

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जब से ये विदेशी बैंक आये है हम तो कसम से बहुत नाराज है सरकार से.  पुराने दिन याद आते है.  एक मुहिम होती थी बैंक मे खाता खुलवाना.  कई दिन चक्कर काटो.  मैनेजर साहब से मिलो वो ऐसे देखते थे बायफ़ोकल लेन्स से,  जैसे चीटी का. 
खुर्दबीन से मुआयना करती हुई आखे और सामने गिडगिडाते हम फ़िर सवालो के जवाब दो. 
क्यो खुलवाना चाह्ते है आप खाता..?
पैसे जमा करने है
(है आपके पास जमा करने के लिये? लगता तो नही!)
चलो मान लिया पर इसी बैंक मे क्यो, आप अपने घर के पास खुलवाओ. 
जी घर बगल मे है. 
अरे लेकिन दिन भर तो आप अपने काम पर रहते है काहे परेशान होंगे आफ़िस के पास वाले बैंक मे खुलवाईये. 
जी मेरी दुकान भी आप ही के पास है. 
ठीक है अगले हफ़ते आना अभी फ़ार्म नही है . 
जी मेरे पास है मैने कल ही चपरासी से ले लिया था. 
चलो दे दो भर कर. 
अब आपका गारंटर कौन होगा.  किसी दो साल पुराने खाता धारक से अपना फ़ार्म साईन करा कर लाईये. 
राशन कार्ड की कापी लगाईये,  फ़ोटो अटेस्ट करा कर लगाईये.  पैन नंबर है वो भी लगाईये
जी ये रहे. 
अच्छा देखिये बुरा मत मानियेगा, हम तो बस यही कोशिश करते है कि देख भाल कर आप जैसे अच्छे लोगो का खाता ही अपने बैंक मे खोले. 
जी धन्यवाद. 
अब आप ही बताईते इतनी मेहनत के बाद आप किसी भी दफ़तर मे चले जाये आप निराश नही होगे. 
आपको लगातार आदत पडी रहती थी हर जगह से हर महकमे से अपना काम कराने की.  मै तो बैंको को ट्रेनिंग सेंटर मानता था.  अपने सभी कर्मचारियो को (जिनका वास्ता किसी भी प्रकार के बाह्य कार्य से पडता था) ये ट्रेनिंग ले लेने के बाद कभी कोई शिकायत नही आई.  मेरे ग्राहक और उनका स्टाफ़ हमेशा मेरे स्टाफ़ की बढ़ाई करते थे.  चाहे कितनी देर बैठालो कितने बहाने बनालो ये लोग कभी निराश नही होते, अपना काम करा ही लेते है. 
अब कहा नये बैंको मे कहा वो बात. 
कमबख्त इतना साफ़ सुथरा रखते है जैसे हम किसी होटल मे पहुच गये हो पाच सितारो वाले.  अरे हमे आदत है अपने जैसे माहोल मे रहने की कई बार तो डर लगता है कि कोई पकड कर बाहर ना करदे.  जब तब कोनो मे पेंटिग ना दिखाई दे आदमी सीट पर ना दिखाई दे ढूढ कर लाना पडे, वो भॊ घण्टॊ की मशक्कत के बाद. 
और फ़िर बहाने ना मिले पैसे जमा करलो
नही अभी नही पेन आ जाने दो,
मेरा लेलो
क्यू क्यो ले ले बैंक का काम करते है उसी के पेन से काम करेगे
भाइ मुझे जल्दी है. 
मैनेजर से बात करो. 
जी आज पो पेन है आपके पास. 
तो..?
जी पैसा निकालना था. 
जब जनरेटर चलेगा तब आना. 
लेकिन उसकी जरुरत कहा है, रोशनी भी है, और सरदी मे पंखे तो चलते नही. 
ये मेंनडेटरी रिकवायर मेंट है आप समझ जाते तो यहा नही होते. 
जी. 
तब दिन के कामो मे ये एक बडा और खास काम होता था.  एक आदमी रखना पडता था
चैक जमा करने के लिये, स्टेटमेंट लेने के लिये.  अब, अब तो इन बैंको ने सत्यानाश फ़ेर दिया. 
नौकरी तक खा गये अगले की कही भी रास्ते मे रुको डिब्बे मे चैक डाल दो.  जेब से कार्ड निकालो पैसा ले लो.  सारा मजा ही किर किरा हो गया है. 
वो दिन भी क्या दिन थे! सुबह सुबह घर से निकल कर बैंक जाना लाईन मे लगना,  नम्बर आने पर पता चलाना लंच हो गया है.  एक डेढ घण्टे बाद कैशियर साहब ने आना.  पैसा नही है मंगाया है
टोकन लेकर इंतजार करना,
सुनो इतना ज्यदा चाहिये मैनेजर से बात करो वही पास करेगा. 
फ़िर मेरे पास तो यही है फ़टे वापस करने है तो मैनेजर को करो, लगता था पैसो की वैल्यू है.  अपना कमाया हुआ पैसा भी बैंक कितनी मुश्किल से देता है हमारा कितना खयाल रखता है.  अब पहले तो आने ही नही देते बैंक मे आप फ़ोन करो आपके पास हाजिर.  चले भी जाओ .  तो कोई मौका नही टिकने देने का.  कितने सुंदर सुंदर लोग भर्ती कर रखे है फ़िल्मी माडल जैसे पर नामुराद बैठने ही नही देतेऔर अगर बैठ ही जाओ तो खुद उठ कर आ जाते है "बताईये मै आपकी क्या सेवा कर सकता हू...  ?"
खामखा इतना पैसा खराब किये है जब वहा रुकने ही नही देना था तो..?
जाते ही, जी बस यहा एक साईन और कर दीजिये, ये लीजीये नोट,  इस लिफ़ाफ़े मे रख लीजीये/आप का डी डी ये रहा/(अब निकलिये)
शुरु शुरु मे तो मुझे यकीन नही होता था, मुझे लगता था जो काम पहले दिन भर मे होता था अब कैसे इतनी जल्दी हो रहा है, जरूर ये कोई नकली डी/डी थमा रहे है
हाय अपने पुराने बैंको मे तो पुरा दिन की मेहनत लगती थी.  बहाना बनाने की एक अच्छी खासी जगह का कबाडा कर दिया.  पहले हम दिन भर बैंक के नाम से गायब रह जाते थी और सब मान लेते थे की मेहनती है पर अब..... 
पर आज भी एक जगह है जहा आप पुराने दि्नो की सुनहरी यादो को दोहरा सकते है.  कोई चालान स्टेट बैक से जमा कराना.  अगला पूरा दिन कबाडे की तरह फ़ैले कागजो मे से ढूढ कर लाना बहुत मेहनत भरा काम होता था.  आज भी है,   और सरकार ने चाहा तो कल भी रहेगा. 
यहा आकर लगता है वापस आ गये अपनो के बीच, अपनी दुनिया मे.  घुसते ही जगह जगह दिवारो पर वही पुरानी जानी पहचानी पेंटिंग, नथुनो मे घुसती सीलन भरे कागजॊ की खुशबू, पेशाबघर का रास्ता बताती चिरपरिचित गंध.  हर जगह बेतरतीब पडी फ़ाईले.  झुंड बना कर बतियाते लोग. 
कुछ पूछने की कोशिश पर घूरती निगाहे. 
जाओ बाबा आगे जाओ, देखते नही बात कर रहे है. 
जोर जोर से होती बातो से भरे हुये शोर, और धूल से भरी हुये काउंटर आपको पूरा एहसास अपने देश का ही देगे. 
आप किसी सरकारी जगह चले जाओ अस्पताल से लेकर बस अड्डा, रेलवे स्टेशन सब जगह आप को अपनत्व मिलेगा.  और मिलेगा एक भरोसा, अपनो के बीच होने का.  पेशाबघर जाना है किसी से पूछने की जरुरत नही नाक आप को सीधे पहुच देगी. 
जहा आपको पेशाब घर तक ढूढना पडे.  मिलने पर करने से डर लगे.  खैनी खाकर थूकने तक पर पंगा होने का डर हो वहा काहे की आजादी काहे का अपनापन. 
आशा है अब आप मेरी इन बैकों से चिढ का समर्थन अवश्य करेगे, इनको विरोध की मुहिम मे
आखिर आप भी तो भारतीय ही है ना ..?

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