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कल का कर्ज - II

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ये कहां आ गए हम
देश के जीडीपी में कृषि का योगदान घटते-घटते 18 फीसदी पर आ गया है, जबकि देश की 60 फीसदी से ज्यादा आबादी अब भी कृषि से रोजी-रोटी जुटाती है। होना ये चाहिए था कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में घटते योगदान के अनुपात में कृषि पर निर्भर आबादी का अनुपात भी घट जाता, लोग कृषि से निकलकर औद्योगिक गतिविधियों में शामिल हो जाते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। ऐसा क्यों नही हुआ, ये पहला यक्ष प्रश्न है।

खैर, इसका नतीजा ये हुआ है कि जो योगदान 18 फीसदी लोगों को देना चाहिए था, उसमें 42 फीसदी अतिरिक्त आबादी फंसी हुई है। इसका प्रभाव-कुप्रभाव आप गांवों में ताश खेलते लोगों, गांव के पास के बाजार में सुबह से शाम तक पान और चाय की दुकानों पर मजमा लगाए लोगों में देख सकते हैं। खाली दिमाग शैतान का घर होता है तो यही खलिहर लोग आज अपहरण और वसूली जैसे अपराधों का रुख करने लगे हैं। उत्तरांचल की तराई से लेकर उत्तर प्रदेश और बिहार में बढ़ते अपहरण की एक वजह कृषि में बेकार उलझी पड़ी आबादी है।
लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान, जय किसान का नारा बहुत सोच-समझ कर दिया था। पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक गरीब परिवार से आने के कारण शायद उनमें किसानों की बढ़ती दुर्दशा की अच्छी समझ थी। जानकार भी मानते हैं कि महत्व के लिहाज से देश के लिए कृषि का स्थान रक्षा के बा
 द दूसरे नंबर पर है। लेकिन संविधान में कृषि को राज्यों की सूची में डाल रखा गया है। और, कृषि के ‘स्टेट सब्जेक्ट’ होने के कारण इसमें केंद्र सरकार की स्थिति नीतिवचन या अनुदान जारी करने तक सीमित है। इसी बहाने अक्सर केंद्र सरकार कृषि के बुनियादी सवालों से कन्नी काट जाती है। हर साल के बजट में कृषि क्षेत्र के विकास का ढोल पीटनेवाले वित्त मंत्री कृषि को राज्यों की सूची से निकाल कर समवर्ती सूची में क्यों नहीं ला रहे, ये दूसरा यक्ष प्रश्न है।

वैसे, कृषि के राज्य-सूची में रहने के अपने फायदे हैं। वाममोर्चा इसी की बदौलत पश्चिम बंगाल में ऑपरेशन बर्गा और केरल में नए किस्म के भूमि सुधार लागू कर सका। ये अलग बात है कि उन्होंने भी जोतनेवालों को जमीन का बटाईदार बनाया, मालिक नहीं। और वो मालिक नहीं थे, इसीलिए नंदीग्राम और सिंगूर में कोहराम के हालात पैदा हो गए। और, ये सिलसिला थमने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है। कृषि पर निर्भर 60 फीसदी आबादी के आधे से ज्यादा हिस्से (63% यानी 41 करोड़ लोगों) के पास एक हेक्टेयर (2.5 एकड़) से कम जमीन है, जबकि 10 हेक्टेयर (25 एकड़) से ज्यादा जमीन वाले किसानों की आबादी महज दो फीसदी है। भूमि सुधारों और जोतनेवालों को जमीन का नारा देनेवाले वामपंथी सरकारें कृषि के स्टेट सब्जेक्ट होने और बीसियों साल से सत्ता में रहने के बावजूद इस विसंगति को दूर क्यों नहीं कर पायीं, ये तीसरा यक्ष प्रश्न है।


 मजे की बात ये है कि वामपंथी ही नहीं, वामपंथियों की जन्मजात दुश्मन विश्व बैंक जैसी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएं भी भूमि सुधारों की पक्षधर हैं। ये अलग बात है कि उनके भूमि सुधार का मकसद भारत में कृषि जमीन का बाजार बनाना है, ताकि आसानी से उसकी खरीद-फरोख्त हो सके और बड़े कॉरपोरेट घराने जब चाहें तब आसानी से बेरोकटोक ढंग से हजारों एकड़ जमीन खरीद कर इस देश से लघु और सीमांत किसानों के ‘अभिशाप’ को खत्म कर सकें। वैसे, विश्व बैंक पंडित नेहरू के जमाने यानी पहली पंचवर्षीय योजना से ही खेती में घुसपैठ कर रहा है। तमाम सरकारी ट्यूबवेल उसी की आर्थिक सहायता से लगाए गए थे। यहां तक कि ट्यूबवेल की तरफ जानेवाली ज्यादातर सड़कों पर आप बोर्ड देख सकते हैं, जिन पर लिखा होता है, विश्व बैंक की आर्थिक सहायता से निर्मित। हरित क्रांति भी विश्व बैंक के संरक्षण में चलाई गई थी, लेकिन इसका कितना फायदा हुआ और कितना नुकसान, इसकी सच्चाई आप जानेंगे तो चौंक जाएंगे।

और, तूँ हमार हड्डी चिचोरत हया

 आप बीएसपी के दूसरे मतलब बिजली-सड़क-पानी से तो वाकिफ होंगे। लेकिन क्या आप जानते हैं कि एलपीजी यानी लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस का दूसरा मतलब क्या होता है? मैं भी नहीं जानता था। वो तो जमीन के सवाल पर इंटरनेट में गोता लगा रहा था तो इसका भेद खुला। लिबरलाइजेशन, प्राइवेटाइजेशन, ग्लोबलाइजेशन। बड़ा अफसोस हुआ कि नब्बे के दशक से देश में जारी इस सर्वव्यापी प्रक्रिया का संक्षिप्त रूप ही मुझे पता नहीं था। खैर, देश में जब से ये एलपीजी आई है, तभी से हम शहरी पढ़े-लिखे लोगों की नजर में जमीन हाउसिंग, पूंजी निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने का साधन भर रह गई है।

हम भूल गए हैं कि जमीन महज अनाज, दलहन और तिलहन उपजाने का साधन नहीं है, बल्कि इसका गहरा नाता आजीविका, समता, सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा से है। असल में जमीन सभी आर्थिक गतिविधियों का आधार है। इसका इस्तेमाल या तो देश के आर्थिक विकास और सामाजिक समता के लिए जरूरी परिसंपत्ति के रूप में किया जा सकता है या यह कुछ लोगों के हाथों में देश की आर्थिक आजादी का गला घोंटने और सामाजिक प्रगति को रोकने का साधन बन सकती है।

अंग्रेजों ने दो सौ सालों के शासन में भारत के साथ यही किया। वैसे, यही पर एक प्रसंग याद आ गया जो इलाहाबाद की बारा तहसील के मेरे एक मित्र शिवशंकर मिश्र ने सुनाया था। सन् साठ के आसपास की बात है। शिवशंकर के गांव के पास जवाहर लाल नेहरू एक जनसभा में भाषण दे रहे थे कि अंग्रेजों ने हमारा खून पी लिया, तभी भीड़ में से सुमेरू पंडित नाम के एक सज्जन ने चिल्ला कर अवधी में कहा – और तूँ हमार हड्डी चिचोरत हया। फिर तो सुमेरू पंडित को पकड़कर पुलिस वालों ने ऐसी धुनाई की कि पूछिए मत। खैर, इसके बाद सुमेरू इलाके में अपनी दबंगई के लिए सन्नाम (विख्या त) हो गए।

नेहरू के दौर से ही हमारी सरकारें आर्थिक सुधारों के लिए विश्व बैंक जैसी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं के शरण में चली गईं। नब्बे के दशक से तो ये रफ्तार कुछ ज्यादा ही तेज हो गई है। आपको याद ही होगा कि साठ के दशक में इसी विश्व बैंक के निर्देशन में देश में हरित क्रांति लागू की गई थी। इसमें उसका साथ दिया था अमेरिका की बदनाम एजेंसी यूएसएड (यू एस एजेंसी फॉऱ इंटरनेशनल डेवलपमेंट) ने। खाद, बीज, कीटनाशक और ट्रैक्टर जैसी मशीनरी का इस्तेमाल इसके केंद्र में था। विश्व बैंक ने इनके आयात के लिए जमकर कर्ज मुहैया कराया। बहुत से अर्थशास्त्रियों ने भारत सरकार को इस ‘क्रांति’ के जोखिम से आगाह किया। लेकिन सरकार ने बिना कोई परवाह किए 1966-71 की चौथी पंचवर्षीय योजना में हरित क्रांति के लिए 2.8 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा मुहैया कराई, जो ठीक इससे पहले की तीसरी पंचवर्षीय योजना में समूचे कृषि क्षेत्र के लिए किए गए आवंटन के बनिस्बत छह गुना से भी अधिक थी।
हरित क्रांति ने यकीनन देश में खाद्यान्नों की उपलब्धता बढ़ा दी। भारत अनाज के आयातक से निर्यातक में बदल गया। लेकिन इसने हमारे किसानों को सब्सिडी, कर्ज, मशीनरी, हाई यील्डिंग वेरायटी के बीज और रासायनिक उर्वरकों जैसी बाह्य लागत सामग्रियों का मोहताज बना दिया। इस पर ज्यादा विवरण आप
चौखंभा पर देख सकते हैं।

 लेकिन यहां मैं वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट के द्वारा 1994 में प्रकाशित एक अध्ययन रिपोर्ट का जिक्र करना चाहूंगा। इसके मुताबिक हरित क्रांति में अपनाए गए तौर-तरीकों से भारत का खाद्य उत्पादन 5.4 % बढ़ गया, लेकिन साथ ही इससे देश की तकरीबन 85 लाख हेक्टेयर यानी 6 % फसली जमीन अतिशय जलभराव, लवणता या क्षारीयता के चलते हमेशा-हमेशा के लिए बरबाद हो गई। हरित क्रांति से गेहूं का उत्पादन बीस सालों में दोगुना और धान का उत्पादन डेढ़ गुना हो गया। इसके तहत गन्ने और तंबाकू जैसी व्यावसायिक फसलों पर खूब जोर दिया गया। लेकिन ज्वार, बाजरा, सांवा और कोदो जैसे अनाजों का बंटाधार हो गया, जबकि ये अनाज गरीब किसानों-खेतिहर मजदूरों के मुख्य आहार हुआ करते थे।

और, बढ़ता गया बेगानापन

 अभी तक इधर की बातें हुईं। अब जरा उधर की भी बात कर ली जाए, भूस्वामित्व के इतिहास में झांक लिया जाए। जमीन तो हमेशा राजा, बादशाह या सरकार की रही है और किसानों को उस पर खेती करने के लिए टैक्स देना पड़ा है। मनु ने उपज का छठां हिस्सा राजा को देने का नियम बनाया था, जो युद्ध जैसे विपत्तिकाल में एक चौथाई हो जाता था। हालांकि टैक्स का अंतिम फैसला राजा की मनमर्जी से ही होता था।
भारत में सदियों तक जमीन का मामला एकदम बिखरा-बिखरा रहा। अकबर के खजाना मंत्री टोडरमल ने पहली बार जमीन की कायदे से नापजोख कराई और उर्वरता के आधार पर जमीन को चार श्रेणियों में बांटकर उसकी मालियत तय कर दी। गौर करने की बात ये है कि टोडरमल ने जमीन के सर्वेक्षण की जो तौर-तरीके अपनाए, वो आज भी भारत के ज्यादातर हिस्सों में अपनाए जाते हैं। अकबर के शासन में किसानों से उपज का एक तिहाई हिस्सा बतौर टैक्स लिया जाता था। बाद में मुगलों से लेकर मराठा शासन तक में कमोबेश इसी अनुपात में टैक्स लिया जाता रहा। लेकिन मुगल शासन के पतन के दौरान देश में राजस्व खेती लागू की गई। इस प्रणाली में कभी-कभी किसानों को फसल का 9/10वां हिस्सा तक बादशाह को देना पड़ता था।
 वैसे, आज हम खेती में जो कुछ भी देख रहे हैं, वह अंग्रेजों के पाप का नतीजा है। उन्हें खेती-किसानी की हालत से कोई फर्क नहीं पड़ता था। उनका मकसद सिर्फ इतना था कि उन्हें टैक्स देने से कोई किसान बच न पाए। देश में स्थाई बंदोबस्त या जमींदारी प्रथा लागू करने का पापी था लॉर्ड कॉर्नवालिस। उसने 1793 में इसकी शुरुआत पश्चिम बंगाल से की, जो बाद में उड़ीसा, उत्तर प्रदेश (आगरा और अवध को छोड़कर), बिहार, राजस्थान (जयपुर और जोधपुर को छोड़कर) समेत देश के कुल कृषि क्षेत्रफल के लगभग 57 फीसदी हिस्से पर लागू हो गई। इसके तहत रियासतों को गांव के गांव मुफ्त में दे दिए गए। बस, उनका जिम्मा ये था कि वो किसानों से टैक्स वसूल कर अंग्रेजों तक पहुंचाएं। किसान बटाईदार बना दिए गए। बिचौलिये जमींदारों और उनके कारिंदों की मौज हो गई।

अंग्रेजी शासन में भू-स्वामित्व की दूसरी प्रमुख व्यवस्था थी रैयतवारी, जिसे 1792 में मद्रास में और 1817-18 में बॉम्बे में लागू किया गया। इसमें रैयत या किसान को उसकी जमीन का मालिक माना गया। जब तक वह अंग्रेज कलेक्टर को समय पर तय मालगुजारी देता रहता था, उसकी जमीन को कोई आंच नहीं आ सकती थी। रैयतवारी व्यवस्था आज के महाराष्ट्र और कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल, आंध्र प्रदेश, अधिकांश मध्य प्रदेश, असम और कमोबेश पूरे दक्षिण समेत देश के 38 फीसदी कृषि क्षेत्रफल में लागू थी। इस व्यवस्था की खासियत ये थी कि इसमें सरकार और किसानों के बीच कोई बिचौलिया नहीं था।
 जमीन के मालिकाने की तीसरी प्रथा थी महलवारी। इसे विलियम बेनटिन्क ने साल 1820 में आगरा और अवध में लागू किया, जो 1840 तक मध्य प्रदेश के कुछ हिस्सों और संयुक्त पंजाब तक फैला दी गई। इसके तहत अंग्रेजों को जमीन का टैक्स पहुंचाने की जिम्मेदारी गांव (महल) के मुखिया की थी, जिसे लंबरदार कहा जाता था। किसान अपनी जोत के हिसाब से तय मालगुजारी (जो उपज का दो तिहाई से लेकर तीन चौथाई तक थी) लंबरदार के पास जमा कराते थे, जो इसे परगना के अंग्रेज कलेक्टर तक पहुंचाता था। महलवारी देश की कृषि जमीन के पांच फीसदी पर लागू थी।
भू-स्वामित्व की इन तीनों ही व्यवस्थाओं के तहत किसान कभी अपनी मर्जी के मालिक नहीं रहे। ब्रिटिश सरकार जिंदा रहने भर का न्यूनतम अनाज छोड़कर उनसे बाकी हिस्सा छीन लिया करती थी। लेकिन किसानों की सबसे खराब हालत जमींदारी वाले इलाकों में थी। इन इलाकों के किसानों ने खेती पर ध्यान देना भी बंद कर दिया। जमीन को लेकर उनमें एक बेगानापन सा भर गया।

एक तो चोरी, ऊपर से जमींदारी!!

तो, मैं जिस महलवारी प्रथा की बात कर रहा था, उसी प्रथा के तहत हमारा गांव भी आता था। इस महलवारी व्यवस्था को शायद जजमानी और पट्टीदारी प्रथा भी कहा जाता था, जो भारत की पुरानी व्यवस्था का ही नैरंतर्य थी। बाबा के परबाबा गांव के लंबरदार थे, गांव भर से मालगुजारी जुटाकर साहब बहादुर तक पहुंचाते थे। आजादी के बाद जमींदारी से लेकर रैयतवारी और महलवारी व्यवस्था खत्म कर दी गई। लेकिन मेरे अपने बाबा भी मरते दम तक लंबरदार कहलाते रहे। वैसे, बताते हैं कि इलाके के नवाब के यहां वो सुबह-सुबह घंटा बजाने की ड्यूटी भी करते थे। कहने का मतलब है कि अवध के इलाके में गिनी-चुनी रियासतें पहले भी थीं और अब भी उनकी कोठियों के खंडहर नजर आ जाते हैं। लेकिन ज्यादातर किसानों में जमींदार होने का कोई गुरूर नहीं था। क्या ठाकुर, क्या ब्राह्मण सभी अपने खेतों में मजदूरों की तरह मेहनत करते थे।

लेकिन कभी-कभी मुझे लगता है कि आज की तारीख में जमींदारी का इलाके और समय से कोई लेनादेना नहीं है। खून-पसीना गलानेवाले किसान का कुछ भी हो जाए, सूखा पड़ जाए, अकाल पड़ जाए, चाहे घर में मरनी हो जाए, जमींदार को तो अपनी पूरी मालगुजारी चाहिए थी, जिसे उसे अंग्रेज बहादुर के दरबार तक पहुंचाना था। क्या यही सोच और तरीका आज भी हमारे इर्दगिर्द नहीं चल रहा है। मैं हिंदी अखबारों या न्यूज चैनलों में काम करनेवाले पत्रकार बंधुओं से पूछना चाहता हूं कि जब आपका बॉस आपसे कहता है कि मुझे कुछ नहीं सुनना है, मुझे आपका आउटपुट चाहिए तो आपको कैसा लगता है? आप देखते हैं कि बॉस से लेकर ऊपर के सभी चेलेचापट धेले भर का काम नहीं करते, बस अपने से ऊपर वाले को काम करते दिखाते रहते हैं, मीटिंग करते हैं, लडकियों की कंधा-मालिश करते हैं तो आपको कैसा लगता है? किसी दिन जनखे जैसी चाल चलनेवाला बॉस का कोई पट्ठा आपसे न्यूज का मतलब पूछता है और कहता है कि आप कहीं अपने लिए क्लर्की ढूंढ लीजिए तो आपको कैसा लगता है? सरकारी और कुछ प्राइवेट दफ्तरों में भी जमींदारी की यही संस्कृति चलती होगी, ऐसा मेरा अनुभव नहीं, अनुमान है।
वैसे, मेरे इलाके में जमींदारों का क्या हुआ, इस पर एक किस्सा सुनाना चाहता हूं। पुराने जमाने के जमींदार साहब एक किसान के खेत से मटर चुरा रहे थे। किसान ने उन्हें रंगेहाथों पकड़ लिया और मामला गांव की पंचायत में ले गया। पंचों ने पूछा तो जमींदार साहब ने कहा कि वो तो मटर के खेत में झाड़ा फिरने गए थे। इस पर किसान ने कहा, ‘मैंने इनको जहां से पकड़ा था, वहां तो सूखी टट्टी पड़ी हुई थी।’ इस पर जमींदार साहब का जवाब गौर करने लायक है। बोले – हम हई जमींदार, झूर (सूखी) हगी चाहे ओद (गीली)...तू सारे कैसे समझि पउब्या। तो पढ़नेवाले बंधुओं, शायद इसी को कहते हैं एक तो चोरी, ऊपर से जमींदारी।

नहीं मालूम, कहां ठहरा है पानी

दुष्यंत कुमार ने लिखा था : यहां तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियां, हमे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा। लेकिन ईमानदारी से मुझे नहीं मालूम कि पानी कहां ठहरा हुआ है। इसे 1857 के पहले स्वाधीनता संग्राम में किसानों की भागीदारी का असर कहिए या बाद में लगातार होते रहे किसान आंदोलनों का, हमारे नेताओं को आजादी से पहले ही भूमि सुधारों का महत्व समझ में आ गया था। यही वजह है कि आजादी के तुरंत बाद वरिष्ठ कांग्रेसी नेता जे सी कुमारप्पा की अगुआई में बनी कृषि सुधार समिति ने सिफारिश की थी कि खेती से सभी बिचौलियों को खत्म कर दिया जाए और जमीन जोतनेवालों को दे दी जाए; विधवाओं, नाबालिग और अपाहिजों के अलावा बाकी लोगों के लिए ज़मीन को बटाई पर देने पर रोक लगा दी जाए; छह साल से किसी जमीन पर खेती करनेवाले हर कास्तकार को उसका मालिक बना दिया जाए; कास्तकार को भूमि ट्राइब्यूनल द्वारा तय वाजिब कीमत पर जमीन को खरीदने का अधिकार दिया जाए और कृषि अर्थव्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिससे किसानों को विकास का मौका मिले।
पहली पंचवर्षीय योजना से ही जमींदारी उन्मूलन का सिलसिला शुरू हो गया।

ज्यादातर राज्यों ने इस बाबत कानून बना दिए। 1948 में शुरुआत मद्रास से हुई। धीरे-धीरे सारे राज्यों में जमींदारी, महलवारी, जागीर, ईनाम जैसी व्यवस्थाएं खत्म कर दी गईं। नतीजतन करीब 46 लाख किसान जमीन के मालिक बन गए। उनकी सामाजिक और माली हालत में सुधार हुआ। राज्य सरकारों को खेती की जमीन से मालगुजारी भी पहले से ज्यादा मिलने लगी। साथ ही भूमि सुधार कानूनों को संविधान की नौवीं अनुसूची में डाल दिया, ताकि कोई इन्हें अदालत में चुनौती न दे सके। बल्कि नेहरू के जमाने में नौवीं अनुसूची भूमि सुधार कानूनों को अदालत की समीक्षा से बाहर रखने के लिए ही लाई गई थी।


भूमि सुधारों के अगले चरण में 1960 के दशक के दौरान सीलिंग कानून बना दिए गए। इसके लिए संविधान के निदेशक सिद्धांतों का सहारा लिया गया जिसमें कहा गया है कि संसाधनों का मालिकाना इस तरह तय किया जाना चाहिए जिससे आम हितों के खिलाफ संपत्ति और उत्पादन के साधन कुछ लोगों के हाथों में केंद्रित न हो जाएं। जब भूमि सुधार कानूनों से संपत्ति के मौलिक अधिकार को तोड़ने की बात हुई तो सरकार ने 42वां संविधान संशोधन लाकर संपत्ति के अधिकार को मौलिक अधिकारों की सूची से हटाकर महज एक वैधानिक अधिकार बना दिया।
 आप कह सकते हैं कि जोतने वालों को जमीन देने के लिए इससे ज्यादा पुख्ता कानूनी इंतजाम और क्या हो सकते थे और अगर हकीकत में ये लागू नहीं हो सके तो समस्या इसके क्रियान्वयन की है। लेकिन भूमि सुधार कानूनो पर अमल न होने की समस्या की जड़ हमारे कानून में ही है। और इसका बीज ब्रिटिश शासन में ही 1935 में तब पड़ गया था जब तत्कालीन भारत सरकार ने भूमि को ‘स्टेट सब्जेक्ट’ बना दिया। आजादी के बाद अपना संविधान बना तो धारा 31-ए, बी, सी के तहत कृषि सुधारों का जिम्मा राज्यों को ही दिया गया। इस नीति में एक मूलभूत अंतर्विरोध था। वह यह कि अगर कृषि सुधारों की राष्ट्रीय नीति राष्ट्रीय स्तर पर केंद्र सरकार तय कर रही थी तो क्या इस नीति का अमल राज्यों पर छोड़ देना उचित था, ये अच्छी तरह जानते हुए कि राज्यों की राजनीतिक सत्ता पर ताकतवर भूस्वामियों की लॉबी का नियंत्रण है?

असल में कांग्रेस ने कृषि को लेकर शुरू से ही दोगली नीति अपनाई। एक तरफ तो इसने सिंचाई, कृषि अनुसंधान और मशीनीकरण के जरिए गांवों की समस्या हल करने की कोशिश की, दूसरी तरफ इसने भूमि सुधारों के अपने ही एजेंडे को लागू करने के लिए आधी-अधूरी कोशिश की क्योंकि ऐसा करने से किसानों का दमन करनेवाले सामंती और व्यापारिक बिचौलियों के हितों को चोट लगती।

जन संघर्ष तेज हो गए तो इसने थोड़ा कुछ किया। फिर मामला शांत होते ही कदम पीछे खींच लिए। यह साठ के दशक के उत्तरार्ध में फैले नक्सल आंदोलन का ही असर था कि इंदिरा गांधी ने राजाओं-महाराजाओं के प्रिवी पर्स खत्म कर दिए, गरीबी हटाओ का नारा दिया। नक्सल आंदोलन का निर्ममता से दमन किया गया, लेकिन बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया, उन्हें ग्रामीण इलाकों में शाखाएं खोलने का निर्देश दिया गया ताकि किसानों को महंगी लागत सामग्रियों के लिए आसान कर्ज मुहैया कराया जा सके। फिर किसान आंदोलन तेज हुए तो कर्ज माफ करने के मेले भी लगाए गए।

खंड-खंड जमीन पर जारी है पाखंड

 कर्ज माफी के मेले चल ही रहे थे कि नब्बे के दशक से देश में उदारीकरण, निजीकरण और ग्लोबीकरण की आंधी आ गई। हर चीज की तरह कृषि को भी आंखों पर परदा डालकर बाजार में ला खड़ा किया गया। सरकार की नजर में भूमि सुधारों के मायने बदल गए। लेकिन लिप-सर्विस जारी रही। अभी साल भर पहले ही 18 अप्रैल 2006 को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सीआईआई (कनफेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री) के सालाना सम्मेलन में कहा था, “भूमि सुधार भले ही स्टेट सब्जेक्ट हो, लेकिन एक राष्ट्रीय प्राथमिकता है, जिस पर राष्ट्रीय सर्वसम्मति की जरूरत है।” देश भर में खंड-खंड होती जमीन का हवाला देकर राष्ट्रीय प्राथमिकता और सर्वसम्मति का ये पाखंड जारी है।
इस पाखंड के पीछे खेती का कॉरपोरेटाइजेशन अभियान चल रहा है। सालों साल से कई कंपनियां कई राज्यों में कांट्रैक्ट फार्मिंग कर रही हैं। आईटीसी समूह आंध्र प्रदेश में तंबाकू की खेती कर रहा है। पेप्सिको पंजाब, महाराष्ट्र, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल तक में आलू, मिर्च और धान की खेती कर रही है। मित्तल समूह ने ब्रिटेन के बैंक रॉथ्सचाइल्ड के साथ मिलकर भारत में बड़े पैमाने पर कई फसलों की खेती शुरू कर दी है। तमिलनाडु सरकार ने एक हजार एकड़ बंजर जमीन कंपनियों को कपास, फूलों, सब्जियों और मसालों की खेती के लिए 30 साल की लीज पर दे दी है। गुजरात सरकार ने भी 2000 एकड़ से ज्यादा बंजर जमीन कंपनियों को लीज पर दी है।
लेकिन किसानों की जमीन लेने में सरकारों को काफी परेशानी हो रही है। इसके उदाहरण हैं नंदीग्राम और सिंगूर। पहले भी सड़कें वगैरह बनाने के लिए सरकार को काफी थुक्का-फजीहत झेलनी पड़ती रही है। इसकी बड़ी वजह है खेती की जमीन पर मालिकाने की स्थिति का साफ न होना। गांवों में हालत ये है कि किसान को अपनी ही जमीन के मालिकाने का प्रमाणपत्र पाने के लिए पटवारी की जेब में पांच सौ से लेकर हजार रुपए डालने पड़ते हैं।
छह साल पहले कंसल्टेंसी फर्म मैकेंजी ग्लोबल ने भारत में जमीन के स्वामित्व पर विशद अध्ययन किया था। उसने ‘इंडिया : द ग्रोथ इम्परेटिव – अंडरस्टैंडिंग द बैरियर्स टू रैपिड ग्रोथ एंड एम्प्लॉयमेंट’ शीर्षक से तीन खंडों में पेश की गई अपनी रिपोर्ट में कहा है कि भारत की 90 फीसदी जमीन कानूनी पचड़ों में फंसी हुई है। पता ही नहीं कि इनका असली मालिक कौन है। जमीन-जायदाद के बाजार की इस विसंगति के चलते भारत की आर्थिक विकास दर को हर साल 1.3 फीसदी का नुकसान हो रहा है। मजे की बात ये है कि हमारी सरकारों ने भू-रिकॉर्ड को दुरुस्त किए बगैर उनका कंप्यूटरीकरण भी शुरू कर रखा है।
 इधर केंद्र सरकार ने अब भूमि शेयर कंपनियों का नया शगूफा छोड़ दिया है। इसके तहत किसान किसी कंपनी को अपनी जमीन लीज पर दे सकते है, जिसके बदले उन्हें जोत के आकार के हिसाब से कंपनी के शेयर मिल जाएंगे यानी कंपनी के स्वामित्व में उनकी अंशधारिता हो जाएगी। इन शेयरों पर किसान को कंपनी के लाभ में हिस्सा मिलेगा। सरकार कहती है कि किसान चाहें तो वो अपनी जमीन के साथ-साथ कंपनी की भी जमीन निश्चित किराया देकर खेती के लिए ले सकते हैं। प्रस्ताव के मुताबिक कंपनी की चुकता पूंजी का 25 फीसदी हिस्सा ही कॉरपोरेट सेक्टर का होगा, बाकी 75 फीसदी इक्विटी पूंजी जमीन के रूप में किसानों की होगी। कंपनी अगर डूब गई तो किसान को उसकी जमीन वापस मिल जाएगी। खैर, इसमें और भी कई पेंच हैं। लेकिन है ये अभी प्रस्ताव के ही स्तर पर। वैसे, जो शेयर बाजार में पैसे लगाते हैं, उनको अच्छी तरह पता है कि भले ही रिलायंस के 23 लाख शेयरधारक हों, लेकिन मालिक तो अंबानी परिवार ही है। ऐसे में अपनी जमीन देकर शेयरधारक बन गए किसान को पंजीरी ही मिलेगी, शांति, सुख और समृद्धि का प्रसाद नहीं।

चलो अब शंख बजाएं

 इतना कह चुकने के बाद अब आखिरी शंख बजाया जाए, संघर्ष का नहीं, समापन का। बात को वैसे अभी और फैलाया जा सकता था, लेकिन उपसंहार जरूरी है। इंटरनेट पर तो भारत के कृषि सवाल पर सामग्रियों का अंबार अटा पड़ा है। और, ऐसा नहीं है कि मैंने कोई अनोखी चीज लिख दी है। कई साल पहले सिद्धार्थ दुबे ने प्रतापगढ़ के बाबा का पुरवा गांव के दलित किसान रामदास, उनकी पत्नी प्रयागा देवी, उनके बेटे श्रीनाथ और नाती हंसराज की सच्ची कहानी के जरिए शानदार किताब (Words Like Freedom : Memoirs of an Impoverished Indian Family 1947-1997) लिखी थी, जिसका पेपरबैक संस्करण हार्पर कॉलिंस ने साल 2000 में छापा था।
हम सौभाग्यशाली हैं कि हमने भारत में जन्म पाया है। हमारे पास दुनिया की सबसे उर्वर जमीन है। हमारे यहां कृषि-योग्य जमीन 55 फीसदी (32.90 करोड़ हेक्टेयर में से 18.20 करोड़ हेक्टेयर) है, जबकि अमेरिका में ये 19 फीसदी, यूरोप में 25 फीसदी और अपने ‘बैरी’ पड़ोसी पाकिस्तान में तो 28 फीसदी ही है। चीन के पास भी हमसे कम कृषि-योग्य जमीन है। लेकिन दिक्कत ये है हमारे नीति-नियामकों को ये बात परेशान नहीं करती कि हम अपने इस एडवांटेज का फायदा नहीं उठा पा रहे हैं। वो ज्यादा से ज्यादा कृषि को देशी-विदेशी कॉरपोरेट सेक्टर के मुनाफे को बढ़ाने के साधन के रूप में ही देख रहे हैं। ये नहीं देख रहे कि इससे कैसे 60 करोड़ लोगों की मायूस जिंदगी में मुस्कान लायी जा सकती है।

क्या ये संभव नहीं है कि हमारी जमीन जिस तरह झगड़ों में पड़ी हुई है, टुकड़ों में बंटी हुई है, उसे देखते हुए देश की सारी जमीन का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाए और उन्हें ही जमीन दी जाए जो वाकई खुद खेती करते हों। वैसे भी जमीन राष्ट्रीय संपदा है। जिनके पास आज दसियों-हजारों एकड़ जमीन है, उनके बाप-दादा ने इसे अपनी मेहनत से नहीं, अंग्रेजों की दलाली से हासिल किया था। पहले चरण में सीलिंग कानूनों को धता बताते हुए डय्या और मांडा जैसी तमाम रियासतों से लेकर वो नेता जो सैकड़ों-हजारों एकड़ जमीन लिए बैठे हैं, उनकी जमीन का राष्ट्रीयकरण किया जाना चाहिए। यकीनन, ऐसा कदम बहुत बडा भूचाल ला सकता है। लेकिन सरकार चाहे तो इस भूचाल का अंदाजा कृषि आय को टैक्स के दायरे में लाकर लगा सकती है।

आप भी मानेंगे कि हर युग के कुछ कार्यभार होते हैं, जिनके लिए पूरी ताकत झोंक देने की जरूरत होती है। प्रकृति का भी यही नियम है। पतझड़ में पेड़ों से गिरी पुरानी पत्तियों को या तो हवा उड़ा ले जाती है या वो वहीं दबकर खाद बन जाती हैं। प्रकृति मृत पदार्थों को सोख लेती है ताकि हमारी धरती शाश्वत ताजगी और जवानी से भरी रहे। लाशों को ढोते रहने से कोई फायदा नहीं, उन्हें जलाकर राख बनाना जरूरी है क्योंकि लाशों से भूत निकलते हैं, जबकि राख से फीनिक्स निकलता है जो सब कुछ नया करने का माद्दा रखता है।
इतना सारा लिखने का मेरा मकसद बस इतना था कि जब हम भ्रष्टाचार के बारे में सोचें, सांप्रदायिकता के बारे में सोचें, अपनी और राष्ट्र की समस्याओं के बारे में सोचें तो कृषि समस्या के बारे में भी सोचें क्योंकि उसमें देश की बहुत सारी समस्याओं के निदान की कुंजी है। मैं ये भी मानता हूं कि किसान-मजदूर, छात्र-नौजवान ही बदलाव नहीं लाते। हमारे-आप जैसे पढ़ने-लिखने वाले लोग साफ यथार्थपरक नजरिया बना लें तो वह भी बहुत बड़ी ताकत होती है। 30 करोड़ का मध्यवर्ग अगर देशी-विदेशी कंपनियों के लिए बेहद बड़ा बाजार है तो यही मध्यवर्ग कम से कम सोच के स्तर पर एक नई लहर पैदा कर सकता है।

अगर दस लेखों की कड़ी कल का कर्ज से मैं चंद लोगों को ही सही, कृषि और भूमि सुधार के मसले पर सेंसिटाइज कर पाया हूं, तो अपनी मेहनत को सार्थक समझूंगा.

साभार: http://diaryofanindian.blogspot.com/

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