पेटेंट और पौधों की किस्में एवं जैविक भिन्नता
प्रकृति में पायी जाने वाली वस्तुओं के गुणों का पेटेंट नहीं कराया जा सकता है पर प्रकृति में प्राप्त वस्तुओं या इसके गुणों का प्रयोग कर यदि कोई नवीन उत्पाद बनाया जाय तो उसको पेटेंट कराया जा सकता है। एक सार्वजनिक प्रक्रिया या उत्पाद, अथवा परंपरागत जानकारी को पेटेंट नहीं किया जा सकता है क्योंकि यह नवीन आविष्कार नहीं है। इनको दोहरा कर दूसरी प्रक्रिया या प्राप्त उत्पाद को भी पेटेंट नहीं कराया जा सकता है क्योंकि यहां भी यह नवीन आविष्कार नहीं कहे जा सकते हैं।
हमारे देश में रासायनिक प्रक्रियाओं द्वारा तैयार किये गये उत्पाद या खाद्य पदार्थ, या औषधि, पर पेटेंट नहीं दिया जा सकता था। इसका अर्थ यह नहीं है कि इस तरह के उत्पाद हमारे देश में होते नहीं थे, या उनका हमारे देश में प्रयोग नहीं किया जाता था। हमारे देश में केवल इनका पेटेंट नहीं होता था हालांकि बाहर के देशों में, इस तरह की कोई भी रोक नहीं थी तथा वहां इस तरह के उत्पाद का पेटेंट होता था। ट्रिप्स के अन्दर इस तरह की कोई रोक नहीं लगायी जा सकती है इसलिये अब इस तरह के पेटेंट अपने देश में भी दिये जाने लगे हैं।
हमने जैविक भिन्नता (Biological Diversity) अधिनियम २००२ बनाया हैं इसको बनाने के निम्न कारण हैं।
- जैविक भिन्नता का संरक्षण करना;
- जैविक भिन्नता के संघटकों का ठीक प्रकार से प्रयोग करना; और
- जैविक साधन की जानकारी के प्रयोग से प्राप्त होने वाले लाभ का उचित एवं न्यायपूर्ण बंटवारा होना।
बहुत सारे देशों में उन उत्पाद पर पेटेंट मिल गये है जिन पर हम पेटेंट नहीं देते थे और बहुत से पेटेंट पारम्परिक जानकारी या पूर्वकला की जानकारी न मिल पाने के कारण दिये जा चुके हैं। इस तरह के बहुत सारे पेटेंट चावल, गेहूं, नीम, हल्दी, इसपगोल, सौंफ, धनिया, जीरा, सूरजमुखी, मूंगफली, अरंडी रेड़ी, करेला, जामुन, ब्रिजल और आंवला के प्रयोग के बारे में हैं जिनकी हमें परम्परागत जानकारी थी। इसमें से कुछ तो समाप्त कर दिये गये हैं पर, अधिकतर अभी भी हैं।
बासमती चावल
राइस टेक एक अमेरिकन कम्पनी है यह कासमती और टैक्समती के नाम से चावल बेच रही थी। 1994 में राइस टेक ने 20 तरह के बासमती चावल के लिए पेटेंट प्राप्त करने के लिए यू.एस. पेटेंट एण्ड ट्रेड आर्गेनाइजेशन (यू.एस.पी.टी.ओ.) में एक आवेदन पत्र दाखिल किया। यू.एस.पी.टी.ओ. ने 1997 में सभी पेटेंटों को मंजूर कर दिया। हमने अप्रैल 2000 में तीन पेटेंटों की पुन: परीक्षा के लिए एक आवेदन पत्र प्रस्तुत किया । यह आवेदन पत्र उच्चतम न्यायालय के Research Foundation for Science Technology & Ecology and others Vs. Ministry of Agriculture and others (1999) 1 SCC 655 में की गयी कार्यवाही के अन्दर किये गये।
राइसटेक ने इन तीन के साथ एक और पेटेंट को वापस ले लिया। बाद में राइसटेक से 11 अन्य पेटेंटों को भी वापस लेने के लिए भी कहा गया जो कि उसने वापस ले लिया। राइसटेक को पेटेंट का नाम भी Basmati Rice lines and Grains से बदल कर Bas 867 RT 1121 and RT 117 करना पड़ा पर अन्त में राइसटेक को अगस्त 2001 में बांसमती पर पांच पेटेंट दिये गये।
बासमती चावल हिमालय की तराई में पैदा होता है। इसी तरह से इसके नाम का प्रचलन भी हुआ। बासमती चावल को, विश्व के अन्य भाग में पैदा नहीं किया जाता है। किसी अन्य स्थान पर पैदा किया गया चावल को बासमती नहीं कहा जा सकता है। बासमती एक भौगोलिक सूचक है। हमने राइसटेक को दिये जाने वाले पेटेंट पर अपनी आपत्ति, पेटेंट को न दिये जाने के कारणों के आधार पर, दिया था लेकिन बासमती का एक ‘भौगोलिक सूचक’ के रूप में दावा नहीं किया था। इस समय, राइसटेक अमेरिका में पैदा किया गये चावल को, बासमती कहते हुए बेच सकता है। यह अजीब बात है कि अमेरिका में बासमती चावल पैदा हो सकता है।
हमने भौगोलिक उपदर्शन (रजिस्ट्रीकरण और संरक्षण) अधिनियम 1999 बताया है । हमें बासमती को एक भौगोलिक सूचक के रूप में दर्ज करना चाहिये फिर आगे कार्यवाही करनी चाहिये ताकि कोई भी इसके नाम का गलत लाभ न ले सके।
गेहूं
यूलिवर नाम की कम्पनी गलेटी नामक गेहूं का बीज बनाती थी। इसे मोसेन्टो ने खरीद लिया। उसके पश्चात इस पर यूरोपियन पेटेंट कार्यालय के म्यूनिख कार्यालय से इस पर २१-५-२००३ को एक पेटेंट प्राप्त किया। हमारे देश में नपहाल (Nap Hal) नाम का एक सामान्य किस्म का गेहूं होता है गलेटी में वहीं गुण हैं जो कि नपहाल में हैं इसका प्रयोग चपाती बनाने में किया जाता है। नपहाल में अन्य गेहूं की किस्मों से कम ग्लूटेन (Gluten) होता है जो इसकी Viscoelasticity को कम कर देता है। यह पकाने के दौरान कम फूलती है। यह कुरकुरे ब्रेड बनाने में प्रयोग किया जाता है। इस पेटेंट के खिलाफ कार्यवाही करने पर इसे २३-१-२००४ को रद्द कर दिया गया।
हल्दी: Turmeric
हल्दी के कई गुण हैं इसमें कई तरह की बीमारियां जैसे कि वातज रोग (Rheumatoid) और जोड़ों का दर्द (Osteoarthritis) को ठीक करने की क्षमता है। इस पर कई तरह के पेटेंट मिल चुके हैं। इस पर एक पेटेंट, मिस्सीसिप्पी विश्वविद्यालय में दो भारतीयों को, इसके घाव भरने के गुण के लिये, मार्च 1995में दिया गया। यह दिया गया। हमने पूर्व कला के आधार पर इस पेटेंट को चुनौती देते हुए यू.एस.पी.टी.ओ. के यहां एक आपत्ति दाखिल की। इस आपत्ति को स्वीकार कर लिया गया और यह पेटैंट रद्द कर दिया गया है।
नीम: Azadirachta Indica
नीम (Azadirachta Indica) सर्व रोग निर्वारणी है। बहुत सारी कम्पनियों को नीम के गुण का प्रयोग करने वाले उत्पादों पर पेटेंट दिया गया है। इनमें से कई भारतीय कम्पनियां भी हैं। इनमें से केवल एक पेटेंट को रद्द किया गया है। यह पेटेट डब्लू.आर. ग्रेस तथा यू.एस. कृषि विभाग को नीम तेल के जीवन (Self life) बढाने के लिए मंजूर किया गया था।
नीम के तेल की शेल्फ लाइफ (Shelf life) को बढ़ाने के लिये इसे एप्रॉटिक सालवेन्ट (aprotic solvent) में कुचला जाता है। मोटे तौर एप्रॉटिक सालवेन्ट, अपने में घुले पदार्थो के साथ हाइड्रोजन आयन (प्रोटान) का आदान-प्रदान नहीं करते हैं। वे हाइड्रोजन बौन्ड (bond) बनाने में भाग नहीं लेते हैं, उदाहरणार्थ ईथर, कीटोन्स, बेन्जीन। प्रॉटिक सालवेन्टस ( Protic Solvents) में हाइड्रोजन दूसरे परमाणु के ऋणात्मक परमाणु के साथ जुड़े होते हैं और हाईड्रोजन बौन्डिंग में भाग लेते है, उदाहरणार्थ, पानी और अल्कोहल।
पर्यावरण ग्रुप के एक संघ ने नीम की शेल्फ लाइफ बढ़ाने वाले पेटेंट को चुनौती दी। यूरोपियन पेटेंट आफिस ने इसी आधार पर १०-५-१९९९ को यह कहते हुये रदद कर दिया कि यह आविष्कार नवीन नहीं था और वह भारतवर्ष में सार्वजनिक रूप में प्रयोग किया जाता था।
निष्कर्ष
अभी तक कुछ ही पेटेंट रद्द किये गये हैं। इस तरह के अनेकों पेटेट हैं जो कि गलत रूप से दे दिये गये हैं, यह इन पेटेंटों में ईसपगोल, सौंफ, धनिया, जीरा, सूरजमुखी, मूंगफली, अरंडी, रेड़ी, करेला, जामुन, बैंगन के गुणों को प्रयोग कर प्राप्त किये गए हैं। यह सारे हमारे आयुर्वेद का हिस्सा रहे और पूर्व कला के रूप में जाने जाते थे। इन्हें भी रद्द करवाना चाहिए। पेटेंट रद्द करवा पाना बहुत महंगा तरीका है। हमें अपनी परम्परागत सूचना इंटरनेट पर डालनी चाहिये ताकि यह पूर्व कला के तौर पर जानी जाय और कोई अन्य इस पर पेटेंट न प्राप्त कर सके।
साभार :http://unmukth.wordpress.com/2007/04/08/patent-biological-diversity/



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