जब `सफर` हुआ सफर . . .
दृश्य-एक : समय - सुबह ८.०० बजे। स्थान - चिराग दिल्ली बस स्टाप। पात्र - इंस्टीट्यूट में पढने वाली छात्रा। चेहरे से लग रहा है जैसे बहुत परेशान है। हो भी क्यूं न, आखिर आज उसका टेस्ट है और उसे ९ बजे तक अपने इंस्टीट्यूट में पहुंचना है। उसके चेहरे पर बेचारगी और खीझ के भाव साफ नजर आ रहे हैं। ऑटो वाले से बात की तो वह १०० से कम रुपये पर जाने के लिये तैयार न हुआ। वजह ... ब्लू लाईन बस की अघोषित हड़ताल।
दृश्य–दो : समय – सुबह ८.३० बजे। स्थान – खेलगांव बस स्टाप। पात्र – पहली बार नौकरी पर लगा युवक। युवक के चेहरे पर झल्लाहट साफ देखी जा सकती है। क्या करे? कल ही तो इंटरव्यू में उसका नौकरी के लिये चयन किया गया था। आज उसकी नौकरी का पहला दिन है कनाट प्लेस स्थित आफिस में। पिछले एक घण्टे से वह बस के इंतजार में है। वह ब्लू लाइन बस वालों को कोसते हुए निराश हो... फिर से ताकने लगता है कि शायद कहीं कोई बस आ जाए।
दृश्य –तीन : समय – दोपहर २ बजे। स्थान – आनन्द विहार बस अड्डा। पात्र – कई सारे यात्री जो बाहर से आए हैं। लोगों की भीड़ बस स्टाप पर लगी हुई है। हर कोई राजधानी की जीवनरेखा यानि ब्लू लाइन का इंतजार कर रहा है। दिल्ली की चिलचिलाती धूप में पसीने से तर-बतर यात्री राजधानी की परिवहन व्यवस्था को कोसते हुए बसों का इंतजार कर रहे हैं। जो आ रही हैं वह इतनी भरी हुई कि उसमें पैर रखने की जगह तक नहीं।
यह केवल चन्द उदाहरण है राजधानी की ठप्प पड़ी परिवहन व्यवस्था के जिनसे रूबरु होना पड़ा नौकरीपेशा, छात्रों और बाहर से आये यात्रियों को। क्या आप कभी ऐसी बस में सवारी करना पसन्द करेंगे जिसे किलर बस की उपाधि दी गई हो.... तो शायद आपका जवाब होगा – सपने में भी नहीं। लेकिन यथार्थ में लोग इसी बस में यात्रा करने के लिये मजबूर हैं वह भी ऐसी परिस्थिति में कि बस के पायदान पर भी उन्हें अगर जगह मिल जाती है तो वह अपने आपको भाग्यशाली मानते हैं। जी हां, हम बात कर रहे हैं दिल्ली की ब्लू लाइन बसों की, जिनका कहर जुलाई की शुरुआत से ही दिल्ली वालों की आम जिन्दगी पर टूट पड़ा है।
पिछले कुछ समय से ब्लू लाइन बसों से हो रही दुघर्टनाओं का ग्राफ तेजी से बढता जा रहा था। लोगों में इन घटनाओं के खिलाफ बढते आक्रोश को देखते हुए आखिरकार सरकार को कुछ कड़े कदम उठाने पड़े, और आनन-फानन में सबसे पहले उन ६०० ब्लू लाइन बसों का परमिट रद्द करने का फैसला किया गया जिनके पास गाड़ी के पूरे कागजात नहीं थे, या जो ट्रेफिक नियमों का उल्लंघन करते पायी गयीं थी। बसें कम होने से यात्रियों को थोड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ा। परन्तु सोमवार से यह संकट और भी अधिक गहरा गया जब ट्रांसपोर्ट विभाग की एन्फोसर्मेंट विंग ने ब्लू लाइन बसों के खिलाफ अभियान और भी तेज कर बसों को हटाना शुरु कर दिया।
जैसे ही सरकार ने कड़े कदम उठाये ब्लू लाइन बसें राजधानी की सड़कों से नदारद होती गईं। हालात यहां तक पैदा हो गये कि ३६०० बसों में से लगभग २० फीसदी ही सड़कों पर नजर आईं। बस आपरेटरों ने ३००-४०० बसें जब्त होने के बाद बाकी बसें जान-बूझकर सड़कों के किनारे लगा दी थीं। उनकी रणनीति यह रही थी कि जब्त की गयी बसें नहीं छुड़ाई जाएंगी जिससे नई जब्त बसों को खड़ा रखने के लिये जगह नहीं मिल पाएगी, साथ ही दिल्ली के हालात बद से बद्तर होते जाएंगे और सरकार को उनके आगे झुकना पड़ेगा।
दिल्ली सरकार ने भी बस आपरेटरों को चेतावनी दी अगर बस मालिकों ने अपना रवैया नहीं बदला तो सरकार ब्लू लाइन पर एस्मा का प्रयोग भी कर सकती है। यदि ऐसा हुआ तो सरकार के पास बस आपरेटरों को गिरफ्तार करके बसें जब्त करने के पूर्ण अधिकार होंगे। यात्रियों को थोड़ी राहत देने के लिये दिल्ली परिवहन निगम की राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र सेवा को १० दिनों के लिये रोक दिया गया और ७०० बसें दिल्ली की सड़कों पर उतारकर यात्रियों को थोड़ी सी राहत प्रदान की।
दिल्ली की सड़कों पर ब्लू लाइन चलाने, नहीं चलाने को लेकर जो लोग गंभीर चिन्तन में पड़े हैं, वे उन दृष्टिहीनों की तरह हैं जो हाथी का पैर या सूंड छूकर हाथी के बारे में जानकार होने का दावा करना चाहते हैं। ब्लू लाइन बसें सिर्फ बसें नहीं हैं, जिन्हें चालान कर, सड़क से हटाकर, उन्हें लाल या पीले रंग में रंगकर या किमी स्कीम में चलाकर आप दिल्ली की जन परिवहन समस्या का उपचार ढूंढ लेंगे। ब्लू लाइन बसें एक संस्कृति की अभिव्यक्ति हैं। इस संस्कृति में पुलिस और एसटीए के अधिकारी, पार्षद और एमएलए तथा कुछ रसूख वाले लोग अपने रिश्तेदारों के नाम से ये बसें चलवाते हैं। इनके खिलाफ ज्यादा सख्ती नहीं की जा सकती। वे गाड़ी को ठेके पर देते हैं।
इसके बाद यात्रियों के साथ या सड़क पर क्या होता है, इसके लिये वे जिम्मेदार नहीं होते। यह बसें उस संस्कृति की देन हैं, जिसमें हर व्यवस्था से ज्यादा से ज्यादा मुनाफा लूटने का इंतजाम किया जाता है। सरकारी महकमें इस व्यवस्था की हिफाजत करने का काम करते हैं। इसलिये यदि आप इन्हें हटा कर कोई दूसरी बस लाते हैं, तो उसमें पूंजी लगाने वाले या उसका लायसेंस हथियाने वाले भी इतने ही गैर-जिम्मेदाराना ढंग से जनता को चूसने का काम करेंगे।
यदि किमी स्कीम लागू करेंगे तो भी हेरा-फेरी और यात्रियों के साथ दुव्यर्वहार की यहीं बातें दूसरे ढंग से होंगी। बसें स्टाप पर नहीं रुकेंगी, चक्कर मिस होंगे, किलोमीटर ज्यादा दिखाये जाएंगे आदि। यात्रियों की शिकायत सुनने और उस पर सख्त कायर्वाही करने जैसा कोई सिस्टम हमने नहीं बनाया है। सावर्जनिक परिवहन के किसी भी सिस्टम में यात्रियों को सबसे महत्वपूर्ण मानने का चलन किसी सभ्य व्यवस्था में ही हो सकता है, जो जाहिर है अपने यहां नहीं है। वरना क्या ऐसा संभव है कि गलत को गलत कह दें तो वह हड़ताल कर दे और उस हड़ताल से आपकी पूरी नागरिक व्यवस्था छिन्न – भिन्न हो जाए।
सरकार अपनी कार्यवाही करने के लिये तत्पर नजर आ रही है तो बस आपरेटर अपनी मनमानी। दोनों के बीच पिस रही है आम मेहनतकश जनता। यह सारी कार्यवाही कब तक चलेगी और कब पूर्ण रूप से इसका समाधान होगा यह अभी भविष्य की गर्त में हैं। लेकिन इस प्रश्न का उत्तर जानना जनता के लिये बहुत जरूरी है जो अपने आफिस और घर आने-जाने के लिये इन बसों पर निर्भर हैं। लोगों का हुजूम बस स्टाप्स पर देखा जा सकता है, और यदि गलती से बस आ भी गयी तो लोगों के लिये उसमें चढना किसी जंग जीतने से कम नहीं होता। इस धक्का-मुक्की में कितने ही लोग रोज घायल हो रहे हैं। बुजुर्ग और स्त्रियां तो इन बसों में चढने का दुस्साहस भी नहीं कर पा रही हैं। ऐसे में ऑटो ही इन लोगों के लिये आखिरी विकल्प बचता है। लेकिन बहती गंगा में हाथ धोने से भला आटो वाले भी क्यूं पीछे रहें? आखिर उन्हें भी तो मनमाने ढंग से किराया वसूलने का एक सुनहरा अवसर हाथ लगा है। सो उन्होंने भी किराया बढाकर दुगना-तिगुना कर दिया है।
यदि देखा जाए तो दिल्ली सरकार ने जिस उद्देश्य से बसों पर लगाम कसी थी, उसमें वह पूर्ण रूप से असफल होती प्रतीत हो रही है। आम लोगों की परेशानियों को कम करने की बजाय सरकार ने अचानक बसों को हटाकर और बढा दिया है। अच्छा होता कि सरकार पहले बसों का विकल्प ढूंढती और उसके बाद ब्लू लाइन बसों को जब्त करती, तो आम लोगों को ठसा-ठस भरी ब्लू लाइन में बैठने का खतरा न उठाना पड़ता।



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