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बोधिस‌त्व क‌ा ज‌व‌ाब‌: बीस‌न ल‌प्प‌ड़ पउते ब‌ापू

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भय भाई मैं चुप था,क्योंकि आपने एक दम चुप कर देनेवाला मुद्दा ही उठाया है। यहाँ जो कुछ लिख रहा हूँ आपद्-धर्म मान कर । मैं ना आप से असहमत हूँ, ना बेनाम प्रतिक्रिया देनेवाले से और ना ही अविनाश के उत्तर से । मैं उस तरह का पत्रकार नहीं हूँ । 1997 में कुछ महीने अमर उजाला के इलाहाबाद ब्यूरो में रिपोर्टर के रूप में काम करने के बाद 2006 में स्टार न्यूज से जुड़ा हूँ । यहाँ सलाहकार हूँ और चैनल में अपनी हैसियत को लेकर फिलहाल किसी तरह के मुगालते में नहीं हूँ ।

 बोधिसत्व; एक कवि के रूप में आप से तो  मिल ही लिये थे.. फिर बेनाम के लेख ने एक पत्रकार के रूप में उनकी सामाजिक भूमिका पर प्रश्न चिह्न खड़ा कर दिया.. तो उनसे भी रहा न गया.. और अविनाश के जवाब के बाद वह भी इस पूरे मामले पर अपनी समझ हमारे बीच रख रहे हैं.. एक मीडियाकर्मी के बतौर.. - अभय तिवारी
भाई मैं मानता हूँ कि आज कोई पत्रकार नहीं है बल्कि आज का पत्रकार खबर लानेवाला एजेंट है। शाम होते-होते एसाइनमेंट पर बैठा आदमी उस पत्रकार से पूछता है कल क्या खबर दे रहे हो । और पत्रकार मरते-जीते कुछ खबरनुमा बातें देने की बात कबूल कर खुश या परेशान हो उठता है। वह खबर देने को मजबूर है । कोई इन पत्रकारों या तमाम चैनलों से यह क्यों नहीं पूछता कि क्या जो वो दिखा रहे हैं वो वाकई खबर है। कुछ एक चैनलों को छोड़ दें तो महाराष्ट्र और बुंदेलखंड के किसानों की आत्महत्या की खबर कहीं भी जगह नहीं बना पाई। जबकि लालू या तमाम नाचने गाने वाले अभिनेताओं की चालीसा को कई चैनलों ने शान से चलाया। एक गड्ढे में गिरा प्रिंस देश के तमाम चैनलों पर जीवन और मौत का मंजर पेश करता रहा तो पटना का एक आशिक अध्यापक अपनी सुधड़ छात्रा के साथ अपना इश्किया आंदोलन चलाता रहा लेकिन इन दोनों खबरों या ऐसी तमाम खबरों के बीच तमाम आवाजे अनसुनी रह गईं या रह जाती हैं । मैं तमाम फालतू और रची-रचाई खबरों का क्या करूँ । क्योकि प्रिंस और प्राध्यापक की खबरों में ड्रामा था, इमोशन था, रूप-रस था या कहें कि मसाला था । इसलिए ये खबरे दनदनादन चलती रहीं । किसानों और कामगारों की नीरस खबरें कौन देखता-दिखाता है। आज अनशन और सविनय अवज्ञा आंदोलन का नहीं ड्रामा का युग है। अगर विदर्भ के खुदकुशी करने वाले वही किसान मुंबई में मंत्रालय के सामने ताम-झाम के साथ अपनी जान दें या बुंदेलखंड के किसान कसाई बन कर ददुआ बन जाएं तो तमाम चैनलों को खबर दिखेगी और सबकुछ गरमागरम रहेगा। लेकिन इसलिए सवाल यही है कि भाई खबर क्या है । और इसे तय करने का अधिकार फिलहाल चैनलों के संपादकों और कर्ता-धर्ताओं के विवेक पर है । और उनका विवेक जो कहेगा से बड़ा सवाल यह है कि उनके चैनल को धनबल देने वाले लोग कितना कुछ बिना ड्रामे का करने देते हैं ।

 आप को जान कर हैरत होगी सदी के महानायक के नाम से प्रचारित अमिताभ बच्चन और लोकनायक जय प्रकाश जी का जन्म दिन एक ही तारीख यानि 11 अक्टूबर को पड़ता है। अगर 11 गलत हो तो जो भी तारीख हो एक ही है। सारे चैनलों ने अमिताभ की अखंड आरती उतारी लेकिन मैने कहीं भी लोकनायक से जुड़ी एक लाइन की खबर भी नहीं देखी । तर्क वही जेपी की खबर कौन देखता है भाई। यानि जो हिट है वो फिट है । चाहे वो राखी हो या शिल्पा ।

बेनाम ने सही ही कहा है कि पत्रकार और संपादक भी इसी भारतीय समाज की देन हैं । उनमें भी वो तमाम कमजोरियाँ हो सकती है जो आरटीओ ऑफिस के बाबुओं या पुलिस के दारोगा में होती हैं । आज मुन्नाभाई भले लगे रहें लेकिन यह बात माननी पड़ेगी कि वक्त गांधी-लेनिन नहीं गुंडों-लुच्चों का है और हम सब तमाशाई हैं । महाभारत के कुरुक्षेत्र के बाहर खड़े विदुर से अधिक हमारी कोई भूमिका फिलहाल मुझे नहीं दिखती।

चलते-चलते सुल्तान पुर के अवधी के एक कवि इंदु जी की एक कविता का अंश लिख रहा हूँ, अभी इतनी ही याद आ रही है-

एक बार जौ अउते बापू
नेक बात समझउते बापू
सत्य-अहिंसा कहतइ भर में
बीसन लप्पड़ पउते बापू।

भावार्थ यह है कि यदि बापू तुम एक बार फिर आ जाते और अपनी नेक बातें समझाते । तो सत्य-अंहिसा कहने की देर थी तुम्हे बीसियों थप्पड़ लग जाते ।भाई अगर कुछ ऊंच-नीच हो गया हो तो थप्पड़ से बचाना। मार खाने से बहुत डर लगता है । और मैं बेनाम से आग्रह करूँगा कि वो खुल कर अपनी बात कहे । नाम और पहचान क्यों छिपाते हो भाई। डरते क्यों हो, हम हैं ना ।

साभार : http://nirmal-anand.blogspot.com/

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