बाज़ार बनाता है मीडिया को: रवीश कुमार
प्रिय बेनाम,
आपका लेख पढ़ा। जो चिंता आपकी है वही हमारी है। चुप रहने का सवाल नहीं है। मगर बोलने वाले का ही इम्तहान लिया जाता है। कि आपने आगरा पर बोला और बक्सर पर चुप रहे। हम कुछ लोग जो बोलते हैं क्रांतिकारी नहीं है। बल्कि मामूली या भारी नुकसान का जोखिम उठाते हुए बोल रहे हैं। हमारे बोलने का कुछ भी असर नहीं हुआ है। जैसा कि स्टार न्यूज पर हमला करने वाले धनंजय का कुछ नहीं हुआ।
पिछले तकरीबन एक महीने से रवीश जी यू पी के चुनाव में व्यस्त थे. इस बीच बेनाम ने जो उनके नाम शिकायती अंदाज़ में चिट्ठी लिखते हुये अपनी चिंतायें ज़ाहिर की थी.. आज आखिरी दौर के मतों के बैलट बॉक्स में पहूँचने के साथ ही रवीश कुमार का खत भी हमारे मेल बॉक्स में पहूच गया .. वे बेनाम के नाम अपने इस खुले जवाब में.. उन्ही चिंताओं पर अपनी बेबाक राय ज़ाहिर कर रहे हैं.. अभय तिवारी |
इसका अध्ययन किया जाना चाहिए कि आज़ादी की लड़ाई में जब टाटा बिड़ला सहित कई उद्योगपति गांधी जी का समर्थन कर रहे थे तो क्या उसी वक्त वो अपने काम काज में उदार थे। क्या वो सभी को काम के बराबर मेहनताना दे रहे थे? क्या वे अपने मज़दूरों का शोषण नहीं कर रहे थे? अगर ऐसा था तो उसी वक्त हमें मज़दूर आंदोलन का इतिहास देखने को क्यों मिलता है? क्यों मज़दूर मालिकों के खिलाफ लड़ रहे थे? फिर क्यों मालिक अंग्रेजों के ख़िलाफ गांधी जी का साथ दे रहे थे? मगर इसी स्पेस में बोलने की आज़ादी तो है। जिसका फायदा हम उठा रहे हैं। नुकसान उठा कर।
मैं अपनी बात पर लौटता हूं। जिस वक्त एक चैनल शिल्पा को दिखाता है उसी वक्त कहीं न कहीं दूसरा चैनल या अखबार गरीबो की चर्चा करता है। शिखा त्रिवेदी,सुतपा देब बनारस के बुनकरों की दुर्दशा पर रोती हुई खबरें कर रही होती हैं। दफ्तर में बार बार मज़ाक उड़ाए जाने के बाद भी इनकी निष्ठा नहीं बदलती। लेकिन इनके बाद बनारस के बुनकरों का कोई हाल लेगा भी मुझे यकीन नहीं है। अनिरूद्ध बहल की चर्चा भी करनी होगी। उनके कोबरा पोस्ट ने बाबाओं की लंगोट उतार दी है। वो हर दिन बाज़ार के ही सहारे व्यवस्था से टकरा रहे हैं। बाज़ार के सहारे इसलिए क्योंकि उनकी खोजी रिपोर्ट का खरीदार बाज़ार ही है। हर चैनल खरीदना चाहता है। तो इससे एक रास्ता नज़र आता है। और इससे एक कमी भी। जब हम व्यवस्था के खिलाफ ऐसी ख़बरों की खरीद कर दिखाने का जोखिम उठा सकते हैं तो खुद क्यों नहीं करते? लगता है ईमानदारी अब आउटसोर्सिंग से हासिल की जा रही है। यह भी अच्छा है। लेकिन बेनाम जी मैं यह नहीं मानता कि पत्रकारों का उदय किसी नेता के सहारे होता है। कुछ के साथ संयोगवश ऐसा हुआ हो मगर यह सच नहीं। बहुत से पत्रकार हैं जिनका नेताओं से कोई लेना देना नहीं और वो भी शिखर पर हैं। हम शिखर की धारणा भी बदल लें। शिखर किसी एक के खड़े होने की जगह नहीं रही। यहां पर कई लोग खड़े होते हैं। हिंदुस्तान में सिर्फ अपने अपने चैनलों और अखबारों के शिखर पर मौजूद संपादकों की संख्या हज़ारों में हो सकती है। इसलिए एक की नहीं उन हज़ारों की बात होनी चाहिए।
रही बात गिरावट की तो बोधिसत्व जी कह चुके हैं। हममें से ज़्यादातर लोग एक भ्रष्ट सामाजिक पारिवारिक और राजनीतिक माहौल से आते हैं। जिस समाज में दहेज की रकम घर के बड़ों के बीच तय की जाती है उसके दुल्हे समाज में ईमानदार हो सकते हैं। इसका यकीन आपको है तो मुझे कोई परेशानी नहीं। पर ये सवाल चैनलों और अखबारों में काम कर रहे पत्रकारों से मत पूछियेगा। और इस्तीफे की मांग तो कतई भी नहीं कीजिएगा। पता चलेगा सब चले गए और एक दो लोग बच गए।
आपका
रवीश कुमार
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