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संतुलन हो काम और वेतन में

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बहुत सारे लोग नौकरी के इंटरव्यू के समय वेतन को लेकर बहुत ज्यादा नेगोशिएट करते हैं। कई बार तो वे जिद में आ जाते हैं कि इतने पैसों से कम में काम नहीं करेंगे। ऐसे में वे अक्सर भूल जाते हैं कि उन्हें काम क्या दिया जाने वाला है। इतना तो तय है कि जिस पद के लिये वे इंटरव्यू दे रहे हैं, उस पद का काम तो उनसे लिया ही जाएगा, लेकिन यह भी हो सकता है कि उसके अलावा उनसे वह काम भी कराया जाए, जो उनके हिस्से का है ही नहीं।

बहुत सी कम्पनियां है, जो अपने सीनियर कर्मचारियों को हीले-हवाले कर पैसे तो बहुत ज्यादा दे देती हैं, लेकिन साथ ही उन्हें नियंत्रण में रखने के लिये उन्हें अधिकार नहीं देती। यही नहीं, उनसे कई बार वे काम भी करवाती हैं, जो उन्हें नहीं करना चाहिए। इससे वे बाकी दूसरे कर्मचारियों के बीच यह संदेशा देना चाहती हैं कि फलां को कम्पनी भले इतने ज्यादा पैसे दे रही है, लेकिन दरअसल उसे वह हैसियत नहीं दी गई है, जो इतनी तनख्वाह वाले को दी जानी चाहिए। जिनके लिये पैसा ही सबकुछ होता है, उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन जो पैसे और काम के साथ आत्मसम्मान की भी चिंता करते हैं उनके लिये यह स्थिति असहनशील होती है।

आपको कम्पनी का वाइस प्रेसीडेंट बनाया गया और तनख्वाह भी मोटी पा रहे हैं, लेकिन हो सकता है कि आपको यह अधिकार भी न दिया जाए कि आप अपने लिये एक स्टेनों भी नियुक्त कर पाएं। जब आप वेतन पर इतना नेगोशिएट कर सकते हैं, तो क्यों नहीं साथ ही यह भी पूछ लेना चाहिए कि आपके अधिकार क्या होंगे। क्या आप किसी को हायर कर सकते हैं या किसी को फायर। अमूमन देखा जाता है कि कम्पनियां उनके जिद के आगे झुकती हैं, और सार्वजनिक तौर उन्हें झुकने को मजबूर कर देती हैं। थोड़ी अदूरदर्शिता के कारण किसी दुष्चक्र में फंसने से तो बेहतर है कि काम और सेलेरी के बीच एक संतुलन रखा जाए क्योंकि इनमें से कोई भी कम होगा या कोई भी ज्यादा तो दुखों का कारण बन सकता है।

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