सोच-समझ कर करें अधिकार का उपयोग
जब आपको कोई अधिकार दिया जाता है, तो साथ ही आपका अधिकार क्षेत्र तय कर दिया जाता है. आप अपने अधिकार क्षत्र से बाहर जाकर अपने अधिकार या उसके कारण आपको मिली ताकत का प्रदर्शन नहीं कर सकते. अगर करते हैं, तो आपको अपमान झेलने के लिये पूरी तरह तैयार रहना चाहिए.
एक दफ्तर की बात है. वहां एक सिक्योरिटी इंचार्ज था. चूंकि इंचार्ज था, इसलिये उसे अधिकार मिला हुआ था कि वह सबको हड़का सके. किसी के भी बैग की तलाशी ले सके. किसी से भी कह सके कि फलां काम यहां मत करो, इससे परिसर की सुरक्षा को खतरा हो सकता है. उसके इस व्यवहार के कारण सबसे उसका बड़ा खौफ था. वह जहां से गुजर जाता, तो लोग थोड़ा सिमट जाते. जो कुछ गलत कर रहे होते, वह तुरंत सीधे हो जाते. एक दिन वह बस से अपने घर जा रहा था. उसी बस में दफ्तर के कुछ लोग भी बैठे थे. बस के कंडक्टर के साथ उसकी किसी बात को लेकर झड़प हो गई. कंडक्टर की तू-तड़ाक इंचार्ज को नागवार लगी और वह कंडक्टर से भिड़ गया. लेकिन यह उसका दफ्तर नहीं था, जो सीधे हीरो की तरह भिड़ जाया जाए. वहां उसका अपमान हुआ. झगड़ा हुआ और उसे मार पड़ गई. साथ के लोग देख रहे थे. अगले कुछ ही दिनों में यह बात दफ्तर में फैल गई और इंचार्ज के लिये मुश्किल समय आ गया. उसका बना-बनाया आइकान टूट गया. जो लोग उससे डरते थे, डरना छोड़ दिया. उसकी छवि धूमिल हो गई. उसका मजाक बना, वह अलग. लोग उसकी बात सुनने की बजाय उससे भिड़ने का सोचते. उसके लिये वहां अपना रुआब बनाए रख पाना कठिन हो गया.
उसे बस में नहीं लड़ना चाहिए था. और अगर लड़ना भी था तो नागरिक सिद्धांतों के तहत यानी वह पुलिस में कंडक्टर की शिकायत कर सकता था, पर उसने अपनी आदत के मुताबिक हड़काने का तरीका अपनाया. सार्वजनिक जीवन उसका अधिकार क्षेत्र नहीं था. वह दरोगा का अधिकार हो सकता है, पर सिक्योरिटी इंचार्ज का नहीं. अधिकार आपकी काम के प्रति गंभीरता और ईमानदारी



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