खुद से ज्यादा काम को बोलने दें
अगर कोई कम्पनी फायदे में चल रही है, तो उसका विस्तार भी होग. उसमें नए - नए विभाग भी बनेंगे और नए-नए लोग भी आएंगे. वे जूनियर भी होंगे और सीनियर भी. अगर आप उस कम्पनी में काम करते हैं और सीनियर हैं, तो कम्पनी आपके अनुभव का लाभ लेने के लिये आपको नए विभाग में भेज भी सकती है. ऐसी भी स्थिति आ सकती है कि नए विभाग में आपको जूनियर के साथ बैठना पड़ सकता है. ऐसा कई बार होता है. ऐसी स्थिति सीनियर कर्मचारी को नागवार लगती है कि कम्पनी ने कहां फंसा दिया. वह नौकरी छोड़ने के बारे विचार करने लगता है, परंतु यह रवैया सही नहीं है.
सीनियर कर्मचारी को जूनियरों के साथ बिठाने का आशय यह होता है कि वह अपने ज्ञान और अनुभव से जूनियरों को सीधा फायदा पहुंचाये और उन पर लगातार नर रखकर नियंत्रण भी करे. जब हम काम के मैदान में उतरते हैं, तो उस वक्त सीनियर और जूनियर कोई चीज नहीं होती. उस वक्त सिर्फ काम देखा जाता है. आपके सामने काम होता है. उसे सही तरीके से पूरा करना होता है. अगर आपने कर लिया, तो आप साथ के और लोगों पर हावी हो गये, भले आप जूनियर हैं. पर अगर सही तरीके से नहीं कर पाए, तो आपका क्रेडिट थोड़ा गिर सकता है, भले आप कितने ही सीनियर क्यों न हो. सीनियर और जूनियर बहुत पुराना द्वंद हैं. दोनों एक दूसरे से कभी संतुष्ट नहीं हो सकते. एक-दूसरे का साथ दे सकते हैं, लेकिन दोनों अपनी महत्ता स्थापित करना चाहते हैं. अगर आपको किसी दूसरे विभाग में भेजा गया है, तो वहां आपको अपना मुंह बंद रखकर शुरु में काम का मुंह खोलना पड़ेगा. काम बोलने लगेगा, तो सारे दुख चिंता मिट जाते हैं. फिर लोग खुद आपके साथ आने लगते हैं.



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