छूलो आसमां : अपनी मेहनत से मजबूर करें
एक दफ्तर में काम होता था. काम करने वालों की जिम्मेदारी थी कि वे अपना काम करें. मैनेजमेंट की जिम्मेदारी थी कि वह मैनेज करे. एक समय आया, जब दोनों ने अपनी जिम्मेदारी को पूरी तरह निभाना बन्द कर दिया. जो मैनेजमेंट थी, वह मैनेज करने में असफल रही. जो काम करने वाले थे, वे पूरी तरह काम नहीं कर पाये. दरअसल, वे आपस में भिड़ गए. मैनेजमेंट का कोई निर्णय कर्मचारियों को अच्छा नहीं लगा. सो उन्होंने गासिप करना शुरु कर दिया. ऐसा अक्सर हो जाता है. जब तक कोई नया मुद्दा नहीं मिलता, तब तक वे उस पर लगे रहते हैं. कभी-कभी यह गासिप विवाद की दिशा में भी बढ जाता है. उन सब लोगों की जिम्मेदारी थी कि दूसरी कम्पनियों के प्रोडक्ट के बारे में सोचें. उनकी खुफियागिरी करें कि वह कौन सा नया कदम उठाने वाली हैं. पर हुआ इसका उल्टा. कर्मचारी, मैनेजमेंट की खुफियागिरी करने में लगे रहे और मैनेजमेंट कर्मचारियों की. वे आपस में भिड़ने लगे.
बहुत पुरानी कहावत है कि अगर घर के सदस्य आपस में ही भिड़ने लगें तो बाहर वालों को हावी होने का मौका मिल जाता है. दरअसल, हमें एक साथ दो मोर्चों पर लड़ना पड़ता है अंदर और बाहर. एक बार अंदर हमें पूरी सफलता न भी मिले तो कोई बात नहीं. उसका असर बाहर की लड़ाई पर नहीं पड़ने देना चाहिए.
इस साल आपको इंक्रीमेंट कम मिला, कोई बात नहीं. आप अगली बार ज्यादा ले सकते हैं, लेकिन इस बार आपकी लापरवाही के कारण कम्पनी की सेल्स गिर जाए या फिर उसकी प्रतिष्ठा को आंच पहुंची, तो जो नुकसान होगा, उसे पूरा करने के लिये एक-दो नहीं, पांच-दस हजार कर्मचारियों को दुगना पसीना बहाना पड़ेगा. दो हजार न बढने का हर्जाना दो करोड़ के नुकसान से देना होगा. एनुअल इंक्रीमेन्ट नही बढा तो आप सिर्फ तीन महीने में अपनी मेहनत और काम के बल पर ऐसा माहौल बना सकते हैं कि कम्पनी को मजबूर होकर आपको डबल इंक्रीमेन्ट देना पड़े. जब आपको लगे कि किसी ने आपसे छल किया, तो आप और ज्यादा मेहनत करें. किसी को झुकाना हो, तो अपनी मेहनत से झुकाएं. उल्टे सीधे कारनामे करके नहीं. मेहनत से झुकाने में सबको फायदा होता है. पाने की खुशी होती है, तो देने वाले को संतोष कि वह जो दे रहा है किसी सुपात्र को दे रहा है.



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