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एक का दोष सबके सिर क्यों

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कई बार हम कहते हैं कि फलां कम्पनी में काम नहीं करेंगे, वही कम्पनी बहुत खराब है। और कई बार किसी कम्पनी की तारीफ करते नहीं अघाते। सवाल उठता है कि कोई कम्पनी खराब कैसे हो सकती है। खराब होना व्यक्ति के स्वभाव में है, व्यवस्था का गुण नहीं है। सारी व्यवस्थाओं में सैद्धांतिक तौर पर शोषण और खराब होने का गुण नहीं होता। यह तो व्यक्तियों पर निर्भर करता है कि वे उसे खराब बना दें।

एक ही कम्पनी में एक ही आदमी का दो अलग-अलग बास के साथ काम करने का अनुभव अलग हो सकती है। मिस्टर एक्स के साथ काम करके वह खुद को बड़ा भाग्यशाली समझता हो और उसे लगता हो कि इस कम्पनी से अच्छी कोई जगह हो ही नहीं सकती। फिर मिस्टर वाई के साथ काम करके उसकी पूरी धारणा ही बदल सकती है। वाई का दुर्व्यवहार ऐसी स्थिति पैदा कर सकता है कि उसे लगेगा कि वाई ही नहीं, पूरी कम्पनी खराब है। वाई के कारण कम्पनी ने भी अब उसकी बात सुनना बन्द कर दिया है। और वह कम्पनी अच्छी कैसे हो सकती है, जिसने वाई जैसे कर्मचारी को अपने यहां नौकरी पर रख लिया है, ताकि वह सारे कर्मचारियों का खून चूसे। यानी वाई को खून चूसने की आदत के कारण कम्पनी ने शह दे रखी है आदि - आदि।

ध्यान से देखा जाए, तो सारी शिकायत हमेशा व्यक्ति को लेकर होती है। परेशान आदमी के सपनों में व्यक्ति का चेहरा आता है, कम्पनी का नहीं। दरअसल, हम चीजों को उनकी शक्ल के साथ देखने के इतने आदी हो गए हैं, हम उसमें भी कोई शक्ल लगा देते हैं। जब हम अपनी कम्पनी की बात करते हैं, तो हमें तुरन्त कुछ लोगों के चेहरे ध्यान में आते हैं, जो कम्पनी की बागडोर सम्भालते हैं। उदाहरण के लिये रिलायंस, टाटा, इंफोसिस व विप्रो का नाम आते ही मुकेश-अनिल अम्बानी, रतन टाटा, नारायणमूर्ति व अजीज प्रेमजी की शक्ल दिमाग में आने लग जाती है।

बुरे लोग भी इंसान होते हैं। वह आपसे बैर रखते हैं और आप उनसे बैर रखते हैं, लेकिन इस दुनिया में ऐसे कई लोग हैं जिन्हें वे प्यार करते हैं और लोग उन्हें प्यार करते हैं। हिटलर को भी अपनी प्रेमिका से बहुत प्यार था और कई लोग थे, जिन्हें हिटलर से प्यार था। लेकिन हिटलर के कारण हम जर्मनी से तो नफरत नहीं कर सकते। एक देश के रूप में जर्मनी ने सभ्यता के विकास में कई बड़े योगदान दिये हैं। एक आदमी के कारण पूरी कम्पनी को दोष देने का रवैया गलत है। इससे जितना संभव हो बचने की कोशिश की जानी चाहिए।

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