जेब से तय होता है असंतोष
पिछले दिनों टीवी पर एक हालीवुड अभिनेत्री के किचन पर डाक्यूमेंट्री दिखाई जा रही थी। अभिनेत्री अपने किचन की डिजाइन को चेंज करवा रही थी। पहले उसका पुराना किचन दिखाया गया, जो कि एक आम आदमी की नजर में बहुत आलीशान किचन था। पर अभिनेत्री उससे संतुष्ट नहीं थी। वह कह रही थी कि इसमें प्लेटफार्म पत्थर का है, जिससे उसके बच्चों को चोट लगने का खतरा रहता है। उसने संभवत पंद्रह दिन में किचन बदलवा दिया। वह भी अच्छा था। मार्के की बात यह है कि अभिनेत्री इस नए किचन से भी बहुत संतुष्ट नहीं थी और कह रही थी कि कुछ महीने में वह इस किचन को भी बदल देगी। देखिये, उसमें कितना असंतोष भरा है। वह किसी बात से संतुष्ट नहीं होती।
दरअसल, किसी भी व्यक्ति के संतोष का स्तर उसकी जेब में पड़े पैसों से निर्धारित होता है। हम सब लोग अपनी किसी न किसी चीज से असंतुष्ट होते हैं, लेकिन उसे बदलवा नहीं पाते, क्योंकि हमारी जेब एलाऊ नहीं करती। हम सोचते हैं कि चीज तो है ही, क्यों उसमें पैसा खर्च किया जाए। थोड़ा सा एडजस्ट कर लेने में क्या जाता है। अगर हमारे पास पैसे हों, तो हम उसे तुरंत बदलवा दें। संतोष की सीमा यही पैसे होते हैं। अगर आपको अपनी सीमा पता चल जाए, तो आप कभी असंतुष्ट नहीं रहेंगे।
असंतोष में हमेशा वही रहता है, जिसे अपनी सीमाओं के बारे में ज्ञान नहीं होता। या जो उसकी फिक्र नहीं करता। मान लीजिये कि आप कामर्स ग्रेजुएट हैं, तो आप सीए बन सकते हैं। पर आप डाक्टर नहीं बन सकते। आप डाक्टर के पेशे को लेकर असंतोष नहीं व्यक्त कर सकते। आपके हाथ में जो हुनर होता है, आप उसी को लेकर असंतुष्ट हो सकते हैं। आप क्रिकेट खेलना जानते हैं तो फुटबाल की कोई बात आपको असंतुष्ट नहीं कर सकती। आपका असंतोष यही होगा कि आप जिस टीम को खेलते हुए देख रहे हैं, वह अच्छा नहीं खेल रही।



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