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पापड़ ने बनाया पूरे गांव को मालामाल

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सृजन शिल्‍पी जी ने बीते शुक्रवार को लिखा था कि पत्रकारों, आओं अब गांवों की ओर लौटें। अब मैं आपको बताता हूं कि गुजरात के एक सफल गांव की कहानी जिसने पापड़ के बल पर पूरी गरीबी ही दूरी नही की, बल्कि आज वहां हर घर में से कम से कम एक सदस्‍य एनआरआई है। समूचे भारत में है कोई ऐसा शहर या महानगर जिसने इस तरह का कारनामा कर दिखाया हो।

पापड़ बेलना....कड़ी मेहनत के लिए जग प्रसिद्ध इस कहावत ने किसी की तकदीर बदली हो या नहीं लेकिन गुजरात के एक छोटे से गांव उत्‍तरसंडा की तकदीर जरुरी बदल दी। गुजरात के नडियाद शहर से छह किलोमीटर दूर उत्‍तरसंडा गांव आज समूची दुनिया में पापड़ के लिए विख्‍यात हो गया है वहीं इस गांव में गरीबी का नामोनिशान नहीं है। इस गांव में अब हर घर में कम से कम एक सदस्‍य अनिवासी भारतीय भी बन गया है। तकरीबन 17 हजार की आबादी वाले इस गांव में पापड़ के छोटे बड़े लगभग 22 उत्‍पादक हैं। यहां के पापड़ देश में ही नहीं विदेश में भी खूब बिक रहे हें।

गुजरात के खेडा जिले के गांव उत्‍तरसंडा में 1986 में पापड़ बनाने की शुरूआत हुई। उत्‍तरसंडा के पड़ौसी गांव के निवासी दीपक पटेल ने उत्‍तम पापड़ ब्रांड के तहत पापड़ बनाने का यहां पहला कारखाना खोला। इस समय यह कारखाना करमसद गांव के रहने वाले जीतू त्रिवेदी संभाल रहे हैं। दीपक पटेल के पुत्र अमरीका में रह रहे हैं और दीपक पटेल भी वहीं चले गए हैं। उत्‍तरसंडा में पापड़ बनाने की ऑटोमैटिक मशीनें भी गई हैं जिनमें पापड़ सूखकर बाहर आता है। जीतू त्रिवेदी का कहना है कि धूप में सूखने वाले पापड़ में मिर्च मसालों की सुगंध हमेशा बनी रहती है। साथ ही पापड़ ताजा हो तभी स्‍वादिष्‍ट लगता है। स्‍वाद की गहराई बताते हुए जीतू त्रिवेदी कहते हैं कि पापड़ का स्‍वादा 25 दिन बाद बदल जाता है। उत्‍तरसंडा के 22 पापड़ उत्‍पादकों में से चार मुख्‍य हैं जिनमें उत्‍तम पापड़, श्रीजी पापड़, यश पापड़ और हर्ष पापड़ हैं। उत्‍तम पापड़ को छोड़कर सभी पापड़ उत्‍पादकों के पास पापड़ बेलने, सूखाने के बाद तीन मिनट में पैकिंग के लिए पापड़ के तैयार हो जाने वाली मशीनें गई हैं। इस गांव में पापड़ के लिए आटा गूंथने, पापड़ बेलने और सूखाने का काम मशीनों से ही होता है।

श्रीजी पापड़ के मालिक कनुभाई पटेल कहते हैं कि रोजाना 500 किलो पापड़ बनाने की दो मशीनें और एक हजार किलो पापड़ बनाने वाली एक मशीन लगातार काम करती रहे तो भी हम मांग को पूरा नहीं कर पाते। कनुभाई के कारखाने में तकरीबन सौ लोगों को रोजगार मिला हुआ है। वे कहते हैं कि हमारा समूचा कारोबार नगद में होता है, कोई उधार नहीं।

हर रोज एक हजार किलो पापड़ बनाने वाले यश पापड़ के मालिक देवेन्‍द्र पटेल बताते हैं कि हमने 1997 में रोजाना सौ किलो पापड़ बनाने से शुरूआत की थी और आज हमारे पापड़ लंदन, दक्षिण अफ्रीका, आस्ट्रिया, चीन, अमरीका और खाड़ी के देशों में खूब बिक रहे हैं। यश पापड़ सिंगल मिर्च, डबल मिर्च, लहसुन, पंजाबी, जीरामिर्च, पूरी पापड़, डिस्‍को पापड़, ओनली गार्लिक, लाल मिर्च पापड़ सहित बारह तरह के पापड़ और मठियां चोराफली बनाते हैं।

उत्‍तरसंडा के पापड़ उत्‍पादकों का कहना है कि इस गांव की जलवायु पापड़ उद्योग के अनुकूल है जो पापड़ को सफेद, कोमल, पतला और स्‍वादिस्‍ष्‍ट बनाती है। उत्‍तरसंडा में पापड़ उत्‍पादकों को उड़द एंव मोठ की दाल और मसालों की आपूर्ति करने वाले हितेश दलाल कहते हैं कि उत्‍तरसंडा में रोजाना चार हजार किलो से ज्‍यादा पापड़ बनते और बिकते हैं।

साइड बिजनैस के रुप में शुरूआत करने वाले हर्ष पापड़ के मालिक वैशाली पटेल और प्रीतेश पटेल के लिए अब यही मुख्‍य कारोबार बन गया है। पापड़ उत्‍पादकों का संगठन न होने से पापड़ के भावों को लेकर सभी उत्‍पादकों में एक समानता न होने और बैंकों के रुखे व्‍यवहार से प्रीतेश पटेल काफी नाराज हैं। वे कहते हैं कि हमारा अच्‍छा कारोबार होने के बावजूद बैंक कर्ज देने से आनाकानी करते हैं। सरकारी बैंक कहते हैं कि कर्ज चाहिए तो फिक्‍स डिपॉजिट देनी होगी। अगर हमारे पास फिक्‍स डिपॉजिट के लिए पैसा हो तो हम कर्ज क्‍यों लेना चाहेंगे। वाकई पापड़ जैसे एक छोटे से उत्‍पाद ने इस गांव को जिस तरह आर्थिक रुप से सबल बना दिया वह देश के हजारों गांवों के लिए अनुकरणीय है।

साभार : http://journalistkamal.blogspot.com/2007/04/blog-post_16.html

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