समर्पण और पुरस्कार के बीच का फासला
आपका समर्पण और उसके बदले मिलने वाला पुरस्कार दोनों में कोई तुलना नहीं की जा सकती. जैसे एक तरबूज और एक अंगूर संख्या में एक ही जितने होते हैं, लेकिन फिर भी दोनों बराबर नहीं होते, उसी तरह समर्पण और पुरस्कार दोनों कभी बराबर नहीं हो सकते. मान लीजिये कि आप घर से निकलते वक्त पत्नी से कह आए कि बहुत दिन हो गये, घूमने नहीं गये, आज शाम जल्दी आउंगा. फिर अचानक आप दोपहर को फोन करते हैं कि अरे यार, आज भी नहीं हो पाएगा. काम आ गया है. एक दिन आप बच्चे से कहकर आते हैं कि शाम को उसके साथ थोड़ी देर खेलुंगा, पर उस दिन भी वही कहानी दुहराई जाती है. किसी दिन आपके पास काम आ जाता है तो किसी दिन बास दो घंटे एक्सट्रा बिठाकर मीटिंग करने लगता है. आखिरकार आप अपने परिवार के प्रति जिम्मेदारी या वचन को पूरा नहीं कर पाते.
इस तरह आप अपनी कम्पनी के प्रति अपने सौ फीसदी समर्पण को दिखाते हैं. आप अपने आप से कहते हैं कि कम्पनी की खातिर आप अपने परिवार की खुशियों की बलि दे रहे हैं. साल पूरा होने के बाद एक दिन आपको पता चलता है कि आपका इंक्रीमेंट सिर्फ 15 फीसदी लगा है. आप याद करते हैं कि सबसे ज्यादा इंक्रीमेंट 20 से 25 फीसदी के आस-पास होता है. इससे ज्यादा किसी का नहीं होता. आप हैरान रह जाते हैं. आपने सौ फीसदी समर्पण दिखाया, पर आपको इंक्रीमेंट उतना नहीं मिला. क्या मतलब है. दरअसल जब आप दो गुना देते हैं, तब आपको पावभर मिलता है. यह ऐसा ही है कि आपने खाना बनाने में दो घंटे लगाये, पर उसे खाने में आपको दो मिनिट ही लगे.
बहुत ज्यादा मेहनत से संतोषजनक परिणाम मिल सकता है. अगर आप कम मेहनत करेंगे, तो समझ लीजिये, परिणाम ही न मिले. ऐसा नहीं है कि कम इंक्रीमेंट लगाने वाला बास खराब हो या कम्पनी खराब, पर ऐसा नहीं है. यह एक अघोषित किस्म का नियम है. धीरे-धीरे आपका समय कम्पनी में गुजरता रहता है. पांच साल बाद आप पाते हैं कि आपके समर्पण में तो कोई कमी नहीं आई, पर आपको मिलने वाला पुरस्कार यानी इंक्रीमेंट में कमी आने लगी है. यह अब दस फीसदी हो गया है. ठीक यही समय होता है जब आपको अपनी कम्पनी के बारे में फिर से सोचना चाहिए. आपको ऐसी कम्पनी खोजनी चाहिए जहां समर्पण और पुरस्कार के बीच फासला कम हो. पूरी तरह तो कभी खत्म नहीं हो सकता, इसलिये आपको कम फासले वाली कम्पनी खोजनी होगी.



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