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	<title>कैफेहिन्दी</title>
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		<title>भगीरथजी मुनि के रेती पर उर्फ भगीरथ –गंगा नवकथा</title>
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		<pubDate>Sun, 22 Jun 2008 07:00:00 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[गंगा को जमीन पर लाने वाले अजर-अमर महर्षि भगीरथजी स्वर्ग में लंबी साधना के बाद जब चैतन्य हुए, तो उन्होने पाया कि भारतभूमि पर पब्लिक पानी की समस्या से त्रस्त है। समूचा भारत पानी के झंझट से ग्रस्त है। सो महर्षि ने दोबारा गंगा द्वितीय को लाने की सोची। महर्षि भारत भूमि पर पधारे और [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p></p><p><img class="alignnone" src="http://cafehindi.com/files/ganga_551490244.jpg"/></p>
<p>गंगा को जमीन पर लाने वाले अजर-अमर महर्षि भगीरथजी स्वर्ग में लंबी साधना के बाद जब चैतन्य हुए, तो उन्होने पाया कि भारतभूमि पर पब्लिक पानी की समस्या से त्रस्त है। समूचा भारत पानी के झंझट से ग्रस्त है। सो महर्षि ने दोबारा गंगा द्वितीय को लाने की सोची। महर्षि भारत भूमि पर पधारे और मुनि की रेती, हरिद्वार पर दोबारा साधनारत हो गये। </p>
<p>मुनि की रेती पर एक मुनि को भगीरथ को साधना करते देख पब्लिक में जिज्ञासा भाव जाग्रत हुआ। </p>
<p>छुटभैये नेता बोले कि गुरु हो न हो, जमीन पक्की कर रहा है। ये अगला चुनाव यहीं से लड़ेगा। यहां से एक और कैंडीडेट और बढ़ेगा। बवाल होगा, पुराने नेताओं की नेतागिरी पर सवाल होगा। </p>
<p>पुलिस वालों की भगीरथ साधना कुछ यूं लगी-हो न हो, यह कोई चालू महंत है। जरुर साधना के लपेटे में मुनि की रेती को लपेटने का इच्छुक संत है। तपस्या की आड़ में कब्जा करना चाहता है। </p>
<p>खबरिया टीवी चैनलों को लगा है कि सिर्फ मुनि हैं, तो अभी फोटोजेनिक खबरें नहीं बनेंगी। फोटोजेनिक खबरें तब बनेंगी, जब मुनि की तपस्या तुड़वाने के लिए कोई फोटोजेनिक अप्सरा आयेगी। टीआरपी साधना में नहीं, अप्सराओं में निहित होती है। टीवी पर खबर को फोटूजेनिक होना मांगता। </p>
<p>नगरपालिका वालों ने एक दिन जाकर कहा-मुनिवर साधना करने की परमीशन ली है आपने क्या। </p>
<p>भगीरथ ने कहा-साधना के लिए परमीशन कैसी। </p>
<p>नगरपालिका वालों ने कहा-महाराज परमीशन का यही हिसाब-किताब है। आप जो कुछ करेंगे, उसके लिए परमीशन की जरुरत होगी। थोड़े दिनों में आप पापुलर हो जायेंगे, एमपी, एमएलए वगैरह बन जायेंगे, तो फिर आप परमीशन देने वालों की कैटेगरी में आयेंगे। </p>
<p>भगीरथ ने कहा-मैं साधना तो जनसेवा के लिए कर रहा हूं। सांसद मंत्री थोड़े ही होना है मुझे। </p>
<p>जी सब शुरु में यही कहते हैं। आप भी यही कहते जाइए। पर जो हमारा हिसाब बनता है, सो हमें सरकाइये-नगरपालिका के बंदों ने साफ किया।</p>
<p>देखिये मैं साधु-संत आदमी हूं, मेरे पास कहां कुछ है-भगीरथ ने कहा। </p>
<p>महाराज अब सबसे ज्यादा जमीन और संपत्ति साधुओं के पास ही है। न आश्रम, न जमीन, न कार, न नृत्य की अठखेलियां, ना चेलियां-आप सच्ची के साधु हैं या फोकटी के गृहस्थ। हे मुनिवर, आजकल साधुओं के पास ही टाप टनाटन आइटम होते हैं। दुःख, चिंता ,विपन्नता तो अब गृहस्थों के खाते के आइटम हैं-नगरपालिका वालों ने समझाया। </p>
<p>भगीरथ यह सुनकर गुस्सा हो गये और हरिद्वार-ऋषिकेश से और ऊपर के पहाड़ों पर चल दिये। </p>
<p>भगीरथ को बहुत गति से पहाड़ों की तरफ भागता हुआ सा देख कतिपय फोटोग्राफर भगीरथ के पास आकर बोले &ndash;देखिये, हम आपको जूते, च्यवनप्राश, अचार कोल्ड ड्रिंक, चाय, काफी, जूते, चप्पल जैसे किसी प्राडक्ट की माडलिंग के लिए ले सकते हैं।</p>
<p>पर माडलिंग क्या होती है वत्स-भगीरथ ने पूछा। </p>
<p>हा, हा, हा, हा हर समझदार और बड़ा आदमी इंडिया में माडलिंग के बारे में जानता है। आप नहीं जानते, तो इसका मतलब यह हुआ कि या तो आप समझदार आदमी नहीं हैं, या बडे़ आदमी नहीं हैं। एक बहुत बड़े सुपर स्टार को लगभग बुढ़ापे के आसपास पता चला कि उसकी धांसू परफारमेंस का राज नवरत्न तेल में छिपा है। एक बहुत बड़े प्लेयर को समझ में आया कि उसकी बैटिंग की वजह किसी कोल्ड ड्रिंक में घुली हुई है। आप की तेज चाल का राज हम किसी जूते या अचार को बना सकते हैं, बोलिये डील करें-फोटोग्राफरों ने कहा। </p>
<p>देखिये मैं जनसेवा के लिए साधना करने जा रहा हूं-भगीरथ ने गुस्से में कहा। </p>
<p>गुरु आपका खेल बड़ा लगता है। बड़े खेल करने वाले सारी यह भाषा बोलते हैं। चलिये थोड़ी बड़ी रकम दिलवा देंगे-एक फोटोग्राफर ने कुछ खुसफुसायमान होकर कहा। </p>
<p>जल संकट से द्रवित होकर जनता को परेशानी से निजात दिलाने के लिए गंगा द्वितीय को पृथ्वी पर लाने का उपक्रम करने लगे। इसके लिए वह हरिद्वार के पास मुनि की रेती पर साधनारत हुए तो नगरपालिका वालों ने, नेताओं ने और दूसरे तत्वों ने उन्हे परेशान किया। वह परेशान होकर ऊपर पहाड़ों पर जाने लगे, तो कई फोटोग्राफरों ने उनके सामने तरह-तरह के आइटमों के माडलिंग के प्रस्ताव रखे। फोटोग्राफरों ने उनसे कहा कि इस तरह की जनसेवा के पीछे उनका जरुर बड़ा खेल है और इस खेल के साथ वे चार पैसे एक्स्ट्रा भी कमा लें, तो हर्ज नहीं है।अब आगे पढ़िये समापन किस्त में।)</p>
<p>देखिये, ये क्या खेल-खेल लगा रखा है। क्यां यहां बिना खेल के कुछ नहीं होता क्या-भगीरथ बहुत गुस्से में बोले। </p>
<p>जी बगैर खेल के यहां कुछ नहीं होता। यहां गंगा इसलिए बहती है कि वह गंगा साबुन के लिए माडलिंग कर सके। गोआ में समुद्र इसलिए बहता है कि वह गोआ टूरिज्म के इश्तिहारों में काम आ सके। हिमालय के तमाम पहाड़ इसलिए सुंदर हैं कि उन्होने उत्तरांचल टूरिज्म, उत्तर प्रदेश टूरिज्म के इश्तिहारों में माडलिंग करनी है। आपकी चाल में फुरती इसलिए ही है कि वह किसी चाय वाले या च्यवनप्राश वाले के इश्तिहार में काम आ सके। आपके बाल अभी तक काले इसलिए हैं कि वे नवरत्न तेल के इश्तिहार के काम आ सकें। हे मुनि, डाल से चूके बंदर और माडलिंग के माल से चूके बंदों के पास सिवाय पछतावे के कुछ नहीं होता-एक समझदार से फोटोग्राफर ने उन्हे समझाया। </p>
<p>भगीरथ मुनि गु्स्से में और ऊंचे पहाड़ों की ओर चले गये। </p>
<p>कई बरसों तक साधना चली। </p>
<p>मां गंगा द्वितीय प्रसन्न हुईं और एक पहाड़ को फोड़कर भगीरथ के सामने प्रकट हुईं। </p>
<p>जिस पहाड़ को फोड़कर गंगा प्रकट हुई थीं, वहां का सीन बदल गया था। बहुत सुंदर नदी के रुप में बहने की तैयारी गंगा मां कर ही रही थीं कि वहां करीब के एक फार्महाऊस वाले के निगाह पूरे मामले पर पड़ गयी। </p>
<p>वह फार्महाऊस पानी बेचने वाली एक कंपनी का था। </p>
<p>गंगा द्वितीय जिस कंपनी के फार्महाऊस के पास से निकल रही हैं, उसी कंपनी का हक गंगा पर बनता है, ऐसा विचार करके उस कंपनी का बंदा भगीरथ के पास आया और बोला कि गंगा पर उसकी कंपनी की मोनोपोली होगी। वही कंपनी गंगा का पानी बेचेगी। </p>
<p>तब तक बाकी पानी कंपनियों को खबर हो चुकी थी। </p>
<p>बिसलेरी, खेंचलेरी, खालेरी, पालेरी, पचालेरी, फिनफिन, शिनशिन,छीनछीन समेत सारी अगड़म-बगड़म कंपनियों के बंदे मौके पर पहुंच लिये।</p>
<p>हर कंपनी वाला भगीरथ को समझा रहा था कि वह उसी की कंपनी को ज्वाइन कर ले। मुंहमांगी रकम दी जायेगी। गंगा द्वितीय उस कंपनी की संपत्ति हो जायेगी और भगीरथ को रायल्टी दे दी जायेगी। </p>
<p>पर भगीरथ नहीं माने। वह गंगा द्वितीय को जनता को समर्पित करना चाहते थे। </p>
<p>किसी कंपनी वाले की दाल नहीं गली। </p>
<p>पर&#8230;&#8230;&#8230;.।</p>
<p>सारी कंपनियों के बंदों ने आपस में खुसुर-पुसर की। खुसर-पुसर का दायरा बढ़ा, नगरपालिकाओं वाले आ गये। माहौल और खुसरपुसरित हुआ-भगीरथी की फ्यूचर पापुलरिटी की सोचकर आतंकित-परेशान नेता भी आ लिये। वाटर रिस्टोरेशन के लिए काम कर रहे एनजीओ के बंदे भी इस खुसर-पुसर में शामिल हुए। </p>
<p>फिर &#8230;&#8230;&#8230;..भगीरथ गिरफ्तार कर लिये गये।</p>
<p>उन पर निम्नलिखित आरोप लगाये गये-</p>
<p>1- शासन की अनुमति लिये बगैर भगीरथ ने साधना की। इससे कानून &ndash;व्यवस्था जितनी भी थी, उसे खतरा हो सकता था।</p>
<p>2- इस इलाके को पहले सूखा क्षेत्र माना गया था। अब यहां पानी आने से कैलकुलेशन गड़बड़ा गये। पहले इसे सूखा क्षेत्र मानते हुए यहां तर किस्म की ग्रांट-सब्सिडी की व्यवस्था की गयी थी योजना में। अब दरअसल पूरी योजना ही गड़बड़ा गयी। यह सिर्फ भगीरथ की वजह से हुआ। योजना प्रक्रिया को संकट में डालने का अपराध देशद्रोह के अपराध से कम नहीं है। &lt;!&#8211;[endif]&#8211;&gt;</p>
<p>&lt;!&#8211;[if !supportLists]&#8211;&gt;3- भगीरथ ने विदेशों से आ रही मदद, रकम में बाधा पैदा करके राष्ट्र को बहुमूल्य विदेशी मुद्रा से वंचित किया है। इस क्षेत्र के जल संकट को निपटाने के लिए फ्रांस के एनजीओ फाऊं-फाऊं फाउंडेशन और कनाडा के एनजीओ खाऊं-खाऊं ट्रस्ट ने लोकल एनजीओज (संयोगवश जिनकी संचालिकाएं स्थानीय ब्यूरोक्रेट्स की पत्नियां थीं) को कई अरब डालर देने का प्रस्ताव दिया था। अब जल आ गया, तो इन एनजीओज को संकट हो गया। फ्रांस और कनाडा के एनजीओज ने सहायता कैंसल कर दी। इस तरह से भगीरथ ने गंगा द्वितीय को बहाकर विदेशी मदद को अवरुद्ध कर दिया। भारत को विदेशी मुद्रा से वंचित करना देशद्रोह के अपराध से कम नहीं है। &lt;!&#8211;[endif]&#8211;&gt;</p>
<p>&lt;!&#8211;[if !supportLists]&#8211;&gt;4- पहाड़ को फोड़कर गंगा द्वितीय जिस तरह से प्रकट हुई हैं, उससे इस क्षेत्र का नक्शा बदल गया है, जो हरिद्वार नगर पालिका या किसी और नगर पालिका ने पास नहीं किया है। &lt;!&#8211;[endif]&#8211;&gt;</p>
<p>&lt;!&#8211;[if !supportLists]&#8211;&gt;5- शासन की सम्यक संस्तुति के बगैर जिस तरह से नदी निकली है, वह हो न हो, किसी दुश्मन की साजिश भी हो सकती है। &lt;!&#8211;[endif]&#8211;&gt;</p>
<p>गिरफ्तार भगीरथ जेल में चले गये, उनको केस लड़ने के लिए कोई वकील नहीं मिला, क्योंकि सारे वकील पानी कंपनियों ने सैट कर लिये थे।</p>
<p>लेटेस्ट खबर यह है कि गंगा निकालना तो दूर अब भगीरथ खुद को जेल से निकालने का जुगाड़ नहीं खोज पा रहे हैं। </p>
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		<title>करकट दमनक और जंगल की महारानी</title>
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		<pubDate>Sun, 22 Jun 2008 06:55:00 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[जंगल मे महाराज के आकस्मिक निधन हो जाने पर करकट दमनक ने महारानी तो तख्त का वारिस घोषित कर अपनी तिकडी को फ़िट करने की बहुत कोशिश की ,पर महारानी ने एक बैल को चुना जो जुगाली करने के अलावा सिर्फ़ सिर हिलाता रहता था,लेकिन फ़िर भी महारानी को करकट दमनक और पिंगलक की सहायता [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p></p><p><img class="alignnone" src="http://cafehindi.com/files/"/></p>
<p>जंगल मे महाराज के आकस्मिक निधन हो जाने पर करकट दमनक ने महारानी तो तख्त का वारिस घोषित कर अपनी तिकडी को फ़िट करने की बहुत कोशिश की ,पर महारानी ने एक बैल को चुना जो जुगाली करने के अलावा सिर्फ़ सिर हिलाता रहता था,लेकिन फ़िर भी महारानी को करकट दमनक और पिंगलक की सहायता तो लेनी ही पडी.
</p>
<p>काफ़ी वक्त गुजर गया, महारानी भी जंगल की राजनीती मे अपनी समझ दिखाने लगी थी ,महारानी ने जैसे ही जंगल मे चुनाव कराने की इच्छा जाहिर की,दमनक ने तडाक से जंगल के कर्मचारियो के वेतन बढाने की घोषणा महारानी से करवा दी.</p>
<p>करकट दमनक और पिंगलक पुराने खिलाडी थे,उन्होने तुरंत भाप लिया महारानी अब सीधे सीधे&nbsp; खुद या फ़िर राजकुमार के नाम पर शासन संभालना चाहती है </p>
<p>पिंगल नाम का सुअर जो हमेशा उस जगह अपनी थूथन गडाये फ़िरता था जहा माल मिलने की कोई संभावना हो,महाराज के खजाने की देख रेख के नाम पर हरएक से कुछ ना कुछ निकलवाने मे उस्ताद था ,उसी ने ने महाराज के&nbsp; चुनाव आदेश के नाम पर मोटा माल वसूल कर आधा अपने घर भेजा आधा महाराज के पास जमा करा दिया था</p>
<p>जंगल मे व्यापारियो ने पिंगल को दिये पैसे तुरंत पूरे करने के लिये माल की कमी दिखा कर रेट दुगने चौगुने वसूल करने शुरू कर दिये.</p>
<p>जनता त्राही त्राही करने लगी ,बात महारानी तक पहुची,महारानी ने मिटिंग बुलाई ,दमनक ने महारानी को पक्का यकीन दिला दिया की महंगाई कही नही बढी है केवल जंगल मे ये कुछ विरोधी पार्टी के&nbsp; लाला लोग माल दबाकर मोटा माल कमाने की फ़िराक मे है अगर आपकी आज्ञा हो तो सेनापती को बुला कर माल जब्त करा देते है,जनता को भी लगेगा कि हमने कुछ किया और विरोधी पार्टी के कुछ बंदे भी अपने कब्जे मे आ जायेगे</p>
<p>बाकी सारी जनता आपके ही गुण गा रही है,पर राजकुमार के लिये वक्त ठीक नही चल रहा राजपुरोहित का कहना है कि उन्हे एक सौ एक दलितो के घर जाकर मांग कर खाना चाहिये इस टोटके के बाद राजकुमार के राजयोग मे कोई परेशानी नही आयेगी,एक पंथ दो काज हो जायेगे , राजकुमार को जनता के बीच भेज कर दिखवा लीजीये,महारानी को बात जमी,और राजकुमार जनता के बीच हाथो हाथ लिये गये ,राजकुमार किसी भी दलित के घर जाकर अपने आदमियो से खाना बनवाकर जनता के साथ बैठ्कर खाते और अपना बिस्तर किसी के भी घर मे बिछवा कर रातगुजार लेते ,जनता उन्हे देखने मे लगी थी और दमनक करकट के भेजे चेले उनकी इतनी जय जयकार करते कि उन्हे लगता वो वाकई राजकुमार है और जंगल के मालिक,</p>
<p>लेकिन महगांई तो वाकई मे बढ चुकी थी खाने पकाने का ईधन से लेकर खाने का सामान सभी बाजार मे बहुत महंगा मिल रहा था,ऐसे मे करकट दमनक और पिंगल ने मिलकर अखबार वालो को बुला कर बताया कि जनता के पास आज बहुत पैसे है जिनकी वजह से वोह ढेरो वस्तुये खरीद रहे है महारानी के शासन मे&nbsp; उनका जीवन स्तर बढ गया है आप देखिये आज बाजार मे कोई इलेक्ट्रोनिक सामान खरीदिये हमने चीन से सस्ते सामान आयात करा दिये है,बाजार मे प्रतिस्पर्धा बढी है,लोगो को चाईनीज थाई इतेलियन खाना खाने की आदते पड गई है जिसके वजह&nbsp; से जंगल मे उपलब्ध देसी खाना हमने विदेशो मे बेचने वाले किसानो को सबसिडी देकर मोटी कमाई करवाई है देखिये शराब की बिक्री के आकडे बताते है कि जनता के पास बहुत पैसा है हमने जो माल खुलवाये है,दुनिया भर की बडी बडी कम्पनी के जंगल मे खुले आऊट लेट बताते है कि महंगाई कही नही है घंटॊ लाईन मे लग कर फ़िर कही अंन्दर जाने का नंबर आता है,अभी हम आपलोगो की ही मांग पर&nbsp; जुए के अड्डो को कानूनी रूप देने मे लगे है,और आप कहते है महंगाई बढ रही है&nbsp; ?</p>
<p>आपलोग सिर्फ़ अपना अखबार चलाने के लिये रोज गलत खबरे दे रहे है,अगर आप इस वक्त हमारा सहयोग नही करेगे तो यकीन रखियेगा हम भी पहले की तरह आपलोगो को पदमश्री वगैरा नही दे पायेगे </p>
<p>आप लोग ऐसा कीजीये इस वक्त हमे आपकी और आपके अखबार या चैनल को सरकारी सहायता की जरूरत है. हर दस मिनिट बाद ये एड हर दस मिनिट मे आपके चैनल पर दिखाई देगे,लेकिन अगर अभी भी आप महंगाई का रोना जारी रखते है तो विज्ञापन को भूल ही जाईये,</p>
<p>आने वाले वक्त मे बच्चे से लेकर बूढे तक की जबान पर यही विज्ञापन होगा लोग महंगाई भूल चुके होगे.</p>
<p>बस उसी दिन से जंगल के हर बडे बच्चे के मुंह से यही निकल रहा है बिंदास बोल कंडोम बोल ,सरकार महंगाई शब्द को ही कंडम कर चुकी है,महारानी और राजकुमार जोश मे है ,करकट दमनक और पिंगल मिलकर राजकुमार को गद्दी पर बैठाने की जोर शोर से घोषणा मे वयस्त है जंगल की जनता हमेशा की तरह तॄस्त है.</p>
<p>साभार: <a href="http://pangebaj.blogspot.com/2008/04/blog-post_17.html">http://pangebaj.blogspot.com/2008/04/blog-post_17.html</a></p>
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		<title>अप्रतिम सौंदर्य का प्रतीक – नैनीताल</title>
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		<pubDate>Thu, 13 Sep 2007 11:12:00 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[एक शहर जिसकी खूबसूरती ही उसकी पहचान है। बात हो रही है उत्तरांचल की। चारों ओर सुन्दर और घनी वादियों से घिरे इस शहर को देखकर ऐसा लगता है कि कुदरत ने इस जगह को बेपनाह हुस्न बख्शा है। नैनीताल की खोज मिस्टर पी. बैरन ने १८४० में की थी। इस शहर की खूबसूरती में [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p></p><p><img class="alignnone" src="http://cafehindi.com/files/nainital_239909148.jpg"/></p>
</p>
<p><font size="2">एक शहर जिसकी खूबसूरती ही उसकी पहचान है। बात हो रही है उत्तरांचल की। चारों ओर सुन्दर और घनी वादियों से घिरे इस शहर को देखकर ऐसा लगता है कि कुदरत ने इस जगह को बेपनाह हुस्न बख्शा है। </font></p>
<p><font size="2">नैनीताल की खोज मिस्टर पी. बैरन ने १८४० में की थी। इस शहर की खूबसूरती में चार चांद लगाती है यहां स्थित नैनी झील। जिसके कारण इसे सरोवर नगरी भी कहा जाता है। आंख का आकार लिये हुए इस झील के बारे में मान्यता यह है कि पार्वती अपने पूर्व जन्म में सती राजा की पुत्री थी। उस जन्म में भगवान शिव से रुष्ट होकर वह सती हो गयी थी। तब उनकी आंख इस जगह पर गिरी थी। वैसे यह झील अपना रंग बदलती रहती है। कभी हरा तो कभी नीला। इस झील की गहराई भी बहुत अधिक है। पर्यटक झील का आनन्द नौकायन द्वारा करते हैं। झील के समीप ही नयना देवी मंदिर भी है जो कि बहुत पुराना है और मान्यता भी बहुत अधिक है। यहीं पर प्रसिद्ध नन्दा देवी का मेला लगता है।</font></p>
<p><font size="2">नैनीताल का इतिहास पौराणिक कथाओं में कितना सच है, इस बात के पुख्ता सबूत नहीं परन्तु यह शहर अंग्रेजी हुकूमत का साक्षी है व उसके कई साक्ष्य भी यहां मौजूद हैं। अंग्रेजों का इस शहर से लगाव उनके द्वारा बनवाये गये भवनों और सड़कों से लगाया जा सकता है। यहां कि प्रसिद्ध माल रोड को अंग्रेजों ने निर्मित करवाया था। हिन्दुस्तानियों के प्रति उनकी घृणा और तिरस्कार यह सड़क आज भी बयां करती है। अंग्रेजों ने इस मार्ग को ऊपर-नीचे दो हिस्सों में बांटा था। ऊंची सड़क सिर्फ अंग्रेजों के लिये थी तथा निचले मार्ग से हिन्दुस्तानी जाते थे। भारतियों को ऊपरी सड़क पर चलने की सख्त मनाही थी। <br />माल रोड के अलावा अंग्रेजों ने राजभवन का निर्माण करवाया था, जो आज भी सचमुच किसी राजा के महल के समान प्रतीत होता रहै। वर्तमान उत्तरांचल का उच्च न्यायालय जो कि नैनीताल में स्थित है, अंग्रेजों द्वारा निर्मित है। इसकी बनावट व खूबसूरत देखते ही बनती है।</font></p>
<p><font size="2">हर वर्ष हजारों देशी-विदेशी सैलानी नैनीताल घूमने आते है। यहां देखने के लिये बहुत ही जगह है। जैसे स्नो व्यू, टिफिन टाप, नैना पीक आदि। यह पिकनिक पाइंट बहुत ऊंचाई पर है। इनमें से स्नो व्यू पर आप रोप-वे से भी जा सकते हैं। अगर मौसम सुहावना है तो आप यहां से दूरबीन द्वारा दूर पहाड़ों पर बिखरी बर्फ को भी देख सकते हैं। यहां एक प्राणी उद्यान भी है, जहां बहुत से दुलर्भ प्राणियों को भी देखा जा सकता है। यहां का साइबेरियन बाघ इस प्राणी उद्यान की शान है। यहां पर कई पक्षी ऐसे हैं जिनकी जाति विलुप्त होने के कगार पर है। नैनीताल में एक जगह कैमल्स बैक के नाम से प्रसिद्ध है। यहां पर कुछ पहाड़ियां एक साथ इस तरह की हैं कि मानो बहुत से ऊंट बैठे हों। कैमल्स बैक से कुछ दूरों पर लैण्ड्स एंड है। यहां ऐसा लगता है कि धरती का यह आखिरी छोर है और आगे धरती समाप्त हो गई। नैनीताल पर्यटन स्थल के अलावा एक और बात के लिये प्रसिद्ध है, वह है यहां कि खूबसूरत मोमबत्तियां। यहां तरह-तरह के आकार की रंग-बिरंगी मोमबत्तियां बनाई जाती है, जिसे यहां आये हुए सैलानी खरीदना नहीं भूलते। </font></p>
<p><font size="2">यहां के लकड़ी के बने शो-पीस बहुत ही खूबसूरत होते हैं। वर्षा ऋतु को छोड़कर यहां वर्ष भर पर्यटकों का जमावड़ा लगा रहता है। शीत ऋतु में यहां गिरने वाली बर्फ भी पर्यटकों को अपने ओर खींचने लगती है। शीत ऋतु में बर्फ की चादर ओढे नैनीताल और भी खूबसूरत लगता है। हर साल हजारों सैलानी नववर्ष मनाने यहां आते हैं। </font></p>
<p><font size="2">सिर्फ नैनीताल ही नहीं, बल्कि इससे जुड़े आस-पास के इलाके भी देखने योग्य है। नैनीताल से २२ किलोमीटर की दूरी पर स्थित भीमताल भी एक पर्यटन स्थल के रूप में प्रसिद्ध है। यहां पर एक झील भी है। इस झील की सबसे खास बात यह है कि झील के बीचों-बीच एक टापू है, इस टापू पर एक रेस्टोरेंट है। पर्यटकों को इस जगह पर आने के लिये नाव का सहारा लेना पड़ता है। नैनीताल से २३ किलोमीटर दूर सात ताल है। कहा जाता है कि इस ताल के सात कोने है, पर कोई भी व्यक्ति पूरे सात कोनों को एक साथ नहीं देख सकता। </font></p>
<p><font size="2">वर्तमान समय में पर्यावरण के बढते प्रदूषण से नैनीताल भी अछूता नहीं रहा है। प्रदूषण के कारण यहां की नैनी झील भी मैली हो चुकी है। हर वर्ष यहां मरने वाली मछलियों की संख्या में तेजी पाई गई है। ग्लोबल वार्मिंग के कारण यहां के तापमान में भी बढोतरी हुई है। यहां गिरने वाली बर्फ में भारी कमी आई है। हालांकि प्रशासन इस प्राकृतिक धरोहर को प्रदूषण मुक्त करने के बहुत से उपाय कर रहा है, जिसके चलते नैनीताल में पालीथीन के प्रयोग पर प्रतिबंध है। इतना करना पूर्ण नहीं है। यहां आने वाले पर्यटकों को भी इस जगह के प्रति अपना दायित्व समझना होगा। भविष्य में हम लोग नैनीताल को किताबों में देखना चाहते हैं या यथार्थ में। यह हम सबको मिलकर तय करना है। </font></p>
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		<title>कामरेड के किस्से</title>
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		<pubDate>Sat, 25 Aug 2007 20:10:48 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[कामरेड नाराज थे, नान-कामरेड साथी को बोल दिया-अब हनीमून खत्म।नान-कामरेड साथी का जवाब था-हू केयर्स, गेट लौस्ट।कामरेड को इस जवाब की उम्मीद ना थी। कामरेड ने फिर वही किया, जो वह 77797979797 बार कर चुके थे।कामरेड बोले-सो व्हाट, हनीमून खत्म होने से शादी तो खत्म नहीं होती। हम साथ रह सकते हैं। चलो चार-पांच महीने [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p></p><p><img class="alignnone" src="http://cafehindi.com/files/gussa_197604389.jpg"/></p>
</p>
<p><font size="2">कामरेड नाराज थे, नान-कामरेड साथी को बोल दिया-अब हनीमून खत्म।<br />नान-कामरेड साथी का जवाब था-हू केयर्स, गेट लौस्ट।<br />कामरेड को इस जवाब की उम्मीद ना थी। कामरेड ने फिर वही किया, जो वह 77797979797 बार कर चुके थे।<br />कामरेड बोले-सो व्हाट, हनीमून खत्म होने से शादी तो खत्म नहीं होती। हम साथ रह सकते हैं। चलो चार-पांच महीने साथ रह सकते हैं। पर मैं अपने स्टैंड पर कायम हूं। हनीमून खत्म।<br />फिर कामरेड ने एक दिन फील किया कि पीछे से उन्हे एक जोरदार लात पड़ी है। शायद नान कामरेड साथी ने दी है ,जमा कर।<br />कामरेड नाराज हुए और बोले-मैं नाराज हूं। हनीमून खत्म।<br />नान कामरेड साथी ने कहा-अबे चिरकुट, हनीमून खत्म होने की बात तू सुबह से सातवीं बार बोल रहा है। कितनी बार हनीमून खत्म करेगा।<br />कामरेड ने कुछ कैलकुलेट करते हुए कहा-नहीं इस बार पक्का।<br />नान-कामरेड साथी ने मौज लेते हुए कहा-कामरेड हनीमून आप खत्म करने की बात कैसे कर सकते हो। आप तो बाहर से सपोर्ट देते रहे हो। कोई बाहर से ही हनीमून के लेवल पर कैसे पहुंच सकता है। अगर आप हनीमून की बात कर रहे हो, तो कबूल करो कि अंदर ही थे, और हनीमूनिंग कर रहे थे। पब्लिक को बताते रहे कि क्रांति कर रहे हैं, पर सच में हनीमून कर रहे थे।<br />कामरेड परेशान हो गये। पब्लिक जवाब मांगने लगी-कामरेड जब तुम बाहर थे, तो हनीमून कैसे कर रहे थे। इसका मतलब तुम बाहर दिखते थे, पर अंदर थे।<br />कामरेड परेशान हैं-हनीमून की बात मानें, तो अंदर साबित हो जायेंगे।<br />हनीमून की बात ना मानें, तो कैरेक्टर पर सवाल उठेंगे कि बाहर से कोई हनीमूनिंग कैसे कर सकता है।<br />कामरेड परेशान हैं, कैरेक्टर पर सवाल उठ रहे हैं।<br />आप बतायें कि कामरेड क्या करें।</font></p>
<p><font size="2"><strong>खौं खौं हें हें<br /></strong>कामरेड परेशान हैं, आज कुछ बैलेंस खराब हो गया।<br />तय यह हुआ था कि नान कामरेड के सामने दिन में पचास बार हें हें करेंगे और पच्चीस बार खौं खौं करना है।<br />इस पर हें हें, उस पर खौं खौं।<br />बल्कि यह तक तय हो गया, कि खौं खौं हें हें हो पहले हो जायेगी। यह किसलिए हुई है, यह तय बाद में कर लेंगे।<br />रोज कामरेड नियम से इत्ती यूनिट हें हें और उत्ती यूनिट खौं खौं भिजवाते रहे।<br />रिसीव करने वाले उसे रद्दी की टोकरी में डालते रहे।<br />एक दिन कामरेड ने खौं खौं कुछ ज्यादा की।<br />जैसा कि होता था कि वह भी रद्दी में चली गयी।<br />कामरेड गुस्सा थे-इस बार मैं सीरियस हूं।<br />ओह, तो अब तक आप नान सीरियस थे क्या-नान कामरेड साथी ने पूछा।<br />नहीं इस बार सच्ची की खौं-खौं-कामरेड गुस्सा थे।<br />पर क्यों-नान कामरेड साथी ने पूछा।<br />कामरेड बोले-तुम्हारा चाल -चलन खराब है, अमेरिका से तुम्हारे रिश्ते हैं।<br />नान-कामरेड ने कहा-वो तुम्हे पहले क्यों नहीं दिखे। चाल- चलन तो हमारा हमेशा से ऐसा है। कामरेड बोले-जितना जब देखना अफोर्ड कर सकते हैं, उतना ही तो देखेंगे। अब तुम्हारी बदचलनी दिख रही है।<br />नान कामरेड साथी बोले-बदचलनी क्या है, इससे हमें क्या नुकसान हैं। इसकी स्टडी करने के लिए हम एक कमेटी बना देते हैं। जो रिपोर्ट दे देगी। बाद में देख लेंगे।<br />कामरेड जैसा कि अकसर होता है, इस बार भी राजी हो गये हैं।<br />पब्लिक मौज ले रही है कि कामरेड इत्ते भोले हैं कि बदचलनी अब तक देख ही ना पाये। कामरेड सचमुच बहुत भोले हैं।<br />खैर, कामरेड आदत के मुताबिक फिर खौं खौं कर रहे हैं, पब्लिक उसे हें हें समझकर हंस रही है।<br />कामरेड ने एक दिन आईने में देखा, तो डर गये। वह खुद को शेर समझकर दहाड़ते थे, पर उन्होने देखा कि जिसे वह दहाड़ समझते हैं, वह म्याऊं जैसा कुछ है।<br />कामरेड परेशान हैं, वह खौं खौं निकाल रहे हैं, पर हें हें ही निकल रही है।<br />कामरेड क्या करें, यह सोच रहे हैं।<br />सीनियर कामरेड ने बताया है कि कुछ ना करें, कमेटी की रिपोर्ट की प्रतीक्षा करें। कुछेक दिन में कोई नया घोटाला सामने आ जायेगा। संजय दत्त को मिली जमानत में पेंच हो जायेंगे। पब्लिक का ध्यान हट जायेगा। फिर आप खौं खौं करे, या म्याऊं, कोई फर्क नहीं पड़ता।<br />सो कामरेड अब प्रतीक्षा कर रहे हैं।</font></p>
<p><font size="2"><strong>कामरेड के कनफ्यूजन</strong><br />कामरेड से पूछा किसी ने-कामरेड, इस न्यूक्लियर डील के रुक जाने से पाकिस्तान खुश होगा। भाजपा वाले खुश होंगे, चीन वाले खुश होंगे और आप खुश होंगे। तो बताइए कि आपको पाकिस्तान के साथ माना जाये या भाजपा के साथ।<br />कामरेड ने थोड़ा कैलकुलेट करके बताया-देखिये भाजपा के साथ नहीं हैं हम। भाजपा वाले अलग हल्ला मचायेंगे, हम अलग। भाजपा वाले अगर हो हो करेंगे, तो हम हाय हाय करेंगे। मतलब वैसे हम भाजपा के साथ खड़े दिखते हैं, वैसे हम पाकिस्तान के साथ खड़े भी दिख सकते हैं, पर वैसे तो हम कांग्रेस के साथ भी खड़े दिखते हैं। मतलब हम कांग्रेस को बाहर से सपोर्ट देते हैं। मतलब यूं तो चीन को भी हम यहां बाहर से ही सपोर्ट देते हैं। मतलब हम किसके साथ हैं, यह अभी क्लियर नहीं है।<br />कामरेड अभी कनफ्यूज्ड हैं कि वह कहां है। आपको पता लग जाये,तो उन्हे बता दीजिये प्लीज।<br /></font></p>
<p><font size="2">आलोक पुराणिक<br />मोबाइल-9810018799<br /></font></p>
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		<title>अभाव और सन्नाटे में बच्चे जल्दी बड़े हो जाते हैं</title>
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		<pubDate>Sat, 25 Aug 2007 19:54:47 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[मज़दूरों कीअंधेरी गंदी बस्ती मेंअब कोई कुछ नहीं बोलता एक अजीब सन्नाटे नेकफ़न की तरहढांप लिया है पूरी बस्ती कोजहां हर चीज़ भयावह लगती हैक्योंकिकफ़न आदमी के अन्दरपैदा करता है भय! जितना सफेद होगा कफ़नउतना ज्यादा डरायेगा। जाहिर हैहर सफेद चीज़ परनहीं किया जा सकता भरोसाबस्ती वाले भी नहीं करतेउन्होंने कर दिया है बेनक़ाबसफेदपोशों को [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p></p><p><img class="alignnone" src="http://cafehindi.com/files/bacche_734348656.jpg"/></p>
</p>
<p><font size="2">मज़दूरों की<br />अंधेरी गंदी बस्ती में<br />अब कोई कुछ नहीं बोलता</p>
<p>एक अजीब सन्नाटे ने<br />कफ़न की तरह<br />ढांप लिया है पूरी बस्ती को<br />जहां हर चीज़ भयावह लगती है<br />क्योंकि<br />कफ़न आदमी के अन्दर<br />पैदा करता है भय!</p>
<p>जितना सफेद होगा कफ़न<br />उतना ज्यादा डरायेगा।</p>
<p>जाहिर है<br />हर सफेद चीज़ पर<br />नहीं किया जा सकता भरोसा<br />बस्ती वाले भी नहीं करते<br />उन्होंने कर दिया है बेनक़ाब<br />सफेदपोशों को</p>
<p>और तब से<br />मुंह फेर लिया है<br />इंक़लाबी नारों ने।</p>
<p>पहले ख़ामोश हुआ था<br />कारखाने का सायरन<br />फिर उम्मीद जगाते नारे</p>
<p>अब तो बिल्कुल सन्नाटा है&#8211;<br />कुत्ते भी नहीं भौंकते<br />और बच्चे?</p>
<p>वे तो अब किसी बात के लिए<br />जिद तक नहीं करते।</p>
<p>अभाव और सन्नाटे में<br />बच्चे जल्दी बड़े हो जाते हैं।</font></p>
<p><font size="2">साभार: <a href="http://satyendra2007.blogspot.com/">http://satyendra2007.blogspot.com/</a></font></p>
<p><font size="2">&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;&#8212;</font></p>
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		<title>हमसफ़र</title>
		<link>http://cafehindi.com/281-.html</link>
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		<pubDate>Sat, 25 Aug 2007 19:47:31 +0000</pubDate>
		<dc:creator></dc:creator>
		
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		<description><![CDATA[पूरा मकान भांय-भांय कर रहा था। सुंदरी का कोई पता नहीं था। घोष बाबू परेशान थे। यह सुंदरी भी कभी-कभी बहुत तंग करती थी। उसकी हर ज़रूरत का ध्यान रखते थे घोष बाबू लेकिन फिर भी कभी कभी गच्चा दे जाती थी। सुंदरी के बिना तो पूरा मकान ही सूना लगता था और फिर घोष [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p></p><p><img class="alignnone" src="http://cafehindi.com/files/humsafar_104325266.jpg"/></p>
</p>
<p><font size="2">पूरा मकान भांय-भांय कर रहा था। सुंदरी का कोई पता नहीं था। घोष बाबू परेशान थे। यह सुंदरी भी कभी-कभी बहुत तंग करती थी। उसकी हर ज़रूरत का ध्यान रखते थे घोष बाबू लेकिन फिर भी कभी कभी गच्चा दे जाती थी। सुंदरी के बिना तो पूरा मकान ही सूना लगता था और फिर घोष बाबू के लिए समय काटना मुश्किल हो जाता था। आज दोपहर से ही गायब थी। और अब रात के आठ बजने जा रहे थे। घोष बाबू चिंतित भी थे और गुस्सा भी। चिंतित कि कहीं उसे कुछ हो न गया हो। गुस्सा कि इस तरह गायब होने की ज़रूरत क्या है? वह अक्सर इसी तरह बीच-बीच में गायब हो जाती थी और फिर वापस आ जाती थी। अगर इस बार ऐसा हुआ तो उसे वह घर में नहीं घुसने देंगे। फसला पक्का हो गया था। आज सारी रात उसे घर के बाहर ही गुजारनी होगी। खाना भी नहीं मिलेगा। उसके लिए तली गई मछली उन्होंने फिज में रख दी । मुख्य दरवाजा बन्द कर दिया। सारी खिड़कियां बंद करने लगे लेकिन उस खिड़की तक पहुंचते-पहुंचते उनके हाथ अचानक थम गये, जिसका इस्तेमाल सुंदरी सबसे ज्यादा करती थी। रात भर बाहर रहने में उसे काफी तकलीफ होगी। इतनी बड़ी सजा उसे नहीं मिलनी चाहिए। हां, ड़ांट पिला देंगे लेकिन बिना खाये पिये रात भर घर के बाहर&#8212;नहीं!नहीं !! यह बहुत बड़ी सजा हो जायेगी। उन्होंने खिड़की खुली छोड़ दी। पलंग पर आ कर बैठ गये। गुस्से में इतना काम करते-करते वे बुरी तरह थक गये थे। उन्हें इस तरह भाग-दौड़ करनी भी नहीं चाहिए थी। सत्तर साल की उम्र, ऊपर से दिल के मरीज। वे लेट गये। गठिया की वजह से ठीक से चला भी नहीं जाता था। घुटने बग़ावत कर देते थे लेकिन फिर भी घोष बाबू अभी चल रहे थे, सक्रिय थे।</p>
<p>लेटे-लेटे उनकी नज़र सामने की दीवार पर टंगी कमला की तस्वीर पर चली गई। हंसता हुआ जीवंत चेहरा। अगर आज वह होती तो उनके थक कर लेटने पर परेशान हो जातीलेकिन आज उनके लिए परेशान होने वाला कोई नहीं है। सुंदरी होती तो वह भी पास आकर लेट जाती। वह और कुछ कर पाये या नहीं अच्छा साथ ज़रूर निभाती है। उससे भी बल मिलता है। आशीष को गये छह महीने से ज्यादा हो गये थे। आशीष रहता तो नन्ही नातिन उन्हें घेरे रहती। उनकी परेशानी से वह सबसे ज्यादा परेशान होती थी। दादू-दादू करते हुए आगे पीछे। कभी-कभी इसके लिए भी उसे अपनी मां से डांट खानी पड़ती थी। और उस दिन तो हद हो गई जिस दिन सात साल की नन्ही के गाल पर उसके मां की पांचों अंगुलियां इसलिए छप गईं कि वह उनके पास से हटने का नाम ही नहीं ले रही थी। उस दिन उन्हें गुस्सा कम पीड़ा ज्यादा हुई थी। क्या इसी दिन के लिए लोग बेटा-बहू-नाति-पोते के सपने देखते हैं? इतने हसीन सपने का इतना डरावना सच ! लेकिन अब वे मुक्त हैं। आशीष ने उन्हें रोज-रोज के तनाव से बचा लिया । अलग फ्लैट खरीद कर चला गया। लगभग बीस किलोमीटर दूर। पुश्तैनी मकान में अब कोई तनाव नहीं। अब वे मुक्त हैं। अपनी ज़िंदगी है , अपनी मर्जी है, अपनी पेंशन है। सबकुछ ठीकठाक है लेकिन कभी-कभी मकान में पसरा सन्नाटा बहुत ही डरावना लगने लगता है।</p>
<p>दीवार घड़ी ने नौ बजने का संकेत दिया। यह उनके रात के भोजन का समय है लेकिन बिना सुंदरी के भोजन? इस बात की कल्पना से ही उन्हें सिहरन होती थी। घर खाली होने के बाद से ही सुंदरी उनकी ज़िंदगी बन चुकी थी। चौबीसों घंटे की ज़रूरत थी सुंदरी। बिना सुंदरी के उनका कोई काम नहीं होता थाऔर वही सुंदरी आज दोपहर से गायब थी। कहीं कोई पता नहीं था। एक बार सोचा ढूढने निकलें लेकिन इतनी रात को गठिया वाले घुटनों को लेकर उसे कहां खोजेंगे? चुपचाप इंतजार करना ही बेहतर सोचा। आज खाने के कार्यक्रम में थोड़ा विलंब होगा। मासी (काम करने वाली महरी) खाना बना कर कब की जा चुकी थी। आज सुंदरी के लिए इंतजार करेंगे। खाने का कार्यक्रम कम से कम दस बजे तक के लिए स्थगित कर दिया उन्होंने।</p>
<p>आशीष के जाने के बाद घर बिल्कुल सूना हो गया था। दिन नहीं कट रहे थे। ज़िंदगी में कोई तनाव नहीं था लेकिन था अकेलापन, पीड़ा, दुख। कमला की तस्वीर ने तब उनका बहुत साथ दिया था। मानो हर वक्त संवाद होता रहता था। चार दिन बाद अचानक सुंदरी उनकी ज़िंदगी में आई थी। और फिर उस दिन से वहीं की हो कर रह गई थी वह। सुंदरी को लेकर वे फिर जी उठे। उठते-बैठते-खाते-पीते बस सुंदरी। अब सुंदरी के लिए वे सप्ताह में कम से कम तीन दिन बाज़ार ज़रूर जाते क्योंकि बिना मछली के सुंदरी को खाना हज़म ही नहीं होता था। दोस्त-साथी तो चकित रह जाते थे। कहते थे&#8212;घोष बाबू, पहले तो आप इतना बाज़ार नहीं जाते थे लेकिन अब हर दूसरे दिन बाज़ार। घोष बाबू कहते&#8212;अरे, स्वस्थ रहता तो रोज जाता। सुंदरी को ताजा मछली पसंद है लेकिन क्या करूं शरीर इजाजत नहीं देता। इसलिए बेचारी को फिज में रखी मछली से काम चलाना पड़ता है। सुंदरी का रूटिन फिक्स था। सुबह ठीक आठ बजे&#8211;घोष बाबू चाय पीते थे और सुंदरी दूध। उन दोनों के नाश्ते की व्यवस्था मासी करती थी। मासी सुबह सात बजे से शाम छह बजे तक उनके पास रहती थी और इस दौरान सारा काम निपटा कर जाती थी। दोनों वक्त का खाना भी वही बनाती थी। बारह बजे एक तली हुई मछली। घोष बाबू के लिए फिर से चाय। चाय के बहुत शौकीन थे वे। अब तो खैर चाय ज़िंदगी का हिस्सा बन गई थी। वे कहते भी&#8212;वह बंगाली ही क्या, जो चाय नहीं पीता हो। चाय नहीं पीने वाला व्यक्ति और चाहे जो भी हो लेकिन बंगाली नहीं हो सकता। दोपहर का खाना ढाई बजेतक फिर थोड़ा आराम। शाम साढ़े चार बजे घोष बाबू इवनिंग वाक के लिए निकल जाते। मॉर्निंग वाक उन्होंने बंद कर दिया था। पहले सुबह चार बजे ही मॉर्निंग वाक पर निकल जायाकरते थे। एक बार बेहोश होकर गिर पड़े थे।दिल का हल्का सा दौरा था। लगभग आधे घंटे तक सड़क पर पड़े रहे। उतनी सुबह बाहर कौन मिलता, जो उन्हें अस्पताल तक ले जाता। बाल-बाल बच गये थे। तब से मॉर्निंग वाक बंद कर दिया था। शाम को भीड़भाड़ में निकलते थे। अगर रास्ते में कुछ हो भी गया तो लोग उन्हें संभालेंगे तो सही। घुटनों की वजह से ज्यादा चल नहीं पाते थे। पास के मैदान में जाकर थोड़ा टहलते, फिर मैदान में ही बैठ कर सुस्ता लेते। साथ ही शाम की ताजा हवा का आनंद भी उठा लेते। इस दौरान सुंदरी उनके साथ रहती। कई लोगों ने तो मजाक भी किया-लगता है घोषबाबू का ध्यान रखने के लिए बौदी (भाभी) सुंदरी का रूप लेकर आ गई है। घोष बाबू इन बातोंपर ध्यान नहीं देते। हंस कर उड़ा देते। शाम छह बजे तक सुंदरी के साथ वे घर वापस लौट आते। मासी चाय बनाकर देती। सुंदरी दूध पीती। चाय की चुस्की के साथ घोष बाबू दिन भर का समाचार जानने के लिए टेलीविज़न से चिपक जाते। आठ नौ बजे तक टेलीविज़न चलता। फिर खाकर सोने की बारी लेकिन आज रूटिन पूरी तरह बिगड़ गई थी। टेलीविज़न तो सात बजे ही बंद हो गया। सुंदरी के नहीं आने से रात नौ बजे खाने का कार्यक्रम भी कैंसिल हो गया। हर पल तनाव जी रहे थे घोष बाबू।</p>
<p>ऐसा तनाव इससे पहले एक बार ही झेला था उन्होंने। आशीष तब छठीं कक्षा का छात्र था। शाम को सात बजे जब वे दफ्तर से घर लौटे थे तो कमला को बिलखते हुए पाया था। &#8212;क्या हुआ? पता चला आशीष अभी तक स्कूल से नहीं लौटा है। वे भी सन्न रह गये। साढ़े चार बजे तक स्कूल से लौट आने की बात थी लेकिन शाम सात बजे तक नहीं लौटा? कमला उसके सभी साथियों से पूछताछ करचुकी थी। सभी घर लौट चुके थे और किसी को भी आशीष के बारे में जानकारी नहीं थी। सबसे चौंकाने वाली बात तो अमल ने बताई थी कि वह लंच ऑवर के बाद से ही गायब है। अर्थात सेकेंड हॉफ में वह स्कूल में नहीं था। आस पड़ोस के कई लोग घर में आ गये थे। सभी सांत्वना दे रहे थे&#8212;अपनी बुआ के यहां चला गया होगा, अपने चाचा के यहां चला गया होगा, टयूशन पढ़ने गया होगा,किसी दोस्त के यहां गया होगा लेकिन घोष बाबू का मन तो किसी अशुभ बात के अलावा और कुछ सोच ही नहीं पा रहा था। अपहरण की घटनाएं काफी बढ़ गई थीं। कहीं किसी ने उसे अगवा तो नहीं कर लिया लेकिन उनकी माली हालत इतनी अच्छी नहीं थी कि कोई फिरौती के लालच में उनके बेटे का अपहरण करता। थोड़ा शकुन मिला। उन्हें विश्वास था कि किसी ने उसका अपहरण नहीं किया होगा। फिर? कहीं किसी सड़क दुर्घटना में&#8230;&#8230;&#8230;.? नहीं, नहीं ऐसा नहीं हो सकता। कमला के बार-बार मना करने के बावजूद उन्होंने आशीष के लिए साइकिल खरीद ली थी। आशीष काफी खुश हुआ था साइकिल पाकर और घोष बाबू को रोज-रोज के बस भाड़े से राहत मिली थी। अब वह साइकिल से ही स्कूल जाता था। एक के बाद एक अनिष्ट आशंकाएं मन में आ रही थीं। किसी ने थाने जाकर रिपोर्ट लिखाने की सलाह दी। पता नहीं क्यों इस सलाह पर घोषबाबू के हाथ-पांव ठंडे पड़ गये थे। थाने का नाम आते ही उन्हें लगा कि कोई बहुत बड़ा अनिष्ट हो गया हो।उनका मन नहीं माना। तय हुआ कि पहले सारे रिश्तेदारों के यहां ढूंढ लिया जाय। घोषबाबू अपनी बहन के यहां निकल गये, पास-पड़ोस के एक दो लोग उनके साथ हो लिये। एक दो लोग दूसरे रिश्तेदारों के यहां चले गये। कमला घर में रोती रही। कमला के लिए वक्त काटना मुश्किल हो गया था। तनाव का वक्त काटे नहीं कटता। आज वक्त भारी पड़ रहा था।</p>
<p>आशीष मिला था। अपनी बुआ के यहां। स्कूल से सीधे बुआ के यहां चला गया था लेकिन बुआ से यह नहीं बताया था कि उसके यहां आने की सूचना घरवालों को नहीं है। इसलिए बुआ निश्चिंत थीं। पहले भी वह बुआ के पास आकर एक दो दिन रह कर जाता था। तब रात के दस बज रहे थे। घोष बाबू को देख कर आशीष सकते में आ गया था। उसे लगा अब पिटाई होगी। वह जाकर बुआ के पीछे छिप गया। बुआ भी माजरा समझ गई लेकिन घोष बाबू को गुस्सा नहीं आया। वह रो पड़े। उन्होंने आशीष को सीने से चिपटा लिया। उस रात तो मानो कमला और घोष बाबू को नया जीवन मिला था। अब आशीष बड़ा हो गया है। बाप बन गया है। अब वह छठवीं कक्षा का आशीष नहीं है। इसलिए उसे देखे महीनों गुजर जाते हैं लेकिन घोष बाबू को वह तड़प महसूस नहीं होती, जो उस रात हुई थी। याद आती है, आंखों में आंसू भी आते हैं लेकिन वह तड़प। क्या बेटे जब बड़े हो जाते हैं तो बाप-बेटे के सम्बन्ध की संवेदनशीलता खत्म हो जाती है? क्या इसी दिन के लिए बेटे की मन्नतें मांगते हैं लोग? क्या इसी दिन के लिए लोग बेटा पैदा होने पर जश्न मनाते हैं? मिठाइयां बांटते हैं? क्या &#8230;.? क्या &#8230;.?? क्या&#8230;.??? कितने क्या लेकिन किसी भी कया का जवाब नहीं। कभी-कभी क्या के चक्रव्यूह में बुरी तरह फस जाते थे घोष बाबू और तब उन्हें लगता कि चाहें वे लाख नकारे लेकिन वह तड़प आज भी है और शायद जब तक शरीर में सांस है, तब तक वह तड़प रहेगी। क्या आशीष के मन में भी उनके लिए ऐसी तड़प आती होगी? क्या वह कभी यह सोच कर दुखी होता होगा कि पापा अकेले हैं? क्या यह सोचकर वह परेशान होता होगा कि अगर पापा को कुछ हो गया तो कौन संभालेगा उन्हें? अकेले पापा और दिल की बीमारी? क्या वह परेशान होता होगा? शायद नहीं। अगर परेशान होता तो कम से कम दस दिन में एक बार ही सही ख़बर तो लेता। यहां तो महीनों बीत जाते हैं। तीन महीना पहले आया था वह। उसके बाद से कोई ख़बर नहीं। उन्होंने सर झटक दिया। बीमारी से उन्हें डर नहीं था। बीमारी उन्हें अच्छी लगती है। कम से कम कोई चीज तो है, जो उनका साथ कभी नहीं छोड़ती। ऐसी बीमारी से क्या डरना? क्यों परेशान होना? बेटे से तो अच्छा बीमारी है। बेटे ने साथ छोड़ दिया, बीमारी ने नहीं । सुंदरी ने भी अच्छा साथ निभाया था लेकिन आज? कहां चली गई वह? घबराहट होने लगी। ज्यादा परेशान होना, ज्यादा सोचना मना था उनके लिए लेकिन आज सुंदरी ने तो परेशान किया ही, पिछले जीवन के तनावों में ढकेल दिया था। सीने में हल्का दर्द होने लगा था। वह समझ रहे थे। दिल का दौरा पड़ सकता है। पसीना भी आने लगा था। वे घबड़ा गये। घर में अकेले थे। इससे पहले कि कुछ हो तत्काल दवा लेनी ज़रूरी है। वे बिस्तर से उठे लेकिन पांव झनझना रहा था। बहुत देर तक एक ही करवट सोने की वजह से कोई नस दब गई होगी। चल नहीं पाये। वहीं लड़खड़ा कर बैठ गये। तकलीफ बढ़ गई। दवा टेबल पर रखी थी। लगभग रेंगते हुए वे टेबल तक पहुंचे। सार्बिटेट लिया और जीभ के नीचे दबा लिया। वहीं फर्श पर ही लेट गये। आंखें बंद कर ली। पसीने से लथपथ हो रहे थे। ऐसे मौकों पर अकेलापन खलता था। हालांकि घोष बाबू कभी भी सार्वजनिक रूप से यह मानने को तैयार नहीं थे कि बेटे-बहू के जाने से वे अकेले हो गये हैं। पिछले दिनों गये थे एक विवाह समारोह में. पुराने दोस्तों की महफिल जमी हुई थी। किसी ने कह दिया&#8211;घोष दा, आजकल तो बहुत अकेले हो गये हैं आप?<br />तत्काल विरोध किया था घोष बाबू ने&#8211;अकेला? नहीं तो। किसने कह दिया आपको?<br />&#8212;आशीष तो चला गया न आपको छोड़कर?<br />&#8212; छोड़कर गया कहना सही नहीं होगा। अपना फ्लैट खरीद लिया। कितना दिन खाली रखेगा। और मुझे तो तुम जानते ही हो। अपना जन्म स्थान छोड़कर मैं नहीं जा सकता लेकिन मैं अकेला नहीं हूं।<br />और फिर शुरू हो गया सुंदरी का बखान। ऐसा करती है, वैसा करती है। हमेशा मेरे साथ रहती है। यह खाती है, वह खाती है, सुबह गोद में नहीं लूं तो नाराज़ हो जाती है। पास नहीं फटकती है। मनाना पड़ता है। तबीयत खराब हो तो छोड़कर कहीं नहीं जाती। पास बैठी रहती है। हर पीड़ा, हर दुख समझती है। इतना अच्छा साथ सिफ सुंदरी ही दे सकती है और कोई नहीं। सुंदरी का बखान एक बार शुरू हुआ तो फिर दूसरे किसी विषय पर बात नहीं हो सकती थी। बस सुंदरी और सुंदरी। हक़ीकत यह थी कि जब से सुंदरी उनके जीवन में आई थी, घोषबाबू का सबसे प्रिय विषय वही थी।कोई महफिल हो, कोई आयोजन हो&#8212;चार लोगों के बीच बैठते किसी न किसी बहाने घोष बाबू के जबान पर सुंदरी का नाम आ ही जाता और फिर शुरू हो जाता सुंदरी का गुणगान। अब पीठ पीछे तो लोग मजाक भी उड़ाने लगे थे। खुद आशीष भी सुंदरी को लेकर मजाक करने से नहीं चूकता। घोष बाबू को सब पता था लेकिन उन्हें किसी की परवाह नहीं थी। उम्र के इस पड़ाव पर वे किसी की परवाह करना भी नहीं चाहते थे। अपने हिस्से की थोड़ी सी ज़िंदगी अपने ढंग से जी लेना चाहते थे। अब तक की तो ज़िंदगी उनकी अपनी ज़िंदगी रही नही। गरीबी की वजह से बचपन का हिस्सा मां-बाप घर को देखने में गया। जवानी बेटे में गया। अब बुढ़ापा अपना है। अपने ढंग से जीना है। वैसे भी बूढ़ों की ज़रूरत इस समाज में किसी को है भी नहीं लेकिन घोष बाबू समाज की आंखों में अंगुली डालकर यह दिखा देना चाहते थे कि बूढ़े बोझ नहीं। वे अभी भी बोझ उटा सकते हैं। अपनी ज़िंदगी खुद जी सकते हैं। बस सुंदरी जैसी किसी साथी का साथ चाहिए। निस्वार्थ साथ।<br />घोष बाबू अब राहत महसूस कर रहे थे। सॉर्बिटेट ने अपना काम किया था लेकिन साइड अफेक्ट की वजह से सिर भारी हो गया था। सिर दर्द वे झेल जाते थे। साइनस के मरीज थे। अक्सर जब वे दफ्तर से लौटते, साइनस का दर्द उनके साथ आता था। कमला परेशान हो जाती थी। सिर पर बाम लगाती थी। चाय बना कर देती थी। सारे जतन करती। कभी-कभी घोष बाबू मजाक में कहते भी थे कि यह साइनस मुझे बहुत प्यारा है। कम से कम इसी बहाने तुम ज्यादा से ज्यादा वक्त तक मेरे करीब तो रहती हो। घोष बाबू को साइनस से प्यार हो गया था। साइनस के दर्द को वे सीधे कमला के प्यार से जोड़ कर देखते थे लेकिन अब कमला नहीं है। अब साइनस भी नहीं है। कमला के जाने के बाद बड़ी बड़ी बीमारियों का हमला हुआ तो पता नहीं साइनस दुम दबा कर कहां भाग गया। घोष बाबू ने इसे अच्छा ही माना वरना वे साइनस के दर्द से कम कमला की कमी से ज्यादा परेशान होते।</p>
<p>घड़ी ने बारह की घंटी बजाई। मकान की सारी बत्तियां जल रही थीं। रोशनी से पूरी तरह नहा रहे मकान में घोष बाबू को अंधेरा ही अंधेरा नज़र आ रहा था। शायद इतना अकेलापन उस दिन भी महसूस नहीं हुआ था, जिस दिन आशीष घर छोड़ कर गया था। याद आ गया वो दिन, जिस दिन कमला आखिरी विदाई ले रही थी। श्मशान से लौटने के बाद घोष बाबू ने अपने अन्दर के सन्नाटे और अकेलेपन को महसूस किया था। घर में रिश्तेदारों की भीड़ थी लेकिन उस दिन घोष बाबू अकेले थे। यह अकेलापन दूर नहीं हुआ। आज भी वह अकेलापन उन्हें डराता है। सुन्दरी ने थोड़ा साथ निभा दिया था लेकिन आज वह भी नहीं थी। बुढ़ापे की आखिरी विश्वसनीय साथी। अन्दर का अकेलापन और डरावना लगने लगा । कितनी हसरत से यह घर बनाया था घोषबाबू ने लेकिन आज यह सिफ मकान है। चार दीवारों से घिरा, छत से ढंका एक मकान। घर तो कमला अपने साथ लेकर चली गई थी। घोष बाबू ने कोशिश की थी कि घर घर बना रहे लेकिन थोड़ा बहुत जो घर बचा हुआ था, उसे आशीष नन्हीं के साथ लेता गया था। घोष बाबू उठ कर खड़े हुए। शरीर उठने की इजाजत नहीं दे रहा था। ऐसे मौकों पर कमजोरी शरीर पर हावी हो जाती थी। बेवजह बत्तियों का जलना घोष बाबू को कभी भी पंसद नहीं रहा। इसे लेकर कई बार आशीष-बहू से चखचख हो चुकी है लेकिन पुरानी आदत से मजबूर। आज बीमारी की इस हालत में भी उन्हें बत्तियों का बेवजह जलना नागवार गुजरा।</p>
<p>थोड़ी ही देर में मकान में अंधेरा था। सिफ उनके कमरे की बत्ती जल रही थी। खाने का कार्यक्रम अब रद्द हो चुका था। भूख मर चुकी थी। नींद का दूर-दूर तक नामो-निशान नहीं था। दूर-दूर तक सुंदरी का भी कोई नामो निशान नहीं था। अब दिमाग सोचने की हालत में नहीं था। जब अपना बेटा अपना नहीं हुआ तो वे सुंदरी के लिए इतना परेशान क्यों हो रहे हैं? उन्होंने खुद को</p>
<p>समझाने की कोशिश की। थोड़ी तसल्ली मिली लेकिन फिर थोड़ी देर बाद घूम फिर कर वहीं चिन्ता, वही परेशानी। क्यों न किसी की मदद ली जाय? किसे फोन करें? आशीष को फोन कर फायदा नहीं। एक तो इतनी रात वह उतनी दूर से आयेगा नहीं और ऊपर से नाराज भी होगा। किसे फोन करें? अब अफसोस हो रहा था। पहले ही किसी को फोन कर सुंदरी को ढूंढने की कोशिश करनी चाहिए थी लेकिन रात के साढ़े बारह बजे किसे फोन करें। किसी को फोन करने का इरादा छोड़ दिया। नहीं अब किसी पर इस तरह निर्भर नहीं होना है। अपनी जिंदगी है, अकेले चैन से जीना चाहिए। सुंदरी के चक्कर में एक दिन की जिंदगी बर्बाद हो गई थी। वे लेट गये। नहीं आज से वे अकेले हैं। अकेले जियेंगे। उन्होंने जोर से आंखें बंद कर ली। सोने की कोशिश करने लगे। लेकिन आंखें बंद करते ही सुंदरी ज्यादा प्रबल रूप से उनकी आंखों के सामने आ गई। उन्होंने और जोर से आंखें बंद करने की कोशिश की। सुंदरी और साफ़ नजर आने लगी। उन्होंने घबराकर आंखें खोल ली। ये सुंदरी उनका पीछा क्यों नहीं छोड़ रही है? तभी आवाज आई&#8211;म्याऊं, म्याऊं&#8230;&#8230;. वे तंग आ गये। अब कान भी धोखा देने लगे? लेकिन नहीं&#8230; फिर आवाज आई&#8211;म्याऊं&#8230;..म्याऊं&#8230;&#8230;..इसका मतलब है सुंदरी आ गई थी। घोषबाबू तेजी से दरवाजे की ओर बढ़े उसके स्वागत के लिए।</font></p>
<p><font size="2">साभार: <a href="http://satyendra2007.blogspot.com/">http://satyendra2007.blogspot.com</a></font></p>
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		<title>खुदरा पर खुलकर मैदान में</title>
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		<pubDate>Fri, 24 Aug 2007 01:39:00 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[खुदरा कारोबार के संगठित योजना पर असंगठित क्षेत्र ने धावा बोलना शुरू कर दिया है. 22 अगस्त को उत्तर प्रदेश के लखनऊ, मेरठ, मुजफ्फरनगर , अलीगढ़, आगरा, बनारस और इलाहाबाद में राष्ट्रीय व्यापार मंडल के कार्यकर्ताओं और व्यवसाइयों ने शापिंग माल्स के सामने प्रदर्शन किया. बकौल एक प्रदर्शनकारी &#34;हमने तो शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया जब पुलिस [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p></p><p><img class="alignnone" src="http://cafehindi.com/files/un-reliance_520937572.gif"/></p>
</p>
<p><font size="2">खुदरा कारोबार के संगठित योजना पर असंगठित क्षेत्र ने धावा बोलना शुरू कर दिया है. 22 अगस्त को उत्तर प्रदेश के लखनऊ, मेरठ, मुजफ्फरनगर , अलीगढ़, आगरा, बनारस और इलाहाबाद में राष्ट्रीय व्यापार मंडल के कार्यकर्ताओं और व्यवसाइयों ने शापिंग माल्स के सामने प्रदर्शन किया. बकौल एक प्रदर्शनकारी &quot;हमने तो शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया जब पुलिस ने हमें प्रदर्शन से भी रोका तो तोड़-फोड़ होना लाजिमी है.&quot; लखनऊ में ही राष्ट्रीय व्यापार मंडल ने ऐशबाग स्थित स्पेंशर्स के शोरूम को निशाना बनाने का ऐलान किया था लेकिन प्रदर्शन की आशंका को देखते हुए स्पेंशर्स के कर्ता -धर्ता शोरूम पहले ही बंद करके फरार हो चुके थे. प्रदर्शनकारी आलमबाग स्थित रिलांयस फ्रेश में जा पहुंचे और वहां जमकर तोड़फोड़ कर दी. चेतावनी यह कि अगर रिलांयस वाले खुद दुकान नहीं समेटते तो यह कार्य हम व्यापारी कर देंगे . फिलहाल यह काम उत्तर प्रदेश के व्यापारियों को नहीं करना पड़ेगा. क्योंकि अगले दिन यानी 23 अगस्त को मायावती ने एक साहसिक फैसला लेते हुए रिलांयस या फिर किसी भी बड़ी कंपनी के खुदरा स्टोर खोलने पर अगले आदेश तक रोक लगा दी . यह ऐतिहासिक कदम है. मायावती ने एक और अहम फैसले की घोषणा की कि 3 अगस्त को जारी नयी कृषि नीति को लागू नहीं किया जाएगा. </font></p>
<p><font size="2">उत्तर प्रदेश में फौरी तौर पर भले ही थोड़ी राहत मिल गयी हो लेकिन देश के दूसरे हिस्सों में अभी भी विरोध जारी है. 9 अगस्त को भी देश के कई महानगरों में धरने प्रदर्शन हुए थे. दिल्ली, मुंबई, बैंगलोर, रांची जैसे शहरों में एकसाथ प्रदर्शन किया गया था और नारा लगा था कंपनियों खुदरा क्षेत्र से बाहर जाओ . इन धरने प्रदर्शनों में लगभग 35 संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने भाग लिया था. खुदरा व्यापार में कंपनियों के प्रवेश के विरोध में जितना कुछ हो रहा है उससे ज्यादा करने की योजनाएं बन रही हैं . राष्ट्रीय व्यापार मंडल के अध्यक्ष और पूर्व सांसद श्याम बिहारी मिश्र कहते हैं &quot;हमने एक नारा दिया है. व्पायारी परिवार शापिंग माल का बहिष्कार करें . बड़ी कंपनियों के खुदरा व्यापार में उतरने से सबसे ज्यादा नुकसान हम व्यापारियों को ही हो रहा है इसलिए हमने सभी व्यापारियों से आह्वान किया है कि उनके परिवार का कोई सदस्य शापिंग माल्स में नहीं जाएगा . इसके साथ ही देशभर में हम शापिंग माल्स पर धरना जारी रखेंगे.&quot; व्यापारी संगठनों की योजनाएं व्यापक हैं. बहिष्कार उसका एक हिस्सा मात्र है . </font></p>
<p><font size="2">भारतीय उद्योग व्यापार मंडल के अध्यक्ष बनवारी लाल कंछल राज्यसभा सांसद है. वे खुदरा कारोबार के खिलाफ आढ़तियों, व्यापारियों, छोटे दुकानदारों और रेहड़ीवालों को लामबंद करने का काम कर रहे हैं . वे कहते हैं &quot;मैं संसद से सड़क तक अपनी यह लड़ाई जारी रखूंगा.&quot; और वे ऐसा कर रहे हैं. 22 अगस्त को लखनऊ में धरने से दो दिन पहले उन्होंने वाणिज्यमंत्री कमलनाथ से मुलाकात की . कमलनाथ ने उन्हें आश्वासन दिया है वे &quot;खुद खुदरा कारोबार में बड़ी कंपनियों के प्रवेश के खिलाफ हैं. और इस बारे में कैबिनेट में चर्चा करेंगे .&quot; बनवारी लाल कंछल दो-चार दिनों में फिर उनसे मिलनेवाले हैं और इस बार कई सांसदों के साथ. हो सकता है वाणिज्यमंत्री ने अभी तक कैबिनेट में चर्चा करने का मन न बनाया हो लेकिन व्यापारियों ने अपने सिरे से काम करना शुरू कर दिया है . खुद कंछल ने दिल्ली में 24 नवंबर से आमरण अनशन का ऐलान किया है. उधर राष्ट्रीय व्यापार मंडल ने भी घोषणा की है वह जंतर- मंतर पर 100 घंटे का धरना देगी. और आगे की रणनीति जंतर-मंतर पर ही तय होगी.</font></p>
<p><font size="2">खुदरा व्यापार के असंगठित क्षेत्र के व्यवसायी एकजुट होकर मैदान में आ गये हैं. उन्होंने अपने-अपने हिसाब और क्षमता से विरोध भी शुरू कर दिया है. लेकिन संगठित क्षेत्र क्या कर रहा है? क्या वह चुपचाप बैठा तमाशा देख रहा है? या फिर सरकार में अपनी लाबिंग पर उसे इतना विश्वास है कि लाख-विरोध के बावजूद उसकी भविष्य की योजनाओं पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा . और भविष्य की योजनाएं क्या हैं? साल 2010 तक खुदरा व्यापार को एक लाख करोड़ के हिस्से पर कब्जा. इस कब्जे के लिए पूर्वतैयारियों में कोई कमी नहीं रखी जा रही है . अचानक ही खुदरा कारोबार पर पढ़ने-पढ़ानेवालों का ज्वार पैदा हो गया है. शोध अध्ययन के साथ-साथ प्रशासन , मीडिया और व्यावसायिक संस्थानों की तिकड़ी लगातार यह प्रचारित कर रहा है कि खुदरा कारोबार में बड़ी कंपनियों के आने से देश का बेड़ा पार हो जाएगा. </font></p>
<p><font size="2">हाल-फिलहाल में फिक्की ने एक अध्ययन किया है. &quot;संगठित व्यापारः अधूरा एजंडा और आगे की चुनौतियां.&quot; इस अध्ययन में कहा गया है &quot; वर्तमान में भारत में खुदरा कारोबार 328 अरब डॉलर का है. वर्तमान में संगठित व्यापार का हिस्सा नगण्य है और वह अधिकांश बड़े शहरों में सिमटा है . कुल संगठित खुदरा व्यापार का 82 प्रतिशत सिर्फ छह शहरों में होता है.&quot; इसे और विस्तार देने के लिए फिक्की ने जो योजनाएं तैयार की हैं उसमें मुख्य हैं सरकार अपनी नीतियों में बदलाव करे , श्रम कानूनों को सरल करे, सरकार विदेशी पूंजी निवेश की भी छूट दे, लोगों में खर्च करने और खरीदने की मानसिकता बढ़े, आधारभूत ढांचा और मानव संसाधन का विकास हो. यह आधारभूत ढांचा है माल, सुपरमार्केट, हाईपर मार्केट, छोटी दुकानें , और इन सबको माल पहुंचानेवाली मंडी प्रणाली पर अपना कब्जा. सरकार के कामकाज को देखें तो समझ में आ जाता है कि फिक्की जैसे संगठन अपनी व्यावसायिक लाबिंग में सफल हो रहे हैं. </font></p>
<p><font size="2">23 अगस्त को मायावती ने जिस नयी कृषि नीति को वापस लेने का ऐलान किया उसकी घोषणा 3 अगस्त को किया गया था . इसी दिन उत्तर प्रदेश की मायावती सरकार ने कैबिनेट मीटिंग में इस बात पर विचार किया था कि प्रदेश के किसानों का भला कैसे हो. एजंडे में कई फैसले लिये गये. इन्हीं में एक फैसला किया गया कि &quot;आज के समय में आधारभूत संसाधन के विकास के लिए बड़ी पूंजी बहुत सख्त दरकार है .इसलिए निजी कंपनियां अपनी मंडी प्रणाली विकसित कर सकती हैं. इसके लिए वे ही कंपनियां आवेदन कर सकती हैं जो 500 करोड़ का कारोबार करती हों और 5000 करोड़ रूपये तक के निवेश की क्षमता रखती हों .&quot; यानी अपनी वितरण प्रणाली स्थापित करने के लिए अब कंपनियों को कानूनी लाइसेंस मिल गया है. श्याम बिहारी मिश्र कहते हैं &quot; प्रदेश में कुल 356 मंडी स्थल हैं और हमें एक जिले से दूसरे जिले में जाने पर फिर से लाईसेंस लेना होता है . मायावती सरकार ने इन कंपनियों को एक ही लाइसेंस पर पूरे प्रदेश में खरीद, भंडारण और बिक्री का अधिकार दे दिया है .&quot; असल में यह खुदरा कारोबार की रणनीति का हिस्सा है. जैसा कि फिक्की की रिपोर्ट का जिक्र पहले हो चुका है . रिलांयस पहले ही इस कारोबार में उतर चुकी है और भारत होटेल्स ने 3000 करोड़ के निवेश से कई राज्यों में अपनी मंडी प्रणाली विकसित करने का ऐलान कर दिया है .</font></p>
<p><font size="2">इंडिया एफडीआई वाच के निदेशक धर्मेन्द्र कुमार सवाल करते हैं &quot;अगर उत्पादन, भंडारण और विपणन एक हाथ में चला जाएगा तो उपभोक्ता बचेगा कहां? भारतीय कारोबार की विविधता का ही परिणाम है कि एक बड़ा मध्यवर्ग खड़ा हो सका है.एकाधिकारवादी नीतियों से वह सिमटकर कुनबे में तब्दील हो जाएगा.&quot; बाकी सारे देश का क्या होगा ? इसका जवाब किसी के पास नहीं है. अभी पूंजी के केन्द्रीकरण का जूनून है इसलिए कोई यह सवाल उठाना भी नहीं चाहता. नवधान्य की निदेशक वंदना शिवा कहती हैं &quot; यूरोप में पूंजी का केन्द्रीयकरण 300 सालों का परिणाम है. 300 सालों के पूंजी के केन्द्रीयकरण को हम भारत में एक साल में आजमाना चाहते हैं . इसके परिणाम बहुत घातक होंगे&quot; वंदना शिवा का यह सवाल प्रासंगिक है कि अगर उत्पादन, भंडारण, वितरण , निवेश और कमाई सबकुछ एक वर्ग के हाथ में रहेगा तो बाकी देश की जनता क्या आत्महत्या कर लेगी?&quot; शायद नहीं. विरोध की शुरूआत यहीं से होती है जिसकी झलक पहले रांची और इंदौर में दिखा अब वही विरोध उत्तर प्रदेश में हो रहा है .</font></p>
<p><font size="2">अब सरकार को तय करना है कि वह किसके साथ है. वंदना शिवा कहती हैं &quot;सरकार कारपोरेट घरानों के लिए काम करती है न कि उनके लिए जिनके वोट से वह सत्ता में आती है . विरोध तो होगा. हो सकता है जगह-जगह यह विरोध हिंसक भी हो जाए. सरकार दिल्ली में छावनी बनाकर विरोध का शमन भले कर ले पूरे देश में यह संभव नहीं . सरकार और बड़े कारपोरेट घरानों दोनों के भले में यही होगा कि वे खुदरा कारोबार को खुदरा ही रहने दें. नहीं तो परिणाम बहुत भयानक होंगे.&quot; फिलहाल तो यह चेतावनी सुनने की फुर्सत न सरकार को है और न ही कारपोरेट घरानों को .</font></p>
<p><font size="2"></font></p>
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		<title>हमारे समय के अंधेरे और प्रेमचंद की याद</title>
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		<pubDate>Thu, 23 Aug 2007 18:34:00 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[प्रेमचंद की कृतियों में भारतीय समाज के विस्तृत चित्र मिलते हैं. उनका साहित्य ऐतिहासिक दस्तावेज की तरह है. शायद ही ऐसा कोई चरित्र या सामाजिक प्रश्न हो, जिसकी उपस्थिति उनके साहित्य में न हो. एक नये उभरते हुए मध्यवर्ग और राष्ट्रीय आंदोलन पर उनकी गहरी आलोचनात्मक निगाह रही है.इसके बावजूद अगर प्रेमचंद किसान जीवन के [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p></p><p><img class="alignnone" src="http://cafehindi.com/files/premchand_382550260.jpg"/></p>
</p>
<p><span style="font-family: arial"><font size="2"><span style="font-weight: bold; font-size: 130%">प्रे</span>मचंद की कृतियों में भारतीय समाज के विस्तृत चित्र मिलते हैं. उनका साहित्य ऐतिहासिक दस्तावेज की तरह है. शायद ही ऐसा कोई चरित्र या सामाजिक प्रश्न हो, जिसकी उपस्थिति उनके साहित्य में न हो. एक नये उभरते हुए मध्यवर्ग और राष्ट्रीय आंदोलन पर उनकी गहरी आलोचनात्मक निगाह रही है.<br /></font><font size="2">इसके बावजूद अगर प्रेमचंद किसान जीवन के कथाकार माने जाते हैं, तो इसकी वजह यह है कि किसानों को वे नये भारत का निर्माण करनेवाली बुनियादी ताकत के बतौर देखते हैं. उनकी धारणा है कि किसानों की बदहाल जिंदगी में बदलाव से ही मुल्क की सूरत बदलेगी. उनका आकलन है कि अंगरेजी राज्य में गरीबों, मजदूरों और किसानों की दशा जितनी खराब है और होती जा रही है, उतना समाज के किसी अंग की नहीं. राष्ट्रीयता या स्वराज्य उनके लिए विशाल किसान जागरण का स्वप्न है, जिसके जरिये भेदभाव और शोषण से मुक्त समाज बनेगा. उन्हीं के शब्दों में- हम जिस राष्ट्रीयता का स्वप्न देख रहे हैं, उसमें तो वर्णों की गंध तक नहीं होगी. वह हमारे श्रमिकों और किसानों का साम्राज्य होगा.<br /></font><font size="2"><span style="font-weight: bold">जमाना</span> पत्रिका में 1919 में ही प्रेमचंद लिखते हैं-आनेवाला जमाना अब किसानों-मजदूरों का होगा. दुनिया की रफ्तार इसका साफ संकेत दे रही है&#8230;जल्द या देर से, शायद जल्द ही, हम जनता को मुखर ही नहीं अपने अधिकारों की मांग करनेवालों के रूप में देखेंगे और तब वह आपकी किस्मत की मालिक होगी. तब आपको अपनी बेइंसाफियां याद आयेंगी और आप हाथ मल कर रह जायेंगे. जनता की इस ठहरी हुई हालत से धोखे में न आइए. इनकलाब के पहले कौन जनता था कि रूस की पीड़ित जनता में इतनी ताकत छिपी हुई है?<br /></font><font size="2">इस उद्धरण पर गौर किया जाये तो कई संकेत मिलते हैं. एक तो यह कि प्रेमचंद के लिए जनता का मतलब आमतौर पर मजदूर-किसान हैं. दूसरा यह है कि उन्हें इस जनता की छिपी हुई क्रांतिकारी ताकत का अंदाजा है. और तीसरा यह कि उन्हें पूरा भरोसा नहीं कि किसान-मजदूरों का राज्य जल्दी आ जायेगा. इसलिए उन्होंने शायद शब्द का इस्तेमाल किया.<br /></font><font size="2">प्रेमचंद को आजादी के आंदोलन का नेतृत्व करनेवाले सामंती अभिजात्य लोगों और मध्यवर्गीय अवसरवादियों को लेकर गहरा संशय था. गबन उपन्यास के अविस्मरणीय चरित्र देवीदीन खटीक, जिसके दो बेटे स्वाधीनता आंदोलन में शहीद हुए थे, को आनेवाले राज्य के बारे में तगड़ा संशय है- अरे, तुम क्या देश का उद्धार करोगे. पहले अपना उद्धार कर लो, गरीबों को लूट कर विलायत का घर भरना तुम्हारा काम है&#8230; सच बताओ, तब तुम सुराज का नाम लेते हो, उसका कौन-सा रूप तुम्हारी आंखों के सामने आता है? तुम भी बड़ी-बड़ी तलब लोगे, तुम भी अंगरेजों की तरह बंगलों में रहोगे, पहाड़ों की हवा खाओगे, अंगरेजी ठाठ बनाये घूमोगे. इस सुराज से देश का क्या कल्याण होगा? तुम्हारी और तुम्हारे भाई-बंदों की जिंदगी भले आराम और ठाठ से गुजरे, पर देश का तो कोई भला न होगा&#8230; तुम दिन में पांच बेर खाना चाहते हो और वह भी बढ़िया माल. गरीब किसान को एक जून सूखा चबेना भी नहीं मिलता. उसी का रक्त चूस कर तो सरकार तुम्हें हुद्दे देती है. तुम्हारा ध्यान कभी उनकी ओर जाता है? अभी तुम्हारा राज नहीं है, तब तो तुम भोग-विलास पर इतना मरते हो, जब तुम्हारा राज हो जायेगा, तब तो गरीबों को पीस कर पी जाओगे.<br /></font><font size="2">इस देश में पिछले 60 साल का राज यह बतलाता है कि प्रेमचंद की आशंकाएं सही थीं. आज का शासक वर्ग और उसके हाकिम-हुक्काम प्रेमचंद के जमाने से भी अधिक सुविधापरस्त, भ्रष्ट, अन्यायी, बेईमान और फरेबी हुए हैं. हाकिमों को आज भी बड़ी-बड़ी तलबें चाहिए, उन तलबों से भी उनके पेट नहीं भरता, तो वे विकास योजनाओं की राशि और गरीबों की राहत सामग्री तक डकार जाते हैं. राजनीति में आज भी बड़े भूस्वामियों, पूंजीपतियों और अवसरवादी मध्यवर्ग का वर्चस्व है. विलायत यानी साम्राज्यवादी शक्तियों का घर भरने का काम आज पूरी बेहयाई और बर्बरता के साथ जारी है. कानून और न्याय आज भी धनिकों के लिए हैं. जो वास्तविक उत्पादक शक्तियां हैं, वे आज भी जमीन से वंचित हैं या उन्हें जमीन से बेदखल किया जा रहा है. उत्पादन के साधनों पर उनका अधिकार नहीं है. पूरे देश में हक मांगते गरीबों और मजदूर-किसानों के ऊपर गोलियां चलायी जा रही हैं. गरीब-मेहनतकशों की हत्याएं इस मुल्क की आम परिघटना बनती जा रही हैं. विडंबना यह है कि अपने किसानों को भारी सब्सिडी देनेवाले अमेरिका के इशारे पर हमारे देश का शासक वर्ग किसानों को दी जानेवाली सारी सुविधाएं खत्म करता जा रहा है. कर्ज के जाल में फंसा कर उन्हें मार रहा है जॉन सेवकों की दलाल सरकारों ने किसानों और मजदूरों को आत्महत्या और भुखमरी के दुष्चक्र में डाल दिया है.<br /></font><font size="2">प्रेमचंद जहां अपने साहित्य में किसान-मजदूरों के शोषण, दमन और गरीबी का हृदयविदारक चित्र उपस्थित करते हैं, वहीं उनकी शक्ति की पहचान भी कराते हैं. किसानों की बदहाली की वजहों को प्रेमचंद ने कई आयामों से देखा है. प्रेमाश्रम में किसान बेदखली और लगान के खिलाफ प्रतिरोध करते नजर आते हैं. कर्मभूमि में वे लगानबंदी का विरोध करते हैं और मध्यमवर्गीय नेतृत्व के अवसरवाद का आघात झेलते हैं. और गोदान में होरी के जरिये जमींदारों और महाजनों तथा वर्णव्यवस्था द्वारा मृत्यु के मुंह में धकेले जाते किसानों की त्रासद कथा कहते हैं. किसानों की आत्महत्या, किसान आंदोलनों की दशा-दिशा, ग्रामीण मेहनतकश स्त्री की दावेदारी, सांप्रदायिक ता, धार्मिक पाखंड और तथाकथित जनभागीदारीवाले हमारे लोकतंत्र के संदर्भ में ये तीनों महत्वपूर्ण उपन्यास हैं, जिन पर विस्तार से बातचीत हो सकती है, लेकिन फिलहाल रंगभूमि की चर्चा जरूरी है.<br /></font><font size="2">आलोचक वीर भारत तलवार ने एक जगह सही ही लिखा है कि प्रेमचंद साहित्य को पढ़ कर हिंदीभाषी गरीब किसान अपने वर्ग शत्रुओं को और भी अच्छी तरह पहचान सकेगा. आज सिंगूर, नंदीग्राम, दादरी, कलिंगनगर आदि जगहों में विकास के जिस तर्क और शासन तंत्र की जिस धौंस के जरिये किसानों को उनकी जमीन से बेदखल करने का जो हिसंक अभियान चलाया जा रहा है, वह बरबस प्रेमचंद के उपन्यास रंगभूमि की याद दिलाता. सिगरेट का कारखाना खोलने के लिए जॉन सेवक अपने गुमाश्ते ताहिर से पूछता है कि वह सूरदास की जमीन कितने में दिला सकता है? ताहिर कहता है उसे शक है कि वह उसे नहीं बेचेगा. तब जॉन सेवक पूरे दंभ से बोलता है, अजी बेचेगा उसका बाप. उसकी क्या हस्ती है, रुपये के 17 आने दीजिए और आसमान के तारे मंगवा लीजिए. मगर सूरदास तैयार नहीं होता, तब ताहिर मोहल्लेवालों को धमकी भरे लहजे में समझाता है, जिस वक्त साहब जमीन लेने पर आ जायेंगे, ले ही लेंगे. तुम्हारे रुके न रुकेंगे. जानते हो शहर में हाकिमों से उनका रब्त-जब्त है? &#8230; सीधे से, रजामंदी के साथ दोगे, तो अच्छे दाम पा जाओगे, शरारत करोगे, तो जमीन भी निकल जायेगी, कौड़ी भी हाथ न लगेगी. मुहल्लेवालों की एकजुटता को तोड़ने के लिए वह सबको तरह-तरह के प्रलोभन देता है, समृद्धि के सपने दिखाता है और जमीन छीन लेता है. फिर बाद में वह दूसरों से भी घर खाली कराने लगता हैं. उन्हें जो मुआवजा दिया जाता है, उससे वे कहीं छप्पर डाल कर भी नहीं कर सकते, पुलिस जॉन सेवक की मदद करती है. लोगों के घर में घुस कर सामान फेंकने लगती है. प्रेमचंद ने लिखा है- मानो दिन-दहाड़े डाका पड़ रहा हो. सूरदास अपनी झोंपड़ी छोड़ने को तैयार नहीं होता, जनता जुट जाती है. उसके बाद पुलिस गोलियां चलाती है.<br />इस प्रसंग में रामविलास शर्मा ने बड़ी मार्मिक टिप्पणी की है कि इस तरह अंगरेजी राज में किसानों की जमीन उन्हीं के खून से तर करके अपने वफादार दोस्त जॉन सेवक को भेंट करता है. क्या आज के बदले संदर्भों में आज के राज पर भी एक तीखा कमेंट नहीं है?<br /></font><font size="2">सूरदास मरते वक्त भी हार स्वीकार नहीं करता- हम हारे तो क्या, मैदान से भागे तो नहीं, रोये तो नहीं, धांधली तो नहीं की. फिर खेलेंगे, जरा दम ले लेने दो, हार-हार कर तुम्हीं से खेलना सीखेंगे और एक-न-एक दिन हमारी जीत होगी, अवश्य होगी.<br /></font><font size="2">बेशक सूरदास के वंशजों ने अब भी हार नहीं मानी है. वह अपने संगी-साथियों से कहता है- हमारा दम उखड़ जाता है, हांफने लगते हैं, खिलाड़ियों को मिला कर नहीं खेलते, आपस में झगड़ते हैं, गाली-गलौज, मारपीट करते हैं. कोई किसी को नहीं मानता. अगर अपने उजड़े हुए घर बसाने हैं, तो अपना एका मजबूत करो.<br /></font><font size="2">प्रेमचंद जहां अपने साहित्य में किसान-मजदूरों के शोषण, दमन और गरीबी का हृदयविदारक चित्र उपस्थित करते हैं, वहीं उनकी शक्ति की पहचान भी कराते हैं. पूर्वजन्म के चमत्कार से भरे कायाकल्प में भी दलित बेगार करने से इनकार करते हैं. किसान अहिंसावादी नेता चक्रधर की धौंस बरदास्त नहीं करते. चक्रधर की ठोकरों से एक किसान की मृत्यु हो जाती है, तो दूसरा बूढ़ा किसान उसे माफी नहीं देता, उसका निर्णायक स्वर है- तुम बाबू जी को दयावान कहते हो, मैं उन्हें सौ हत्यारों का एक हत्यारा कहता हूं. राजा हैं, इससे बच जाते हैं, दूसरा होता तो फांसी पर लटकाया जाता. मैं तो बू़ढा हो गया हूं, लेकिन उन पर इतना क्रोध आ रहा है कि मिल जायें तो खून चूस लूं.<br />प्रेमचंद का साहित्य आज की परिस्थितियों में यह संदेश दे रहा है कि नव उपनिवेशवाद और उसके देशी आधारों के जनविरोधी शासन को मजदूरों और किसानों के आंतरिक गुणों का विकास करके ही ध्वस्त किया जा सकता है और नये समाज और राष्ट्र निर्माण के अधूरे सपने को साकार किया जा सकता है. प्रेमचंद जहां साहित्य में भारतीय किसान के नजरिये को ले आये, वहीं अपनी कृतियों के जरिये किसानों की चेतना को विकसित करने का भी काम किया. यह हमेशा याद रखना चाहिए कि साहित्य में विषय के तौर पर किसान-मजदूर प्रेमचंद के लिए सचेतन चुनाव थे. प्रेमचंद इनके प्रति कितने सचेत थे, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जब बहुतों को चीन के हुनान किसान आंदोलन की रिपोर्ट का पता नहीं था, तब उन्होंने उस पर टिप्पणी लिखी थी- हमारे पड़ोस के मुल्क में वहां के नेताओं द्वारा किसानों की शक्ति की पहचान ली गयी है, लेकिन हमारे अपने देश में नेताओं ने किसान की शक्ति को नहीं पहचाना है. इसलिए उन्होंने यह भी कहा कि मैं उस आनेवाली पार्टी का मेंबर हूं, जो अवाम-अलनास (जनसाधरणत:) की सियासी तालीम को अपना दस्तूरुल-अमल (विधान) बनायेगी.<br /></font></span>
<div style="text-align: right"><font size="2"><span style="color: #666666; font-family: arial"><span style="font-weight: bold; font-size: 85%">पेंटिंग : हेम ज्योतिका</span></span><br /><span style="font-family: arial"></span></font></div>
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<div class="post-footer">
<p class="post-footer-line post-footer-line-1"><span class="post-author"><font size="2">साभार: <a href="http://hashiya.blogspot.com/">http://hashiya.blogspot.com/</a></font></span></p>
</div>
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		<title>सिवाय चुनाव पर्व के, क्या है जो लोकतंत्र के होने का अहसास कराये?</title>
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		<pubDate>Thu, 23 Aug 2007 18:27:00 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[मैनेजर पांडेय हिंदी आलोचना के क्षेत्र में जाना-माना नाम है. इसी के साथ वे अपने सजग राजनीतिक नज़रिये के लिए भी जाने जाते हैं. प्रभात खबर के साथी निराला ने उनसे अनेक विषयों पर बात्चीत की जो अखबार में छपी भी है.हम इस बातचीत को ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर रहे हैं. वैश्वीकरण के बारे [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p></p><p><img class="alignnone" src="http://cafehindi.com/files/loktantra_139945527.jpg"/></p>
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<div class="post-body">
<p><font size="2"><span style="font-style: italic; font-family: arial"><span style="font-weight: bold">मैनेजर पांडेय </span>हिंदी आलोचना के क्षेत्र में जाना-माना नाम है. इसी के साथ वे अपने सजग राजनीतिक नज़रिये के लिए भी जाने जाते हैं. <span style="font-weight: bold">प्रभात खबर </span>के साथी <span style="font-weight: bold">निराला </span>ने उनसे अनेक विषयों पर बात्चीत की जो अखबार में छपी भी है.हम इस बातचीत को ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर रहे हैं. </span></p>
<p><span style="font-family: arial"><span style="color: #cc0000"><strong>वैश्वीकरण के बारे में आपकी क्या राय है और इसके प्रभावों का आकलन किस तरह करते हैं?</strong></span></span><br /><span style="font-family: arial">वैश्वीकरण देखने में एक बहुत ही मोहक व आकर्षक शब्द है. लेकिन वास्तविकता काफी खतरनाक व चिंताजनक है. सारी दुनिया का अमेरिकीकरण हो रहा है. 10 वर्ष पूर्व अमेरिका ने न्यू वर्ल्ड ऑर्डर यानी कि नयी विश्व व्यवस्था की बात कही थी, जो अब सच में बदलता दिख रहा है. पूर्वी यूरोप व रूस में समाजवाद के खात्मे के बाद अमेरिका पूंजीवाद के बल पर पूरी दुनिया में तो अपना प्रभाव जमाना ही चाहता है, उसकी विशेष नजर तीसरी दुनिया यानी कि एशिया, अफ्रिका और लैटिन अमेरिका के देशों पर है. तीसरी दुनिया के देशों में कच्चे माल का भंडार है, यहीं तैयार माल का सबसे आकर्षक बाजार भी है. सो, वैश्वीकरण की चोट सबसे ज्यादा तीसरी दुनिया के देशों पर ही पड़ेगी.</span><br /><span style="color: #cc0000; font-family: arial">&nbsp;</span></font></p>
<p><font size="2"><span style="color: #cc0000; font-family: arial"><strong>तो क्या वैश्वीकरण को एक सिरे से खारिज कर देने से सब ठीक हो जायेगा?</strong></span><br /><span style="font-family: arial">नहीं, मेरा आशय अमेरिकी पूंजीवाद के विरोध से है. देश में यदि स्वतंत्र पूंजीवाद का विकास हो तो स्थिति बेहतर होने की संभावना है. वैसे भी अब समाजवाद व साम्यवाद इतने वैचारिक संकट से गुजर रहे हैं कि उसके आने की संभावना निकट भविष्य में नहीं, सो स्वतंत्र पूंजीवाद तो कम से कम राहत की सांस देगा. अब भारत खाड़ी देशों से गैस पाइप लाइन बिछाने का समझौता करेगा या नहीं, इसमें अमेरिका की सहमति ली जाती है, ऐसी अमेरिकापरस्ती पर शर्म आनी चाहिए.</span></font></p>
<p><font size="2"><span style="font-family: arial"></span><span style="font-family: arial"><strong><span style="color: #ff0000">लेकिन यह तो</span><span style="color: #cc0000"> हो रहा है, खुल कर हो रहा है. विदेशी कंपनियां आ रही हैं, सेज बन रहे हैं. केंद्र सरकार तो इसके समर्थन में है.</span></strong></span><br /><span style="font-family: arial"><span style="font-weight: bold">&nbsp;</span>सबको याद होगा कि जो देश के वर्तमान प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह हैं, वित्त मंत्री रहते इन्होंने ही भूमंडलीकरण, उदारीकरण की शुरुआत की थी. अब वे प्रधानमंत्री बन गये हैं तो उस सपने को और तेजी से साकार कर रहे हैं. रही बात विशेष आर्थिक क्षेत्र यानी सेज और मल्टीनेशनल कंपनियों की, तो इसका विरोध किसी दल का राजनेता नहीं करेंगे. करना होता तो अब तक किये होते. क्या अब तक राष्ट्रीय स्तर पर कोई ऐसा आंदोलन सम्मिलित रूप से हो सका है? सरकार व नेता तो हर चीज को गिरवी रख देना चाहते हैं. सरकार की नीति तो ऐसी है कि हर नदी, पहाड़, जंगल जैसी सार्वजनिक विरासत को कंपनियों की विरासत बनायी जा रही है, इससे किसका भला होगा. इसके विरोध में नर्मदा बचाओ जैसा आंदोलन चलाना होगा, जिसने तीन राज्यों व केंद्र सरकार व न्यायालय तक को सकते में डाला.</span></font></p>
<p><font size="2"><span style="font-family: arial"></span><span style="color: #cc0000; font-family: arial"><strong>आप जिसे अमेरिकापरस्ती कह रहे हैं, उससे छुटकारा की कोई संभावना दिखती है क्या?</strong></span><br /><span style="font-family: arial">जो तीसरी दुनिया के देश हैं, वहां के राजनैतिक दल व राजनेताओं को नैतिक साहस दिखाना होगा. ऐसा हो भी रहा है लेकिन टुकड़े-टुकड़े में. लैटिन अमेरिकी देश वेनेजुएला के राष्ट्रपति चावेज ने अमेरिका का खुल कर विरोध किया है और नीतियों को मानने से इनकार कर दिया है. लेकिन यह तो सबको पता है न कि जो अमेरिका का विरोध करता है, उसके साथ क्या व्यवहार किया जाता है. अभी हाल ही में सीआइए की रिपोर्ट में तो यह बात खुल कर सामने आ ही गयी न कि क्यूबा के फिदेल कास्त्रो की हत्या के लिए कितना परेशान था अमेरिका. कास्त्रो ही नहीं, चावेज की भी हत्या करवाना चाहता है अमेरिका.</span><br /><span style="font-family: arial">अमेरिका में एक कट्टर इसाई समुदाय है यूवांजलिस्ट. बताया जाता है कि बुश को राष्ट्रपति बनवाने में इस समुदाय की भूमिका अहम रही थी. इसी समुदाय के सबसे बड़े धार्मिक गुरु ने अभी हाल ही में सार्वजनिक तौर पर कहा है कि चावेज की हत्या कर देनी चाहिए. आखिर क्यों एक धार्मिक गुरु ऐसी बातें कहेगा और क्यों नहीं कहीं से विरोध के स्वर उठे? अमेरिकी दादागिरी यही है.</span></font></p>
<p><font size="2"><span style="font-family: arial"></span><span style="color: #cc0000; font-family: arial"><strong>और आजाद भारत के 60 साल होनेवाले हैं. इन 60 वर्षों की यात्रा को कैसे देखते हैं आप? आप जिस तरह मल्टीनेशनल कंपनियों के</strong> आने व वैश्वीकरण से खतरे को बयान कर रहे हैं, उससे क्या देश में ईस्ट इंडिया कंपनियों का कॉकस बन रहा है?</span><br /><span style="font-family: arial">पहली बात तो यह स्वयं महसूस करने की है कि इस देश में सिवाय चुनाव पर्व के, कुछ भी ऐसा होता है क्या जो लोकतंत्र के होने का अहसास कराये? शुक्र है कि अब भी नेताओं को चुनाव द्वारा संसद व सदन तक भेजा जाता है, जिससे भारत के लोकतांत्रिक देश होने का अहसास हो जाता है. 60 वर्षों में हमने क्या खोया, क्या पाया, यह अपने आप में एक अलग व विस्तृत विषय है लेकिन जिस तरह यहां मल्टीनेशनल कंपनियों का जाल गांव-जवार तक फैल रहा है, लोगों को उजाड़ रहा है और उन्हें सरकारी शह मिल रही है, उससे एक नहीं दर्जनों इस्ट इंडिया कंपनियां एक साथ अपने तरीके से काम करेंगी. वह समय जल्द ही आ रहा है.</span></font></p>
<p><font size="2"><span style="font-family: arial"></span><span style="color: #cc0000; font-family: arial"><strong>दक्षिणपंथियों के बारे में तो शुरू से कहा जाता रहा है कि वे व्यावसायिक घरानों के पोषक रहे हैं लेकिन वामपंथी पार्टियों को क्या हो गया है? पश्चिम बंगाल से लेकर चीन तक तो वैश्वीकरण की ही बयार है.</strong></span><br /><span style="font-family: arial">नहीं, वामपंथियों को आप दो भाग में बांट कर देखिए. एक वे हैं जो सरकार के साथ हैं और सत्ता-शासन से उनका मोह रहा है और दूसरे वे जो सरकार व सत्ता से बाहर रहते हैं. सत्तावाले वामपंथी हमेशा बाहर वाले वामपंथियों को तरह-तरह से परेशान करते हैं. पश्चिम बंगाल की सरकार की बात क्या करें. वहां वही हो रहा है जो चीन में हो रहा है. ये शुरू से चीन को अपना आदर्श मानते भी रहे हैं. अब तो दुनिया में कई वामपंथी विचारक कह रहे हैं कि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना का नाम कनफ्युशियस पार्टी ऑफ चाइना कर देना चाहिए, देखने में लघु नाम सीपीसी बरकरार भी रह जायेगा.</span></font></p>
<p><font size="2"><span style="font-family: arial"></span><strong><span style="color: #ff0000; font-family: arial">इसका मतलब यह कि वाम बनाम वाम की जंग जारी है.</span><br /></strong><span style="font-family: arial">मैंने पहले ही कहा कि दुनिया भर में वामपंथ, साम्यवाद, समाजवाद वैचारिक संकट के दौर से गुजर रहे हैं. पूंजीवाद की पुन:स्थापना ही कुछ वामपंथी दलों का मकसद हो गया है.</span></font></p>
<p><font size="2"><span style="color: #cc0000; font-family: arial"><strong>भारत में कई अलग-अलग तरह के भारत बन रहे हैं. दक्षिण व पश्चिम के राज्य दिन ब दिन विकास की सीढ़ियां चढ़ रहे हैं और हिंदी पट्टी के राज्य विवशता के आंसू बहा रहे हैं. इससे कितना इत्तफाक रखते हैं आप?</strong></span><br /><span style="font-family: arial">हिंदी पट्टी की यह समस्या तो प्राचीन काल से ही रही है. जड़ता और आडंबर में हिंदी पट्टी इस कदर फंसा रहा कि उसे कुछ करने का ध्यान ही नहीं रहा. अब तो स्थिति ऐसी हो रही है कि हिंदी पट्टी के मजदूरों को कहीं काम भी नहीं मिल रहा. सभी जगह मारे जा रहे हैं, भगाये जा रहे हैं फिर भी हिंदी पट्टी के नेताओं को शर्म नहीं आती. यह शर्म से डूब मरने की बात है कि हिंदी पट्टी के नेता व शासन के लोग अपने प्रदेश में तो रोजगार सृजित नहीं ही कर पाते, दूसरे जगह उनके लोग मारे-काटे व भगाये जा रहे हैं.</span></font></p>
<p><font size="2"><span style="font-family: arial"></span><span style="color: #cc0000; font-family: arial"><strong>बिहार में तो सरकार बदली है, वहां कैसी उम्मीद&#8230;?</strong></span><br /><span style="font-family: arial">हिंदी पट्टी के किसी राज्य की बात करें, पहली समस्या तो यही है कि अपने लोगों को रोजगार-स्वरोजगार का उचित मंच मुहैया कराये. इसे पूरा किये बगैर विकास का कोई मॉडल मायने नहीं रखता</span></font></p>
<p><font size="2"><span style="font-family: arial"></span></font><font size="2"><span style="color: #cc0000; font-family: arial"><strong>अब बात साहित्य की करते हैं. नये रचनाकारों को प्रकाशन के संकट से मुक्ति कब मिलेगी?</strong></span><br /><span style="font-family: arial">प्रकाशन का संकट तो कृत्रिम है. आप हाल के दिनों में देखिए, प्रकाशक दिन ब दिन कुबेर होते जा रहे हैं और लेखकों की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आ रहा. लेखकों को रॉयल्टी नहीं मिलती और कुछेक तो लेखकों की ऐसी जमात भी मिलती है जो खुद से पैसा देकर अपनी रचनाओं को छपवाते हैं. यह संकट रहेगा, क्योंकि अब सारे के सारे प्रकाशक दिल्ली में बैठ मठाधीशी कर रहे हैं जो ठीक संकेत नहीं.</span></font></p>
<p><font size="2"><span style="font-family: arial"></span><span style="color: #cc0000; font-family: arial"><strong>और आखिर में नामवर सिंह द्वारा हाल ही में पंत के समग्र साहित्य संसार को कचरा करार दिया जाना कहां तक ठीक लगता है?</strong></span><br /><span style="font-family: arial">मैं नामवर सिंह के बारे में कुछ नहीं कहना चाहता. वे आजकल चौंकानेवाले अंदाज में बोलते हैं. रही बात पंत की तो हिंदी साहित्य में संवेदनात्मक लेखन को आधार उन्होंने ही दिया था. और फिर कौन कवि ऐसा हुआ है, जिसकी सारी रचनाएं ठीक हों. सबका कुछ न कुछ कचरा होता ही है लेकिन कसौटी पर तो हमेशा ही अच्छी रचनाओं से कसा जाता है.</span></font></p>
<div style="clear: both"><font size="2"></font></div>
</div>
<div class="post-footer">
<p class="post-footer-line post-footer-line-1"><span class="post-author"><font size="2">प्रस्तुति : Reyaz-ul-haque <br />साभार: <a href="http://hashiya.blogspot.com/">http://hashiya.blogspot.com/</a></font></span></p>
</div>
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		<title>आज़ादी, मगर कैसी और किसके लिए?</title>
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		<pubDate>Thu, 23 Aug 2007 18:17:24 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[प्रेमचंद के उपन्यास गबन (1931) में देवीदीन ने यह पूछा था, `साहब, सच बताओ, जब तुम सुराज का नाम लेते हो, उसका कौन-सा रूप तुम्हारी आंखों के सामने आता है? तुम भी बड़ी-बड़ी तलब लोगे, तुम भी अंगरेजों की तरह बंगलों में रहोगे, पहाड़ों की हवा खाओगे, अंगरेजी ठाट बनाये घूमोगे, इस सुराज से देश [...]]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p></p><p><img class="alignnone" src="http://cafehindi.com/files/tiranga_636091919.jpg"/></p>
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<p><font size="2"><span style="font-family: arial"><span style="font-size: 130%"><span style="font-weight: bold">प्रे</span></span>मचंद के उपन्यास गबन (1931) में देवीदीन ने यह पूछा था, `साहब, सच बताओ, जब तुम सुराज का नाम लेते हो, उसका कौन-सा रूप तुम्हारी आंखों के सामने आता है? तुम भी बड़ी-बड़ी तलब लोगे, तुम भी अंगरेजों की तरह बंगलों में रहोगे, पहाड़ों की हवा खाओगे, अंगरेजी ठाट बनाये घूमोगे, इस सुराज से देश का क्या कल्याण होगा? तुम्हारी और तुम्हारे भाई-बंदों की जिंदगी भले आराम और ठाठ से गुजरे, पर देश का तो कोई भला न होगा&#8230; तुम दिन में पांच बेर खाना चाहते हो, और वह भी बढ़िया, पर गरीब किसान को एक जून सूखा चबेना भी नहीं मिलता. उसी का रक्त चूस कर तो सरकार तुम्हें हुद्दे देती है. तुम्हारा ध्यान कभी उनकी ओर जाता है? अभी तुम्हारा राज नहीं है, तब तो तुम भोग -विलास पर इतना मरते हो, जब तुम्हारा राज हो जायेगा, तब तो तुम गरीबों को पीस कर पी जाओगे.&#39;</span><br /></font><span style="font-family: arial"><br />
<blockquote><font size="2"></font></p></blockquote>
<p><font size="2">आजादी की 60वीं वर्षगांठ पर हमें यह जानना और विचार करना चाहिए कि भारत में गरीबों की संख्या कितनी है? ग्रामीण भारत की क्या दशा है? किसानों और मजदूरों का क्या हाल है? देश में आर्थिक विषमता बढ़ी है या घटी है? किसान आत्महत्या क्यों कर रहा है? राज्य अपनी कल्याणकारी भूमिका से क्यों हटा है? नयी आर्थिक नीति (1991) का या भूमंडलीकरण और उदारीकरण का वास्तविक लाभ किसे प्राप्त हुआ है? राजनीति का कार्य क्या है? सामान्य जन और उसके जन प्रतिनिधि में कितना अंतर है? शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधा सबको क्यों नहीं है? देश के 32000 स्कूलों में एक भी छात्र क्यों नहीं हैं? क्या भारतीय मध्य वर्ग समूचे भारत का पर्याय है? मीडिया कितनी सच्ची खबरें पाठकों को देता है? क्या भारत हत्या और आत्महत्या के बीच जी रहा है? भारत की आजादी से किसे लाभ प्राप्त हुआ है? क्या हमारे देश में सबको न्याय प्राप्त है? अपराधी और गुंडे जेल में क्यों नहीं हैं? भ्रष्टाचार मिटना चाहिए या नहीं और यह कैसे मिटेगा? भारतीय प्रतिभा का पलायन क्यों हो रहा है? रातोंरात अमीर कैसे बना जाता है? उत्पादक बड़ा है या उपभोक्ता? स्वतंत्र भारत में भारतीय जनता को किसने विभाजित किया? राजनीति में वंशवाद रहना चाहिए या मिटना चाहिए? चापलूसों और खुशामदियों से घिर कर क्या उचित कार्य किया जा सकता है? प्रश्न एक नहीं, हजारों हैं. यह कौन करेगा? इसका उत्तर कौन देगा?</font></span><br /><span style="font-family: arial"><br />
<blockquote><font size="2"></font></p></blockquote>
<p><font size="2">नागार्जुन ने आजादी के मात्र चार वर्ष बाद 1951 में एक कविता लिखी थी-स्वदेशी शासक. आजाद भारत के शासकों का रंग-ढंग उन्होंने समझ लिया था. स्वतंत्र भारत का शासक सामान्य जन को `शांति और संयत जीवन की&#39; नसीहत देता रहा है और अपने लिए `अपरिमित धन की जुगाड़&#39; में तत्पर रहा है. नागार्जुन ने इस कविता में बहुत तीखी बातें लिखी थीं, `हमें, हमारे घरवालों को, पड़ोसियों को दो छुटकारा/ शीघ्र मुक्ति दो इस रौरव से/ जहां न भरता पेट, देश वह कैसा भी हो, महानरक है.&#39; भारत एक साथ स्वर्ग और नरक दोनों है. कुछ लोगों को स्वर्ग का सुख है और सामान्य जन को नरक का दुख. स्वाधीनता की लड़ाई मिलजुल कर लड़ी गयी थी. उस समय के मूल्य और आदर्श मिट गये हैं, क्योंकि आज भारत में अंगरेज नहीं हैं. फिर भारत में इतना हाहाकार क्यों है? लूट और भ्रष्टाचार क्यों है? अपराध और व्यभिचार क्यों है? अपहरण और बलात्कार क्यों है? अशिक्षा और बीमारी क्यों है? बाढ़ और सूखा क्यों है? छीनाझपटी और लूटमार क्यों है? वादा-खिलाफी क्यों है? 60 के दशक में नागार्जुन ने एक कविता लिखी थी, `26 जनवरी 15 अगस्त.&#39; इससे पहले `स्वदेशी शासक&#39; कविता में भारतीयों की साधना को व्यर्थ घोषित किया- `व्यर्थ हुई साधना, त्याग कुछ काम न आया/ कुछ ही लोगों ने स्वतंत्रता का फल पाया.&#39; स्वतंत्रता का फल सबको प्राप्त क्यों नहीं हुआ? हमने जो विकास-नीतियां तय कीं और पंचवर्षीय योजनाएं लागू कीं, क्या उससे सबको फायदा हुआ? हमारी नीयत में खोट थी या हमारी कार्य पद्धति गलत थी?</font></span><br /><span style="font-family: arial"><br />
<blockquote><font size="2"></font></p></blockquote>
<p><font size="2">गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है. आजादी की 50वीं वर्षगांठ 1997 में धूमधाम से मनायी गयी थी. गणतंत्र दिवस की अर्धशती भी मनायी जा चुकी है. हम किसी भी अवसर को हाथ से जाने नहीं देना चाहते. आयोजन उत्सवधर्मी बन जाते हैं या फिर सब कुछ औपचारिक और कर्मकांड बन कर रह जाता है. मगर भारत में सभी सुखी और मस्त नहीं हैं. नागार्जुन ने 26 जनवरी 15 अगस्त कविता में प्रश्न करने के साथ स्वयं उत्तर भी दिया था. `किसकी है जनवरी, किसका अगस्त है?/ कौन यहां सुखी है, कौन यहां मस्त है?&#39; उन्होंने सेठ, शोषक, नामी गला-काटू, थूक-चाटू, चोर, डाकू, झूठा, मक्कार, कातिल, छलिया, लुच्च-लबार को `सुखी&#39; और `मस्त&#39; कहा है. नागार्जुन नेता को इसी श्रेणी में रखते हैं. नेता अच्छे भी होंगे पर उन्हें ढ़ूंढ़ना कठिन है. भारत में एक ओर सुखी और मस्त लोग हैं और दूसरी ओर दुखी और त्रस्त लोग हैं. ऐसा अंतर क्यों है?</font></span><br /><span style="font-family: arial"><br />
<blockquote><font size="2"></font></p></blockquote>
<p><font size="2">भारत आज सुविधा संपन्न और सुविधाविहीन लोगों में विभाजित है. यह विभाजन अनुचित ही नहीं, घातक भी है. आतंकवाद से खतरों की बात अक्सर की जाती है, पर इस अनुचित और अमानवीय विभाजन की ओर कम ध्यान दिया जाता है. आधुनिक भारत की जो रूपरेखा बनी थी, वह नष्ट हो चुकी है. समकालीन भारत की एक नयी रूपरेखा बना दी गयी है. हमने ब्रिटिश साम्राज्यवाद से लड़ाई लड़ी थी. आज अमेरिकी साम्राज्यवाद का चुंबन-आंलिंगन कर मस्त हुआ जा रहा है. भारत की जनता की उपेक्षा कर भारत का भविष्य बेहतर नहीं हो सकता. जाति और धर्म की राजनीति से किस प्रकार के भारत का चित्र प्रस्तुत करेंगे?</font></span><br /><span style="font-family: arial"><br />
<blockquote><font size="2"></font></p></blockquote>
<p><font size="2">आजादी के 60वें वर्ष के आयोजन-समारोह में हमें यह भी स्मरण करना चाहिए कि यह वर्ष प्लासी की लड़ाई की ढाई 100वीं वर्षगांठ, 1857 की 150वीं वर्षगांठ और भगत सिंह की जन्मशती का भी है. प्लासी की लड़ाई (1757) सिराजुद्दौला की सेना में 57 हजार सैनिक थे और रॉबर्ट क्लाइब के सैनिकों की संख्या मात्र साढ़े तीन हजार थी और इनमें से भी अंगरेज सैनिकों की संख्या मात्र 950 थी. रॉबर्ट क्लाइव की सेना में 2600 सैनिक भारतीय थे. सिराजुद्दौला की सेना का प्रधान सेनापति मीर जाफर था. वह 45 हजार सेना के साथ अंगरेजों से जा मिला, सिराजुद्दौला बिना लड़े पराजित हो गया. प्लासी की लड़ाई के बाद भारत अंगरेजों के अधीन हो गया. जिम्मेदार भारतीय थे. जॉन विलियम केई ने सिपॉय वार इन इंडिया में लिखा है &#8211; `हिंदुस्तान में हमारी सत्ता की पुनर्स्थापना का सेहरा हमारे हिंदुस्तानी समर्थकों के सर है, जिनकी हिम्मत और बहादुरी ने हिंदुस्तान को हमवतनों से छीन कर हमारे हवाले कर दिया.&#39; (शम्सुल इस्लाम द्वारा उद्धृत, प्लासी का साजिशी सबक, जनसत्ता, 15 जुलाई 2007)</font></span><br /><span style="font-family: arial"><br />
<blockquote><font size="2"></font></p></blockquote>
<p><font size="2">भारत को आजादी बिना `खड़ग&#39; और `ढाल&#39; के प्राप्त नहीं हुई है. हजारों लोगों को फांसी दी गयी, लाखों लोग मारे गये, हजारों लोगों को उम्रकैद की सजा मिली. सैकड़ों गांव उजड़ गये. इसे भूलना सबसे बड़ा अपराध है. यह आजादी झूठी तो नहीं, पर अधूरी थी. इसे पूरा करने का दायित्व राजनेताओं और भारतीयों पर था, जो नहीं हुआ. हम आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से स्वाधीन नहीं हुए. मानसिक गुलामी बढ़ती गयी. गांवों का हमने विकास नहीं किया. भारतीय महानगर भारत के द्वीप हैं. इन महानगरों से भारत का वास्तविक चित्र उपस्थित नहीं होता. अधिसंख्य जनता गरीब और फटेहाल है. अशिक्षित और परेशान हैं. यह बहुत बड़ी आबादी है, लगभग 70 प्रतिशत. इसे भूलना और हाशिये पर डालना अनुचित ही नहीं, जुर्म भी है. आजादी का जश्न पूरे होशो-हवास में मनाने पर हम आजाद हिंदुस्तान को बेहतर बनाने की दिशा में पहल कर सकते हैं. यह पहल जरूरी है. स्वतंत्रता का फल सबको प्राप्त होना चाहिए. हमारी सभी नीतियां धनवानों और पूंजीपतियों के लिए नहीं बननी चाहिए. विश्व बैंक, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और अमेरिकी साम्राज्यवाद के लुभावने-आकर्षक मायाजाल में फंस कर हम वास्तविक विकास नहीं कर सकते. स्वतंत्रता के 60वें वर्ष में आत्ममंथन की आवश्यकता है. भविष्य के गर्भ में क्या है, कोई नहीं जनता. मगर हम अनुमान कर सकते हैं.</font></span><font size="2"> </font>
<p>&nbsp;</p>
<div style="clear: both"><font size="2"></font></div>
<div class="post-footer">
<p class="post-footer-line post-footer-line-1"><span class="post-author"><font size="2">प्रस्तुति : Reyaz-ul-haque <br />साभार: <a href="http://hashiya.blogspot.com/">http://hashiya.blogspot.com/</a></font></span></p>
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