आस्था का कुम्भ
जब हम सन २००२ में नासिक रहने के लिये आये तब ये शहर २००३ में होने वाले ‘महा कुंभ’ की तैयारियों मे जुटा था. नई सडकें बन रही थीं और सार्वजनिक स्थानों पर साफ-सफाई और सुधार का काम चल रहा था. नासिक में ‘पंचवटी’ नामक एक जगह है जहाँ गोदावरी के घाट पर कई पुरातन मन्दिर हैं. मई के महीने में जब मैं वहाँ गई तो मुझे वो स्थान देखकर बेहद निराशा हुई. बहुत गन्दगी थी घाट पर. अत्यधिक संख्या मे भिखारी थे. नदी मे पानी काफी कम था और कुछ मुख्य मन्दिरों को छोडकर बाकी मन्दिर निराशाजनक स्थिति मे थे.हालांकि पर्यटक उन दिनों भी आते हैं यहाँ पर. |
वहीं एक मन्दिर मे हमे एक वृद्ध मिले, उनसे हमने एक मन्दिर के बारे मे पूछा तो फिर ये जानने के बाद कि हम इस शहर में नए-नए आए हैं, उन्होंने हमें तमाम जानकारियाँ और कई कथाएँ सुनाईं. उनकी सारी बातें हम ध्यान से सुनते रहे क्योंकि उनके पहले वाक्य से ही हमारा मन प्रसन्न हो गया था! उन्होने कहा था कि हमने बहुत पुण्य किये हैं तभी हमें भगवान ने तब नासिक आने का अवसर दिया है, जब यहाँ कुंभ होने वाला है! और उस वर्ष कुछ विशेष तिथियों पर अतिविशिष्ट संयोग (ग्रहों आदि के)बने थे जो कई सौ सालों में बनते हैं.नासिक में कुंभ मेला तब होता है जब ‘गुरु’ सिंह राशि मे प्रवेश करता है. और ऐसा हर बारह वर्ष के बाद हिन्दू केलेन्डर के हिसाब से ‘श्रावण’ माह मे होता है. उस वर्ष संयोग से उस दिन ३० ता. थी तो "न्यूमरोलाजी" के हिसाब से भी अंक ‘३’ गुरु ग्रह का अंक है और ‘०’याने अनन्त, तो गुरु की शक्ति अनन्त थी!
‘पंचवटी’ स्थान का यह नाम यहाँ स्थित ५ वट (बरगद) वृक्षों की वजह से है, जो आज भी विद्यमान हैं!स्थानीय लोग गोदावरी को गंगा ही कहते हैं और घाट को ‘गंगाघाट’ ही कहते हैं. कहा जाता है कि यही वह स्थान है जहाँ राजा भगीरथ की तपस्या के बाद गंगा धरती पर आई और राजा के पूर्वज पुनर्जीवित हुए.(** नासिक से २८ कि.मी. दूर त्रयम्बकेश्वर मे एक पर्वत ब्रम्हगिरि है जहाँ एक जगह पर कुछ निशान दिखाई देते हैं जिन्हे शंकर भगवान की जटा कहा जाता है, जिसमें उन्होंने स्वर्ग से उतरी गंगा को धारण किया था.एक कथा के अनुसार गंगा को अपने अतिवेग का घमन्ड हो गया था और उसे यह श्राप दिया गया कि उसका उद्गम एक जगह से नहीं होगा. अत: उसी पर्वत पर दो-तीन छोटे-छोटे मन्दिर हैं जहाँ से गोदावरी(गंगा) का उद्गम बताया जाता है.**)
पंचवटी के घाट पर ‘रामकुन्ड’, ‘लक्ष्मण कुन्ड’, आदि है जहाँ स्नान का विशेष महत्व है. यहीं एक छोटा सा मन्दिर है जो बारह वर्ष मे एक बार कुंभ मेले के समय ही खुलता है.कथा के अनुसार बारह वर्ष में एक बार गंगा नदी अपनी बहन गोदावारी से मिलने यहाँ आती है.ये मन्दिर एक वर्ष तक खुला रहता है.नासिक के कुंभ का महत्व भी एक पूरे वर्ष तक रह्ता है. हालाँकि किन्ही विशेष दिनों मे स्नान का महत्व कुछ बढ जाता है.
ये जानकारी मैने पढ़ या सुन कर अपनी याददाश्त के अनुसार बताईं. अब कुछ अन्य बातें.
जब कुंभ मेला शुरु होने ही वाला था उससे पहले हमारे घर में ‘कोड आफ कन्डक्ट’ बन गये, मसलन हमें कहा गया कि जो घर मे पानी आता है वो गोदावरी का ही है,तो घाट पर जाकर डुबकी लगाने की कतई जरूरत नहीं है, और हम कोई शाही लोग नहीं हैं तो किसी शाही स्नान में शरीक होने की जरूरत नहीं है! अपने रिश्तेदारों को फोन पर ही स्पष्ट कह दें की वो किसी खास दिन डुबकी लगाने की जिद लेकर ना आयें, बाकी साल भर में कभी भी आ सकते हैं! और इसी तरह कई और बातें.
कुंभ शुरु होने के कुछ दिनों पहले कुछ मेहमानों के साथ मै पंचवटी गई. देखा सब कुछ पहले से बहुत बदला था. काफी बारिश हो चुकी थी नदी में बहुत पानी थी और सब कुछ इतना साफ-सुथरा की मुझे लगा मै नई जगह देख रही हूँ! मेहमानो की इच्छानुसार हम कपडे लेकर गये ही थे. इतनी बेहतर व्यवस्था देखकर हमने भी डुबकी लगा ही ली! और जब हम पुण्य कमा ही चुके थे तो अपने आप घर के पुरुष वर्ग को भी पुण्य दिलाने के लिये बोतल में पानी भरकर ले आये!! फिर तो हर विशेष महत्व की तिथियों के दिन गोदावरी बोतल से निकल कर बाल्टी में होती और घर में ही शाही स्नान होते!! वहाँ उस दिन तट पर मैंने देखा कि दक्षिण से आई एक महिला कुछ बोल कर कई सारी डुबकियाँ लगाती जा रही हैं! मेरी आँखों के आश्चर्य मिश्रित प्रश्न को भाँपते हुए उन्होंने कहा कि ये सब डुबकियाँ वे अपनी मित्रों और रिश्तेदारों के लिये लगा रही है, जो यहाँ नही आ पाये हैं. कमाल की अस्थाओं का है हमारा देश!
ऐसी ही एक आस्था लिये गुजरात से एक दम्पत्ति हमारे पडोस वाले मकान मे रहने आये.उन्हें चार महीने नासिक में रहकर बस पूजा-पाठ करने थे.उन्हें मराठी बिल्कुल भी समझ नहीं आती थी और हिन्दी भी ठीक से नहीं आती थी.मुझे गुजराती और मराठी दोनो भाषा आने के चलते मैं ही रोज लगने वाली आम बातों मसलन सब्जी,दूध,घर का काम करने के लिये नौकरानी , आदि के लिये उनकी सहायता हेतु दुभाषिये का काम करती. वे रोज नदी की किनारे की रेती लाकर, उसके कई शिवलिंग बनाकर ३-४ घन्टे उसकी पूजा करते और शाम को फिर नदी में जाकर विसर्जित करते! फिर उनकी दिनचर्या नियमित हो गई और मैं अपने में व्यस्त हो गई कुछ ४-५ दिनों बाद उनकी तबियत थोडी़ बिगड़ गई, उन्हे लगा शायद हवा-पानी बदलने की वजह से ऐसा हुआ है, लेकिन तबियत ज्यादा बिगड़ती ही चली गई..उन्हे अस्पताल में भर्ती करवाना पडा..मुझे ये पता तब चला वे आये और उन्होंने कहा कि क्या मैं उनकी पत्नी के पास अस्पताल में कुछ देर रुक सकती हूँ क्यूँ कि उन्हे अपनी पूजा आज पूरी करनी है और वे अब वापस जाने का मन बना चुके हैं..मैं अस्पताल पहुँची तो वे मुझे देखकर रोने लगीं, डीहाइड्रेशन की वजह से उनकी हालत बहुत कमजोर लग रही थी और उन्हें घबराहट हो रही थी. आसपास के लोगों को लगा कि मैं उनकी रिश्तेदार हूँ और उन्होंने लगभग डाँटते हुए ये जताया कि मै कितनी लापरवाह हूँ.जिस तरह से वो मेरा हाथ पकडे थीं..और मेरे मन मे भी उन्हें कुछ हो जाने का डर था…मैने भी नही कहा कि ये मेरे और मै इनके बारे में ज्यादा कुछ नही जानते, हमारा रिश्ता सिर्फ उतना ही है जितना एक इन्सान का दूसरे इन्सान के लिये होना चाहिये!!
कुछ दिनों बाद मेरा भाई, और भाभी आये.भाई जो एक "ग्लोबलाइजर"(* बताऊँगी ये कौन होते हैं!)है, जो ‘हाइजीन’ और ‘पॉल्यूशन’ जैसे जुमले इस्तेमाल करने लगा है, ने आते ही घोषणा कर दी कि उसने रेलवे-स्टेशन पर तरह-तरह के जटाधारी साधुओं को देखा है और उसकी जानकारी मे उसने कोई भी एसा पाप नही किया है जो उसे डुबकी लगा लगाकर धोना है, तो वो इसी शर्त पर हमारे साथ चलेगा कि उसे नहाने को बाध्य नही किया जायेगा, मै और भाभी जितनी चाहे डुबकियाँ लगाने को स्वतंत्र हैं! उस दिन भी हमारा भाग्य अच्छा था, वो विशेष तिथियों के बीच का समय था तो फिर साफ सफाई हुइ थी,बारिश की वजह से छोटे-छोटे पुलों के ऊपर से बहता तेज़ पानी देखकर वहाँ पहुँच कर नदी मे उतरने वाला सबसे पहला मेरा भाई था. हमने बहुत मजे किये!
तो इसी तरह सारे साल भर हमने खूब डुबकियाँ लगाइ और परोक्ष-अपरोक्ष रूप से पुण्य कमाते रहे! और हमारा और हमारे परिवार का मोक्ष कर लिया पक्का!!!



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