हैलो, हैलो, मैं सुंदर चिडिया हूँ...
इस बीच, पत्नी जब भारत गई थी, तब ऐना की देख रेख की सारी जिम्मेदारी मेरी उपर आ गई. बहुत जल्दी उसने सब सिखना शुरु कर दिया था. उसके मन से इंसानों का डर भी खत्म हो गया था. उसका पिंजड़ा हमेशा खुला रहता था. जब तक मन हो बाहर खेले और फिर अपने आप ही अंदर चली जाती थी. अब तो हम उससे डर कर चलते थे कि कहीं पैर के नीचे न दब जाये मगर उसे हम पर विश्वास था और वह स्वछंद यहाँ वहाँ घुमती थी. काश, हम इंसान भी एक दूसरे पर ऐसा ही भरोसा कर पाते. उसे अपना घंटी लगा खिलौना बहुत पसंद था, हमेशा उससे खेलती. अगर उसे अलग करके दूसरा खिलौना टांग दें तो चीं चीं करके लड़ने लग जाती थी. उसी खिलौने से उसने मुँह से घंटी बजाना सीख लिया था. दिन भर बैठे मुँह से घंटी बजाती रहती. कोई बड़ा ज्ञानी ही जान सकता था कि सच में घंटी बज रही है कि ऐना आवाज निकाल रही है. धीरे धीरे उसके पास ढ़ेरों खिलौनों का आंबार लग गया मगर घंटी वाले खिलौने का मोह उसने कभी नहीं छोड़ा. आज सोचता हूँ तो लगता है हर एक की जिंदगी में एक न एक प्रिय खिलौना जरुर आता है जिसका मोह जिंदगी भर नहीं छूटता, भले आप उससे खेल ना पाये मगर याद रहता है. जैसे हमारे पंकज भाई को उनका पहिये वाला प्लास्टिक का लाल हाथी आज भी याद है. जबकि अब वो २७ साल के हो चले हैं.
उसके आवाज सीख लेने की काबिलयत से प्रभावित हो, मैं उसके लिये एक शीशा खरीद लाया जिसमें आवाज भरने की सुविधा है और जब भी ऐना उसके सामने जाये तो वो बोलता था. मैने उसमें अपनी आवाज में रिकार्ड किया-हैलो , हैलो, मैं सुंदर चिडिया हूँ. ऐना ने बहुत कोशिश की, मगर कभी भी मेरी आवाज कॉपी नहीं कर पाई. लगता है, अपनी आवाज में ही कुछ डिफेक्ट है वरना तो वो घंटी की आवाज सीख ही गई थी.
रात में हमेशा झूले पर चढ़ कर सोती थी. बाकि सारे दिन झूला देखती भी नहीं थी. जब भी घर में किसी को देखती, अपनी खुद की धुन का गाना, चीं चीं आवाज में सुनाती. सोचती थी हमारा दिल बहला रही है, वैसे सच में, बहलाती तो थी. खाने में थोड़ा पिकी थी. हम कोई सा भी लेटेस खा लें, उन्हें फ्रेश रोमन लेटेस (सबसे महंगा) ही खाना है. साधारण वाला लगाकर तो देखो, वो देखे भी न उसकी तरफ. रईसों के बच्चों वाले सारे चोचले पाल लिये थे. हर महिने नया खिलौना, खाने में हाई स्टेन्डर्ड और लड़की थी तो स्वभाविक है, शीशा दिख तो जाये, घंटों खुद को निहारती थी. एक बार शीशा देखे, फिर हमें कि देखो, कितनी सुंदर दिख रही हूँ. सच में बहुत सुंदर थी, दिखने में भी और दिल से भी.
शाम को उसको टीवी देखना बहुत पसंद था, खास कर सिंदूर....., जो ज़ी टीवी पर आता है. उसके टाईटिल गीत में बजते घूंघरु की आवाज पर पूरी तल्लीनता से सुर मिलाकर नाचती थी. हमसे ज्यादा उसे आभास था कि कब आयेगा वो सिरियल. अगर टीवी बंद हो तो हल्ला मचा मचा कर चालू करवा लेती थी और अब देखें, आप ठीक आठ बजे सोती हैं तो उन्हें हल्ला गुल्ला, रोशनी कुछ भी पसंद नहीं. उन्हें उठा कर अलग कमरे में अंधेरा करके, कंबल से पिंजड़ा ढ़को और आवाज न जाये, इसलिये दरवाजा भी लगा दो, तब वो सोयें. वरना मजाल है कि आपको टीवी देखने दे या कोई काम करने दे. गोद में बैठ कर टीवी देखना, खाना खाना आदि उनकी अदायें थीं. नहाने में उसके जैसा खुश होते मैने आज तक किसी मानव को तो नहीं देखा. हर हफ्ते कुद कुद कर बेसिन में नहाती थी, वही उसका बाथिंग टब था. फिर टावेल में लपेट कर उन्हें निकाला जाता था और सुखाया जाता, तब खाना खाकर, उस दिन वो दुपहर में भी सोती.
समय उड़ता चला गया. एक रोज इसको इनकी बेबी सिटर के पास छोड़ने गये कि हम दो दिन को कहीं जा रहे हैं. उसके पास पचास से ज्यादा चिडियां एक वक्त में बेबी सिटिंग को होती हैं और वो चिडियों को प्यार करने वाली जानकार महिला है. उसी ने हमें ऐसी बात बतायी कि हम तो धक से रह गये. इनका गीत सुनकर और अन्य अवलोकन कर उसने बतलाया कि जिसे आप लड़की समझते हैं वो लड़का है. अब लिजिये. खैर हम उसे लड़की ही मानते रहे और न ही कभी उसका नाम बदला.
कुछ समय से हमने महसूस किया कि ऐना कभी कभी उदास हो जाती थी और चुपचाप बैठी रहती थी. हम समझ गये कि अब वो बड़ी हो गई है और उसे साथी की जरुरत महसूस हो रही है. इन सब बातों में हम यूँ भी ढ़ेड समझदार है लेकिन अपने लड़कों के मामले में इसे प्रदर्शीत नहीं होने देते, हालांकि हम समझ वहां भी रहे हैं.
खैर हम ऐना के लिये साथी ले आये. इस बार लड़की परखवा कर लाये, हालांकि कनाडा के हिसाब से कोई सी भी युगलबंदी गाई जा सकती थी, सब जायज होता. मगर यहाँ हमारा भारतीय होना आडे आ गया. नव आगंतुक का नामकरण किन्हीं विशिष्ठ कारणों से किया गया-बोलू. आप भी अगर फुरसतिया जी की तरह सोचेंगे तो समझेंगे कि नामकरण का कारण उसका अत्याधिक बोलना रहा होगा. नहीं भाई, इसकी भी एक दिलचस्प कथा है.
" हमारी ससुराल मिर्ज़ापुर की है. हम गये वहाँ और हमारे ससुर साहब, अब नहीं हैं इस दुनिया में, के मित्र कालिन का धंधा करते थे ,उन्होंने मुझे उनकी फेक्टरी देखने भेजा ,वहां मालिक ने हमारी खातिरदारी की, दामाद जो थे और वो भी विदेश से गये. अपने खास नौकर को न जाने क्या समझा कर हमारे साथ किया. वो हमें गोदाम दिखाने लगा, पहली कालीन दिखाई और कहा कि ई बोलू है हम सोचे कि यह कोई क्वालिटी होती होगी. तब तक दूसरी कार्पेट दिखाई और कहा कि ई रेड है, लाल रंग की थी वो. तब हम यह समझ पाये कि पहले वाली नीली थी इसलिये बोलू ....यह नयी वाली भी नीले रंग की है सो नामकरण हुआ "बोलू".
बोलू ने आते ही अपना माहौल जमा लिया, और जैसा कि होता है कि अगर लड़का ज्यादा उम्र तक बिना लड़की के रह जाये तो जब भी लड़की मिल जाये, शादी हो जाये, तो बस गुलामी करने लगता हैं. वो ही ऐना के साथ भी हुआ. सुबह से शाम तक बोलू के पीछे पीछे घुमना, उसे खाना खिलाना, यहाँ तक की ऐना ने अपना झुला भी सोने के लिये उसको दे दिया और खुद नये झुले पर सोने लगी. अपने सारे खिलौने भी उसके नाम. आजकल जैसा होता है, बोलू ने भी इसका खुब फायदा उठाया और खुब ऐश की. सब हथिया लिया और ऐना के हिस्से मे आई हमारी गोद और अपने पिंजड़े का एक कोना. बाकि सब बोलू का हो गया. बोलू हद से उपर व्यवहारिक और व्यवसायिक और ऐना उतनी ही शर्मिली और संस्कारी. बोलू स्ट्रीट स्मार्ट और ऐना, सभ्य पारिवारिक बाला.
आपस में प्रेम तो बहुत था मगर अचानक, शायद, बोलू को चाँद लाने का वादा कर बैठी ऐना ने इतनी ऊँची उड़ान भरी कि प्रेमांध वो छत न देख पाई और टकरा कर गिर पड़ी. फिर ऐना कभी न चल पाई और न उड़ पाई. सब इलाज करा लिये पाँच दिन में. सी टी स्केन से होम्योपेथिक से एंटिबायोटीक...कुछ भी न काम किया.
पांच दिन से डॉक्टर के ऑफिस चक्कर, सी टी स्केन, दुआयें, पूजा पाठ, हमारे प्रिय फुरसतिया जी की मानता, सबने बस इतना ही काम किया कि आज ऐना शांति से ब्रह्म लोक सिधार गई. अब तक तो मम्मी के पास भी पहूँच गई होगी. मगर मम्मी की जिंदा याद, ऐना, हम तुमको नहीं भूल पायेंगे.
तुम्हें सेब पसंद था न!! आंगन में सेब के पेड़ के नीचे ही तुम्हारे पार्थिव शरीर को दफनाया है. अगले बरस जब उसमें सेब आयेंगे, तुम हमें खुब याद आओगी तुम हमारे दिल में हमेशा जिंदा रहोगी. वहां खुब उडना और मम्मी के पास रहना. वैसे तो तुम खुद ही समझदार हो. एक दिन जरुर मिलेंगे फिर.
बोलू भी दुखी है. ऐना तो चली गई मगर शीशा बोलू को देख कर बोल रहा है, "हैलो , हैलो, मैं सुंदर चिडिया हूँ"
अभी बोलू को सोने के लिये अलग कमरे में रख कर आया हूँ, मन भर आया है बिल्कुल वैसे ही, जैसे मम्मी के जाने के बाद पापा को भारत में अकेला छोड़ कर निकला था......
अंत में ऐना की आत्मा को शांति मिले, इस हेतु अनेकों प्रार्थना और उसे नमन और हार्दिक श्रृद्धांजली...तुम हमेशा याद आओगी.
साभार: http://udantashtari.blogspot.com/2006/12/blog-post_29.html



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Comments (1 posted):
Congrats to the writer and thanks to webdunia.com of which I was a part once upon a time.
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