महिला मजदूर
हर तरफ लोहे और सीमेन्ट की इमारतें बनाने मे मजदूर जुटे दिखाई देते हैं..ये दृश्य बिल्कुल आम हैं…मैने कई बार एक अजन्मे बच्चे को भी मजदूरी करते देखा है…माँ अपने अन्दर एक और जीव लिये, सिर पर बोझ उठाती है…उसके और एक या दो बच्चे वहीं पास मे रेत के ढेर पर खेल रहे होते हैं…तब मुझे उसका माँ बनने के लिये समर्थ होना, भगवान से मिला वरदान नही, बल्कि अभिशाप लगता है…तब मुझे ‘दीवाली’ की रोशनी, ‘होली’ के रंग या रक्षा के धागे सब कुछ बेमानी लगते हैं…
अपनी यही नियति मानकर,
वो तो बस चल पडी कामपरबोझ सभी उसे उठाना था,
थकना उसने कब जाना था?
जल्दी उठी रात जाग कर,
वो तो बस चल पडी कामपरसुनती नही, जो कहता है मन,
साँसें-ढोना, उसका जीवन
जीती रहती, भाग्य जानकर,
वो तो बस चल पडी कामपरनही चाहती, कुछ अपने को,
जो वो चाहे, सब बच्चों को
लडती है शक्ति समेट कर,
वो तो बस चल पडी कामपरभाग्य से उसे कुछ ना मिलता,
खुद पाती, वो भी लुट जाता
जीती है वो, सभी हार कर,
वो तो बस चल पडी कामपर
साभार :http://rachanabajaj.wordpress.com/2006/10/12/mahila-majdoor/



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