कौन है ये लंगोटधारी, हटाओ इसे

August 19, 2007

ये गांधीजी के बारे में शीला दीक्षित जैसी किसी नेता का भविष्य का बयान हो सकता है। एअरकंडीशंड, बेहतरीन ढंग से सजाए गए किसी मंत्री या नेता के कमरे में एक धोती में ही पूरे शरीर को ढंकने की कोशिश करने वाले अधनंगे आदमी की तस्वीर मैच नहीं करती न। होगा वो महापुरुष लेकिन आगे [...]

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बहुत मोटी हो गई है रोटी

August 19, 2007

रोटी!तुमने छीन लीआदमी सेउसकी आदमियतज़ुबां सेउसकी आवाज़कर दिया साबितसच को झूठन्याय के ही आंगन में। रोटी!तुमने खा लीहमारी भूख चबा लीविरोधी आवाज़। रोटी!मैं चकित हो जाता हूंतुम्हारी पाचन क्षमता पर तुम पचा जाती होइंसानियत, भूख,आंदोलन, ज़ुबां,सबकुछ। रोटी!सचमुचतुम बहुतमोटी हो गई हो। साभार: http://satyendra2007.blogspot.com/ ——————————————————————————–

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गौरव सोलंकी की क्षणिकायें-II

August 19, 2007

दर्दआज इस दर्द को भीअपने मन का कर लेने दो, कल कोई ये न कहे कि कोईमेरे घर से निराश लौटा था। पाना तुझे पाना तोबहुत मुश्किल न था, बस मैंने ही ज़िद कर ली कि पाना नहीं, साथ चलना है। टूटता तारा एक तारा टूटकर सीधा मेरी खुली आँख में गिरा और उस टूटते [...]

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समुद्र किनारे लहराता जन-समुद्र

August 19, 2007

अगले महीने मुझे मुंबई में आए ढाई साल हो जाएंगे। लेकिन आप यकीन नहीं मानेंगे कि मैंने अभी तक यहां का समुद्र नहीं देखा है। हां, एक बार बच्चों के साथ चौपाटी ज़रूर गया हूं। वैसे, हरहराता समुद्र मैंने देखा है, लेकिन मुंबई का नहीं। गुजरात में पोरबंदर का समुद्र देखा है, धीरूभाई के गांव [...]

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कमरा नंबर-129 के बालकृष्ण का आखिरी खत

August 19, 2007

आईआईटी, मुंबई के एक और छात्र ने खुदकुशी कर ली। एक बार फिर मैं परेशान हो गया। सोचने लगा कि आईआईटी के पवई कैंपस में बने हॉस्टल नंबर- 12 के 129 नंबर कमरे में रह रहे बालकृष्ण गुप्ता ने क्यों ये फैसला लिया होगा। बालकृष्ण कानपुर के एक खाते-पीते घर का रहनेवाला था। साल भर [...]

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बांह पसारे बोला था आकाश

August 19, 2007

वह चली गई। उसने कहा – इसे ऐसे ही होना था, हमें ऐसे ही मिलना था और ऐसे ही बिछुड़ना था। लेकिन तुम तो कहती थी – तुम मेरे आसमान हो। तो? तुम भी कितने स्वप्नजीवी हो। धरती और आसमान कभी आपस में मिले हैं, जो आज मिलेंगे। उसकी इस बात पर मुझे मुक्तिबोध की [...]

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भाषा एक पहचान है और एक परदा भी

August 19, 2007

जो लोग भाषा की शुद्धता को लेकर परेशान रहते हैं, शब्दों की व्युत्पत्ति के चक्कर में पड़े रहते हैं, पता नहीं क्यों मुझे उनकी बात जमती नहीं। हो सकता है ये मेरा देहाती नज़रिया हो। लेकिन मुझे इतना जरूर लगता है कि ज़िंदगी जैसे भाषा को उड़ाए, उसे उड़ने देना चाहिए। बीती रात लोकल से [...]

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अंश भर अमरत्व की आस

August 17, 2007

अमरत्व किसे नहीं चाहिए। वैज्ञानिक खोज में लगे हैं कि इंसान को कैसे अजर-अमर बनाया जा सकता है। कोई जब बताता है कि हिमालय की कंदाराओं में उसके कोई गुरु 500 सालों से तपस्या कर रहे हैं तो सुनकर बड़ा अचंभा होता है और कुतूहल भी। फिर, आम इंसान यह सोचकर तसल्ली कर लेता है [...]

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मजे से दूधो नहाओ, पूतो फलो

August 17, 2007

चिंता की कोई बात नहीं। ये आशीर्वाद अब बेधड़क दिया जा सकता है। आबादी का बढ़ना अब मुसीबत नहीं, भारत के लिए नेमत है। विकसित देशों की जनसंख्या वृद्धि दर ठहरी हुई है। कहीं-कहीं तो ये घटती जा रही है। जर्मनी में तो ज्यादा बच्चों पर इनसेंटिव दिया जाता है। आठ-दस बच्चे हो गए तो [...]

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रियलिटी शोज की रियलिटी

July 14, 2007

जिस प्रकार मनुष्य को जीवित रहने के लिये हवा, पानी की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार से आज के दौर में किसी भी टी.वी. चैनल को अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिये उस पर कम से कम एक रियलिटी शो का दिखाया जाना अनिवार्य हो गया है। आजकल टेलीविजन के सारे चैनलों पर रियलिटी शो [...]

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