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गौरव सोलंकी की क्षणिकायें-II

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दर्द
आज इस दर्द को भी
अपने मन का कर लेने दो,
कल कोई ये न कहे
कि कोई
मेरे घर से निराश लौटा था।

पाना
तुझे पाना तो
बहुत मुश्किल न था,
बस मैंने ही ज़िद कर ली
कि पाना नहीं,
साथ चलना है।

टूटता तारा
एक तारा टूटकर
सीधा मेरी खुली आँख में गिरा
और उस टूटते तारे को देखकर
अनगिनत बन्द आँखों ने जो मुरादें माँगी थीं,
तब से उन सबकी प्यास में
मैं ही जल रहा हूँ।

सपने
वह
अपने पिता के सपने पूरे करने को जिया,
उसके पिता
अपने पिता के सपने पूरे करने को जिये थे,
सबके अपने सपने,
बस सपने ही रह गए।

वक़्त
चल,
आसमान को चीर कर देखें,
बरसों से वक़्त ही नहीं कटता।

मासूम
जाओ,
लौट के मत आना,
कहीं डूब मरना
पर अपनी शक्ल मत दिखाना,
ये कहते हुए
तुम कितनी मासूम लग रही थी,
सच में मन किया था
कि डूब मरूँ।

भूख और नींद-1
एक बड़ी सी बात
अख़बार में छोटी सी जगह पा गई थी,
रोटी माँगने गई एक बच्ची
रोटी के बदले इज्जत गँवा गई थी,
अगर याद हो तो सच बताना,
उस रात तुम सबको नींद कैसे आ गई थी?

भूख और नींद-2
मैं एक आह भरता हूं
तो मेरी माँ रात भर सो नहीं पाती,
उसके करोड़ों बच्चे
हर रात भूखे सोते हैं,
तुम्हारा भगवान
क्या नींद की गोलियाँ लेता है?

चन्द्र-ग्रहण
कल कोई चाँद के गले लगकर
रात भर रोता रहा,
झूठ क्यों कहते हो
कि कल ग्रहण था।

ज़िन्दा लाश
उसे अपने शव को कन्धा देने का
शौक रहा होगा,
जो अपनी लाश को
ज़िन्दगी भर ढोता रहा,
वरना अब तो
उदास भी होने का रिवाज नहीं है।

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Comments (2 posted):

soniya verma on 10 December, 2007 10:39:53
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chhadikayein achhi lagi..
deokant sharma on 01 January, 2008 05:15:34
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I liked these drops of satire. These are so impressive that these penetrats into heart.

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