गौरव सोलंकी की क्षणिकायें
पीला दुपट्टा
उस दिन भीड़ भरी बस में
एक लड़की ने
एक मनचले लड़के को तमाचा मारा था
और तुम मेरे हाथ में अपने दुपट्टे का सिरा देखकर,
प्यार से मुस्कुराई थी,
जानती हो,
पीले दुपट्टे और पीले सूट आज भी बहुत रुलाते हैं...
बारात
गली में से गुजरती हुई बारात देखकर
बड़ी हवेली के चौबारे पर खड़ी
बड़ी बहू ने जाने क्यों,
यही सोचा,
आज फ़िर कोई दिल टूटकर रात भर रोएगा।
भगवान
एक दिन हारकर,
कमजोर पड़कर,
मैं तेरे घर की सीढ़ियों तक गया था भगवान,
तू सो रहा था,
मैं लौट आया।
दंगे
एक मुर्गे का धड़,
सिर से अलग होकर छटपटा रहा था
और दुकान के बाहर बंधा बकरा
जीवन की विवशता को देख मौन खड़ा था,
तभी शोर मचा,
हिन्दू का बच्चा!
एक जान और गई।
दर्द का रंग
आँसू भी जब भीतर घुटते रहते हैं
तो घाव से निकलते खून की तरह
अन्दर ही,
थक्का बन जम जाते हैं,
मेरा दर्द भी अक्सर नीला होता है।
सपने
बिन माँ के नन्हें बच्चे को
भूख से बिलखता देखकर
चित्रकार बाप चित्र उठाकर
बाज़ार चला गया,
सपने बेचकर
दूध लेता आया।
हिचकी
उसने कहा था कि तीन हिचकी आएँ
तो समझ लेना
कि मैं याद कर रही हूं,
कई बरस बीत गए,
एक-दो हिचकी आते ही
कोई न कोई पानी पिला देता है,
पानी भी है कि ख़त्म नहीं होता...
बाढ़
सुना है कि
तेरे शहर में बाढ़ आ गई है,
उसके इंसाफ़ पर मुझे पहले ही शक़ था,
तेरी बेवफ़ाई की सज़ा
पूरे शहर को क्यों दी गई है?
बुरे सपने
गले में ताबीज़ पहनने से,
सोने से पहले गायत्री मंत्र जपने से,
सिरहाने रामायण रखने से
और मनोचिकित्सक की बकवास सुनने से भी
बुरे सपने आने बन्द नहीं हुए,
सुनो,
अब मैंने सोना ही छोड़ दिया है।
शाम
हर शाम भी तुम्हारी तरह क्यों
सहमी सी चली आती है,
सामने बैठी रहती है,
बिन सवाल, बिन जवाब,
और फ़िर अंधेरा छोड़कर ऐसे चली जाती है,
जैसे कभी आई ही न थी।
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