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ऐसा पहले कभी नहीं हुआ

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मैं ,
अक्सर,
एक गौरैया के बारे में सोचता हूं,
वह कहाँ रहती है -कुछ पता नहीं।

खैर, कहीं सोच लें,
किसी पिजरें में-
या किसी घोसले में,
कुछ फर्क नहीं पड़ता।

गौरैया ,
अपनी बच्ची के साथ,
दूर-दूर तक फैले आसमान को,
टुकुर-टुकुर ताकती है।
कभी-कभी,
पिंजरे की तीली,
फैलाती,खींचती -
खटखटाती है ।

दाना-पानी के बाद,
चुपचाप सो जाती है -
तनाव ,चिन्ता ,खीझ से मुक्त,
सिर्फ एक थकन भरी नींद।

जब कभी मुनियाँ चिंचिंयाती है,
गौरैया -
उसे अपने आंचल में समेट लेती है,
प्यार से ,दुलार से।

कभी-कभी मुनिया गौरैया से कहती होगी -
अम्मा ये दरवाजा खुला है,
आओ इससे बाहर निकल चलें,
खुले आसमान में जी भर उड़ें।
इस पर गौरैया उसे,
झपटकर डपट देती होगी-
खबरदार, जो ऐसा फिर कभी सोचा,
ऐसा पहले कभी नहीं हुआ।

साभार : http://hindini.com/fursatiya/?p=18

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