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कविता-शायरी

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अभाव और सन्नाटे में बच्चे जल्दी बड़े हो जाते हैं

मज़दूरों कीअंधेरी गंदी बस्ती मेंअब कोई कुछ नहीं बोलताएक अजीब सन्नाटे नेकफ़न की तरहढांप लिया है पूरी बस्ती कोजहां हर चीज़ भयावह लगती हैक्योंकिकफ़न आदमी
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गौरव सोलंकी की क्षणिकायें-II

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दर्दआज इस दर्द को भीअपने मन का कर लेने दो, कल कोई ये न कहे कि कोईमेरे घर से निराश लौटा था। पाना तुझे पाना ...
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बहुत मोटी हो गई है रोटी

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रोटी!तुमने छीन लीआदमी सेउसकी आदमियतज़ुबां सेउसकी आवाज़कर दिया साबितसच को झूठन्याय के ही आंगन में।रोटी!तुमने खा लीहमारी भूख चबा लीविरोधी आवाज़। रोटी!मैं चकित हो जाता ...
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गौरव सोलंकी की क्षणिकायें

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पीला दुपट्टाउस दिन भीड़ भरी बस में एक लड़की ने एक मनचले लड़के को तमाचा मारा था और तुम मेरे हाथ में अपने दुपट्टे का ...
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बांह पसारे बोला था आकाश

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वह चली गई। उसने कहा – इसे ऐसे ही होना था, हमें ऐसे ही मिलना था और ऐसे ही बिछुड़ना था। लेकिन तुम तो कहती ...
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रूह से मुलाकात

कल मेरी मुलाकातएक रूह से हुईएक पवित्र और सच्ची रूह सेमैंने देखा उसको तड़फते हुयेऔर भटकते हुये ।मैंने महसूस कियाउसकी धड़कन को,मैंने पूछा-"क्या मैं ही ...
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लागिन