इतनी निर्दयी कैसे हो गयी तू मां?
मां,
तूने मुझे कभी प्यार नहीं किया.
न रखा कभी सिर पर हाथ.
दो पैसे देना तो दूर.
जब मैं बिजली घर बस अड्डे पर
या राजामंडी रेलेवे स्टेशन पर
अखबार बेच कर आता था.
तब मेरे सारे पैसे भी तू हड़प लेती थी.
क्या एसी जालिम होती है मां ?
मेरे बचपन पर,
तू मुझे बेहिस होकर मारती थी.
मुझे कभी न उड़ाने दी पतंग,
न खेलने दिये कंचे.
बचपन तो जीने ही नहीं दिया तूने,
क्या एसी निर्दयी होती है मां!
स्कूल कैसा होता है?
पाचवीं के बाद कभी भेजा ही नहीं तूने.
किताबें?
पालीवाल पार्क की लाइब्रेरी में ही देखीं थीं.
घर पर नहीं.
सेंटजांस कालेज मैं गया
लेकिन उसकी पुताई करने,
पढ़ने नहीं
अभावों में जिलाती रही तू मुझे
क्या एसी निर्दयी होती है मां?
लेकिन तू जानती थी.
एक अनपढ़ विधवा अपने
इकलौते बेटे
और बेटियों को कैसे पाले.
चलाये घर का खर्च.
न बनने दे अपने बेटे को,
“रांड़ का सांड“.
बचे,
रिश्तेदारों और पड़ोसियों के
तानों और निगाहों से.
भगवान को भाड़ में भेजकर.
खुद को बाप बनाने की जिद में
अपने अन्दर की
मां को मार दिया तूने
ढूंढती रही हर जुगत,
कि हम सफल हों.
हमारी सफलता की नींव,
अपने मातृ्त्व के
शव के ऊपर रखी तूने.
तूने जो चाहा वही हुआ.
तू जीती.
भगवान,
अगर उसका कहीं अस्तित्व होगा,
तो वो हारा.
सिखाया तूने संघर्ष करना
आगे बढ़ना, जूझना, जीतना,
और कभी भी न हारना.
आज मेरे पास
वो सब कुछ है,
जो तू चाहती रही कि मेरे पास हो.
बंगले हैं, कारें हैं, धन है.
पर मां नहीं है़
तूने मेरे साथ बुरे दिन बांटे तो,
अच्छे दिन भी तो बांटती.
तू इस सफलता का हिस्सा
हड़पने से पहले ही चली गयी
मुझे रोता छोड़कर
आज तू मेरे साथ होती
एक बार तुझे हंसता हुआ तो देख पाता.
तू जब जिन्दा थी
रुलाती ही रही
तेरे मरने के बाद,
तुझे याद करके,
आज भी मैं रो रहा हूं.
इतनी निर्दयी कैसे हो गयी तू मां?
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