बुढापा देख कर रोया...
एक मित्र ने विनोदवश प्रश्न उठाया कि क्या आपके साथ ऐसा कभी हुआ है कि किसी कविता की सिर्फ भूमिका ही पढ़ी गई और लोगों ने कविता पढ़ी ही नहीं क्योंकि भूमिका बहुत लंबी थी. अभी तक तो ऐसा हुआ नहीं, मगर जब से उन्होंने इस तरफ नजर डलवा दी, लगने लगा है कि हो तो सकता है.
होने को तो कुछ भी हो सकता है!!
जब एक भ्रष्टाचारी मंत्री हो सकता है
और एक गुंडा संतरी हो सकता है.
तो यह क्यूँ नहीं हो सकता है?
जब जेलर को कैदी पीट सकते हैं
और बाहुबली चुनाव जीत सकते हैं
तो यह क्यूँ नहीं हो सकता है?
जब बंग्लादेश भारत को हरा सकता है
और निर्दलीय सरकार गिरा सकता है..
तो यह क्यूँ नहीं हो सकता है?
बिल्कुल हो सकता है..इसलिये हम इस कविता की कोई भूमिका नहीं लिखेंगे. डॉक्टर ने हमसे क्या कहा और यह कविता हमारी डॉक्टर की वार्तालाप का नतीजा है, इसके लिये भूमिका की क्या जरुरत है. वो तो आप पढ़कर खुद ही समझ सकते हैं और हमें तो यह तक बताने की आवश्यकता भी नहीं है कि यह रचना भी बाल महिमा, रक्तचाप पुराण, मोटापा व्यथा की श्रृंखला की ही कड़ी है.
वो भी आप पढ़ते पढ़ते खुद ही जान जायेंगे. क्या जरुरत है किसी भी भूमिका की, सीधे कविता ही शुरु कर देते हैं. क्यूँ बताया जाये कि यह रचना इस बात को बताने के लिये है कि एक जवां मर्द को कोई बुढ्ढा कह दे तो कैसा लगता है. क्या लोग पढ़कर नहीं समझ सकते. तो पढ़िये न!!.
बुढापा देख कर रोया……..
कोहरे में धुंधला दिखता है
इसमें कौन अजूबा है
लेकिन मेरी पत्नी का मुँह
इसी बात से सूजा है.
कहती है कि नज़र तुम्हारी
अब तुमसे नाराज़ हो गई
और चिपक लो कम्प्यूटर से
हालत कैसी आज हो गई.
डॉक्टर बाबू बतलाते हैं
चिंता की यह बात नहीं है
बुढ्ढों के संग हो जाता है
डरने वाली बात नहीं है.
हमने बोला, होता होगा
मगर हमारे साथ हुआ है,
बुढ्ढों की क्यूँ बातें करते
जवां मर्द के साथ हुआ है.
भरी जवानी नस नस में है
दिल भी मेरा नाच रहा
मेरी प्रेम भरी कवितायें
बच्चा बच्चा बांच रहा.
एक जवानी उम्र चढ़ाती
एक जवानी मन की है
जिसके मन पर छाई उदासी
उसकी चिंता तन की है.
मुझसे खाते रश्क हैं वो भी
जो अब तक कालेज में हैं
उनके क्या क्या प्रेम तरीके
सब मेरी नालेज में हैं.
आगे जब भी बात करो तुम
हमको बुढ्ढा मत कहना
तोड़ फोड़ मचवा दूँगा मैं
फिर मेरी हरकत सहना.
मैं तो बस कहने आया था
तुम अपना कुछ ध्यान करो
उम्र तुम्हारी गुजर रही है
युवकों का सम्मान करो.
साभार: http://udantashtari.blogspot.com/2007/04/blog-post_19.html



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