पान का रंग
माँ के मन में आशंका बनी रहती थी कि मेरे भावुक एवं अबोध बचपन में कहीं अवांछित रंग न चढ़ जाए, सो जब-तब कहा करती-
बड़े संग धरे, तो खाय बीरा पान
छोट संग धरे,तो कटाय दूनो कान
क्षण भर के लिये मन का खरगोश ठिठक कर गुनने लगता । भाँति-भाँति के प्रश्न बुध्दि मथने लगते-बड़ा कौन, छोटा कौन, पान का बीड़ा ही क्यों, कैसे कान कटाना?
उधर जब मामाजी यजमानों के घर पुरोहिताई, चाहे त्रिनाथ मेला हो या सत्यनारायण कथा, चाहे गृहशांति होम हो या महामृत्युंजय जाप, करके लौटते तो हम बच्चों को प्रसाद बाँटते । फिर सबके हाथ धुलवाकर एक-एक चुटकी पान देते । हम इठला उठते । अपने-अपने मुँह की गमक और होठों की लाली को सर्वाधिक बताते । घंटों बीत जाता, पर सर्वसम्मति नहीं बन पाती । बहरहाल शनै:-शनै: मन का निष्कर्ष संपुष्ट होता चला गया, पान उच्च संसर्ग का परिणाम है । भगवान ऊँ चे हैं क्योंकि उन्हें पान समर्पित होता है । मामा भी ऊँ चे हैं, जिन्हें पुरोहिताई में भगवान को भेंटे गये पान पर संपूर्ण अधिकार है ।
थोड़ा बड़ा हुआ । उत्सुकतावश मामाजी के साथ पंचांग, जलपात्री, कुश आदि स्वयं पकड़कर मैं भी पहुँच जाता । वे अनुष्ठान का श्रीगणेश करते, मैं उनके पीछे बैठ-बैठा ध्यान से देखता रहता । नैवेद्य के उपरांत जब वे यजमान को तांबुल सजाने कहते, तो मैं सतर्क हो जाता । उनके कंठ से मधुर मंत्र गूँज उठता-
एलालवंग कस्तूरी कपूरै: सुष्ठिवासिताम्
वीटिका मुखवासार्थ समर्पयामि सुरेश्वरि ।
माँ की लोकशिक्षा और मामाजी के शास्त्र-पाठ से कोरे मन में पान का सम्यक बिम्ब प्रतिष्ठित हुआ । अभिधा, लक्षणा और व्यंजना तीनों ही कोणों से पान में निहित प्रतीकों का रंगबोध मुझे संस्कारित करने लगा ।
मनुष्य का रचाव, उसके संस्कार का बनाव लोक ओर शास्त्र से होता है । भारतीय मानस लोक और शास्त्र का योगफल नहीं तो और क्या है और इसी योग-संयोग में ही उसकी सनातनता है । तर्कवादी महापुरुष लोक और शास्त्र को चाहे जितनी कँटीली और जंगली झाड़ियों से रूँध लें, दोनों मानवीय गरिमा के उत्कर्ष पर एक-दूसरे की सीमा को स्पर्श करते ही एकाकार हो उठते हैं । विशुध्द लोक या शास्त्रीय विशुध्दता मन के मुगालते मात्र हैं । दोनों में विलगाव असंभव है । आज आप किसे लोक कहेंगे और कहाँ से शास्त्रीयता को उससे विलग रेखांकित करेंगे ?
दरअसल लोक और शास्त्र में द्वंद्वात्मक अंतर्सबंध का आभास ही भारतीयता की शाश्वत मुद्रा है, जिसकी मनोभूमि में हैं-आस्तिकता, आध्यात्मिकता एवं पारलौकिकता । लोक वाचिक शास्त्र है और शास्त्र शाब्दिक लोक । शास्त्र का प्रयोगस्थल लोक है और लोक में प्रयोग भी शास्त्रसम्मत । दोनों ही अमानवीय पदचापों का नियमन करती हैं । दोनों के मध्य आवाजाही का प्रतिबंधन कठिन है । इस महादेश के दो महान ग्रंथ रामायण और महाभारत लोक-जीवन की अनुश्रुतियों की उत्प्रेरणा से रचे गये हैं । वाल्मीकि को नारद से जो कथावस्तु मिली, वह राम की लोककथा ही थी । अपने समय के जीवन-मूल्यों को परखने के लिए वेदव्यास कृष्णद्वैपायन ने प्राचीन लोकसाहित्य का सम्पादन किया था । श्रीकृष्ण का उद्धोष 'लोक संग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि' केवल औपचारिक नारा नहीं । भागवत का भक्तमानस गोकुल गाँव का सामान्यजन ही तो है । बौध्ददर्शन का उत्स अर्थात् जातक कथाएँ तत्कालीन जनपदीय रचनाएँ ही हैं । मध्यकाल के समूचे भक्ति-आंदोलन को लोकजीवन की प्रक्रिया न कहें तो क्या कहें ? और उधर लोक में जो वाचिकता है, वह शास्त्र की छाया से प्रकाशित है, प्रज्वलित है । भारत का लोकमानस मुनिमन का ही संशोधित संस्करण है । लोक के सभी संकायों में शास्त्रीय पात्रों, प्रसंगों, उक्तियों, प्रतीकों, मिथकों की छायाएँ आती-जाती रहती हैं । अपने प्रदेश छत्तीसगढ़ की ओर जब देखता हँ, तो कभी वह वेदों, पुराणों, उपनिषदों, शास्त्रों की भाषा में स्वयं को अभिव्यक्त करता दिखाई देता है, तो कभी उसमें वेदों, पुराणों, उपनिषदों,शास्त्रों की वाणी आकार पाती हुई भी । यही भारतीय लोक संस्कृति की मौलिकता है । हाँ ! सहजीविता, गुणग्राह्मता,समन्वय एवं विश्वसनीयता से पूर्ण जीवन-शैलियाँ समूचे विश्व के लिये आश्चर्य बन जाती हैं । कोई सहमत हो न हो, मैं तो लोक और शास्त्र के मध्य आवाजाही पर मेरे बंधु संस्कृताचार्य डॉ. महेश शर्मा से पूर्णत: सहमत हुआ जाता हूँ । वे कहते हैं -'' पंचमवेद महाभारत के रचनाकार महर्षि वेदव्यास पंडवानी गायिका तीजन बाई को ही अपना चार्ज सौंप कर स्थानांतरित हुए हैं ।'' छत्तीसगढ़ में ही क्योें, देश-विदेश में महाभारत-जैसी शास्त्रीय कथा को अपनी लोक-शैली में सुनाने वाली एकमात्र गायिका तीजन ही है ।
पान का बीड़ा हिन्दुस्तान का परिचय है । ऐसा कहना मेरे देश-राग का आवेश है, मान लेता हूँ, किन्तु अमीर खुसरो के लिये आप क्या कहेंगे, जिसने इस देश को अपने पूर्वजों की धरती से श्रेष्ठ निरूपित करते वक्त पान के पत्ते की दुर्लभ नज़ाकत को गिनाया था और जिसकी छटा ने तीन-तीन शताब्दियों के बाद भी अबुल फज़ल को सराबोर कर दिया था । विश्वास नहीं तो पहुँच जाइए दादी माँ के पास । वह बच्चो को बहलाते पूछ ही रही होगी-
पान सड़ा क्यूँ ? घोड़ा अड़ा क्यूँ ? सबक बिसरा क्यूँ ?
फिर सारे के सारे कह उठेंगे-फेरा न था । ऐसे कैसे हो सकता है कि दादी माँ के जिक्र से कथा-कथानी याद न आएँ । बचपन, गाँव, घर के प्रसंग झिलमिलाने न लगें । लो, मेरी भी स्नेहिल स्मृतियों का कपाट खुल गया है ।
कुछ ही देर में मेरी बरात प्रस्थान करने वाली है । सारे बंधु-बांधव अपनी-अपनी धुन में मगन हैं । कोई धोती के साथ फबने वाले कुरते का रंग मिला रहा, कोई अपने जूतों को पोंछपाछ रहा, तो कोई जरूरी सामान अपने थैले-अटैची में सँभाल रहा। किसी को भी किसी की सुनने की फुर्सत नहीं । ऊपर से निसान, मोहरी और टिमकी की तेज मंगल ध्वनि पर दादी माँ एक ही रट लगा रही है- 'गाल सेंक बार बेवस्था कर रे' (गाल सेंकने अर्थात् दूल्हे के अभिनंदन के लिये द्रव्यों की व्यवस्था करो रे)।
द्वार पर सभी माताराम मुझे घेरे उल्लासित हैं । दादीमाँ भीड़ को चीरती हुई मेरे सम्मुख आ खड़ी हुई । उसके हाथ में थाल है । थाल में एक दीपक, कुछ दूर्वा, कुछ सुपाड़ी, कुछ हल्दी गाँठें, सिंदूर, चंदन, पाँच हरे-हरे पान के पत्र और एक बीड़ा पान । मुझे लगा, जैसे दादी के काँपते हाथों में समूची संस्कृति सँभली हुई है ।
बरात दुल्हन के साथ लौट चुकी है । पहुना भी नेंग-नाता निभाकर अपने-अपने घर जा चुके हैं । निशा प्रथम प्रहर की देहरी छोड़ने ही वाली है । दादी माँ ने कुछ मुझे पकड़ा दिया और शायद उन्हें भी जानना चाहेंगे आप-वह कुछ क्या था ? तो थोड़ी प्रतीक्षा कीजिए । शायद आप जान भी गये हों और यही कहना चाहते हो- मेरे लिये उनके कँपकपाते अधरों पर पहला शब्द जो प्रस्फुटित हुआ था वह था-पान और फिर मैंने भी उनके लिये झिझक को लाँघते हुए कहा था -पान ।
पान दो अजनबियों के मध्य प्रगाढ़ता के लिये प्रवेश-पत्र है । पान मांगलिक वनस्पति है । अपरिचय के ताने को खोलने की सांस्कृतिक कूंजी है । पान चीज ही ऐसी है कि सारे पर्दों को उघाड़ दे । तंबोली आज भी इस धर्म का निर्वाह कर रहे हैं । पान या पनवाड़ी की संगत में आये और सारी गोपनता समाप्त । किसके साथ किसकी ऑंखें लड़ी हैं ? कौन कहाँ गुलछर्रे उड़ा रहा है ? किस ऑफिस का बॉस कितना लेता है और वह किस-किस नेता, किस-किस पत्रकार को कितना देता है ? घर, गली, गाँव, शहर यहाँ तक कि दुनिया भर की सारी खट्टी-मिट्ठी खबरें नि:शुल्क मिल जाएँगी ।
शहर-नगर में पनवाड़ी की दुकान स्थानीय पूछताछ केन्द्र होती है । नये-नये शहर गये हों और पता गुम हो गया हो, तो सीधे यहीं शरणागत हो जाइए । पान से परहेज भी हो, पर सबसे पहले एक पान बँधवाइये-मगही, साँची, बनारसी, कानपुरी, जगन्नाथी, बंगीली, बेगमी, महोबी या मीठी पत्ती, फिर सीधे अपने मतलब में आ जाइए - भाई साहब! राजेन्द्रसोनी धुमका वाले डॉक्टर साहब कहाँ रहते हैं या संतोषरंजन का बंगला किधर पड़ता है ? वह इन तक पहुँचने का रास्ता जरूर बता देगा ।
भले ही उत्तर -दक्षिण को गुरेरे, पश्चिम-पूर्व को तरेरे, लेकिन पान के रस में डूबकर सब एक ही भाषा बोलते हैं-एकता की भाषा,समरसता की भाषा । पान केवल पत्ता नहीं, वह एकता का पता भी है । इसमें सुपारी और गोलाबारी नारियल धुर दक्षिण के खेतों से, कत्था हिमालय की तराई से,सौंफ उड़ीसा से, के सर कश्मीर की क्यारियों से आकर जब मिलते हैं और शौकिया तौर पर थोड़ा सुगंधित जर्दा भी हो, तो उसके खाने में जो आनंद उमड़ता है, वह आनंद और किस देश में प्राप्त है ।
पान बड़ा ही मिजाजदार होता है । यह खाने-चबाने की चीज नहीं, रस लेने की चीज है । रस वही ले सकता है ,जो रसिक हो, रस में भींगने की कला जानता हो । रस का आनंद डूबने से मिलता है, तट पर बैठकर देखने से नहीं । तटस्थता से रसाभास तो संभव है, रसानुभूति नहीं । रस की शर्त समर्पण है, संकुचन नहीं । रस अग्नि है, जो रसिक को तपाकर उसकी अनुभूतियों को निखारता है । एक सच्चा रसज्ञ कभी भी किसी एक रस के लिये पक्षपात नहीं करता,वह एकरस नहीं होना चाहता । एकरसता मृत्यु है और बहुरसता जीवन । कम्युनिज्म के ढहने के पीछे यही एकरसता है ।
रस सिध्दि है, साधन नहीं । फूल के समीप भृंग भी जाते हैं और अन्य कीट भी। रसपान का रहस्य भृंग को पता है, वह तभी तो निमग्न हो जाता है । ऐसी निमग्नता की स्थिति में सब कुछ अकथ हो जाता है । योग-मुद्र्रा शायद इसी का नाम है ।
बीड़ा उठाना मामूली खेल नहीं । पान दुर्विनीत लोगों की करतूतों से अपयश का भागी बन जाता है, जब-जब पीक से लोग कहीं भी हिन्दुस्तान का रक्त रंजित नक्शा खींच देते हैं । पान तब-तब स्मरणीय बन जाता है, जब-जब नामवर सिंह जैसे मनीषी का सान्निध्य प्राप्त कर लेता है, जिनके मुँह में पान गया फिर आप कितने भी बोलते बतियाते रहिए, वे पान का रस घुटकने छोड़कर और कुछ भी नहीं करेंगे । बाकायदा सहमति-असहमति की मुद्रा बनाते रहेंगे पर बोलेंगे कुछ भी नहीं । उनके लिये पान खाना परमानंद से साक्षात्कार-जैसा है । पान पुरस्कार भी है । पढ़िए भला मणिमाला की हंसी। बनारस में भारतेंदु स्मृति में आयोजित गोष्ठी में जब शिवानी बोलकर मंच से उतरती हैं, तो ठाकुर प्रसाद सिंह उनके लिये पान का दोहरा लिये खड़े मिलते हैं और वे बोल उठते हैं - यह रहा आपका पुरस्कार । वाह,वाह.....? शिवानी वर्षों बाद उनकी स्मृति में छटपटा उठती हैं-कहाँ गइलै हो...और फिर लिखने को विवश हो जाती हैं -उस सच्चे स्नेही मित्र-प्रदत्त वह साहित्यिक पुरस्कार क्या ज्ञानपीठ पुरस्कार से कुछ कम था !
पान तीज-त्यौहार और मेले का रंग है । गाँव के लिये साल भर में एक दिन का पहुना रंग, अमीर-गरीब ,छोटे-बड़े, सबके होठों पर खिल-खिल उठने वाला रक्ताभ, जो शाम ढलते-ढलते ढाढस बँधा कर गुम हो जाता है । बेचारा गाँव सोचता रह जाता है - अगले साल बारिश हुई तो हल चलेंगे, हल चलेंगे तो खेत जोतेंगे, खेत जातेंगे तो फसल लहलहायेगी, फसल लहलहायेगी तो मेले भरेंगे, मेले भरेंगे तो सबसे पहले पनवाड़ी अपनी दुकान सजायेंगे, पनवाड़ी दुकान सजायेंगे तो जाहिर है बच्चे भी बड़ों-बूढ़ों की नज़र बचाकर पूरा बीड़ा पान खायेंगे । पान खायेंगे तो उनके होठों पर लाली आयेगी ही, होठों पर लाली आयेगी तो वे इतर-इतरा कर मेले में घूमेंगे भले ही मिलोरिसा होंठ की कोर से सीधे उजले कपड़ों को रँगने के लिए अधीर हो रही हो ।



del.icio.us
Digg
Comments (0 posted):
Post your comment