दोपहर में गाँव
भीषण तापमान के दिनों में मुझे अक्सर 'दूसरा साप्तक' की कविता घेर लेती है –
घर की खपरैलों के नीचे
चिड़िया भी दो-चार चोंच खोल
उड़ती छिपती थी
खुले हुए आंगन में फैली
कड़ी धूप से
शकुन्त माथुर की जीवंत पंक्तियों को जब उर्दू लिपि के अंदाज से पढ़ता हूँ तो मेरे गाँव की दोपहर एक बारगी मुझे बाँहें फैलायें बुलाने लगता है । दूर क्षितिज तक फैली उजली धूप के समुद्र में स्वयं को तैरते हुए देखता हूँ । दोपहर प्रकाश की उमंग का समय है। दोपहर किरणवृष्टि की चरम बेला है । थोड़ी तपन, थोड़ा अल्हड़पन, थोड़ा-थोड़ा बेधड़कपन । दोपहर यानी युवा तुर्क । एक संपूर्ण युवक में मात्र आक्रोश नहीं होता, इसमें स्नेह और प्रेम की असीम संभावनाएँ भी होती हैं । दोपहर सिर्फ अग्निवर्षा वाली अवधि का नाम नहीं, उसमें शस्य की मुस्कान, प्रकृति नैरन्तर्य की सुरक्षा जैसी अनंत कामनायें भी होती है । दोपहर से ज्यादा रोचक ज्यादा सुन्दर भला कौन-सा कालखण्ड है ?
आप कहेंगे, यह कैसी उलटबाँसी ? दोपहर और वह भी रोचक ! संवेदना-उपासक से भोर की प्रभा का विस्मरण, संध्या सुंदरी के लावण्य के प्रति अनाकर्षण । भैया ! दोपहर है ही ऐसी अपने गाँव की-
कभी एक ग्रामीण धरे कंधे पर लाठी
सुख-दुख की-मोटी-सी गठरी
लिये पीठ पर
भारी जूते फटे हुए
जिसमें से थी झांक रही गाँव की आत्मा
जिन्दा रहने के कठिन जतन में
पाँव बढ़ाए आगे जाता
गाँव दोपहर से मुँह नहीं चुराता । दोपहर में उसकी संघर्ष-चेतना तीव्रतम हो जाती है । उसके लिए दोपहर 'तपन' का नहीं, बल्कि लगन का प्रतीक है । वह दोपहर में नगर-सा थम नहीं जाता । भोगवाद चाहे इसे गाँवों की, गाँव वालों की नियति मानने का दंभ पालता रहे, पर वस्तुत: यह उसका भ्रम है । गाँव में विश्रान्ति का नाम मृत्यु है । कृषि आधारित जीवन पध्दति में दोपहर गर्मी की भीषणता से बचने के लिए कुरिया में बिलम जाने का समय नहीं, वहाँ तो वही किसान, मजदूर, चरवाहा, कुम्हारा, लुहार ही अपने भविष्य की आभा की कल्पना कर सकते हैं, जो घाम से घबराये नहीें, छांव में भटक जाये नहीं ।
गाँव समयोपासक होता है । उसकी मनीषा में समय के किसी भी अंश के प्रति दुराग्रह नहीं होता । वह समय की साधना करता है, उसे बाँधता नहीं । वह समय के साथ स्वयं को साध लेता है । क्यों न सधे ? आखिर कर्मयोगी श्रीकृष्ण की कथाओं को उसने भी सहेज जो रखा है-
तपाम्यमहं वर्ष निगृह्णाम्युत्सृचामि च
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ।
श्रीकृष्ण स्वयं को सूर्य में प्रतिष्ठित करते हैं । सूर्य का अर्थ तेजोमय है । सूर्य प्राचीन से प्राचीन और नवीन से नवीन सभी भाषाओं के साहित्य में तेजस्विता का प्रतीक है । ग्रीक भाषा में सूर्य को 'हेलियस' कहा गया है । यानी तेजवान । सूर्य ही संसार में समय-चक्र का ऑपरेटर है । समय-घड़ी का सारा खेल सूर्य किरणें ही रचती हैं । सूर्य किरणों की बोली सुनकर पृथ्वी कर्मक्षेत्र में प्रविष्ट कर हर दिन एक नया पाठ जोड़ता है और सूर्य किरणों के इशारों से पृथ्वी थक-माँदकर सो जाती है । सूर्य-किरणों से बचने का सीधा-सीधा मतलब अंधकार का आमंत्रण है ।
संसार का हर रंग सूर्य है । नकार कर देखें तो भला, विज्ञान-संसार का सबसे बड़ा रंग-साज सूर्य नहीं कोई और है । वह अपना सप्तवर्णी किरणों से अनंत और अनगिनत भाव-बोधों का बीजारोपण करता है । अपनी इन्द्रधनुषी किरणों के छंदों से मनुष्य की जिजीविषा बचाये रखता है । कूर्मपुराण इनका गुणगान गायत्री, वृहती, उष्णिक, जगती, पंक्ति अनुष्टुप तथा त्रिष्टुप (सप्तछंद)संज्ञा से क रता है । सूर्य ही सौर देवताओं में प्रधान है, वह प्रकाश का देवता है । सूर्यो ज्योतिरजायत । कृष्ण में ऐसे असंख्य सूर्य विद्यमान हैं । उनके श्यामल रूप का कारण कदाचित् यही हो । जो भी हो,मुझे ठीक-ठीक तो ज्ञात नहीं, पर यह अज्ञात नहीं कि कृष्णानुयायी मेरा गाँव सूर्य- किरणों के सान्निघ्य में रह-रहकर ही साँवला हो गया है । सूर्य-दृष्टि की परिधि में रह-रहकर गौरांग श्याम वर्ण में रूपायित हो जाता है ,पर मन निर्मल, धवल,निर्लिप्त कृष्ण की तरह।
सचमुच गाँव का मन उज्ज्वल होता है, निर्मल होता है । गाँव में सिर्फ भोर ही निर्मल नहीं हुआ करता, संध्या ही निर्मल नहीं हुआ करती, दोपहर भी निर्मल हुआ करता है । गाँव के विश्वास में दोपहर भी पुण्यकाल होता है । जहाँ शाम वहीं बसेरा, जहाँ जागे वहीं सबेरा । गाँव के देवता-धामी दोपहर का बेसब्री से इंतजार करते हैं कि उनका भक्त किसान खेत-खार में हाड़तोड़ मेहनत के बाद लौटेगा, स्नान करके उसे अवश्य अर्घ्यदान देगा । दोपहर होते-होते बूढ़ों की मंडली दालान में आ जुटती है । कभी महाभारत तो तभी मानस-पाठ या कल्कि पुराण की काव्य -लहरी में पास-पड़ौस श्रध्दा के सुगंध से गर्मा उठता है और इसके साथ हमारे पुरखे-सयाने भी । दोपहर बेटियों के लिये थोड़े हास-परिहास और थोड़े आत्म-विश्वास की भेंट लेकर चला आता है । हमउम्र सहेलियाँ मँगनी या 'तीन दो पाँच ' के लिए ताश के पत्ते फेंटती हैं । किसी ने थोड़ी चालाकी की नहीं कि दूसरा दल रूठ जाता है, फिर मान-मनौवल । ताश समेटकर सब कसाड़ी या साँप-सीढ़ी या फिर लूडो में मगन । मन थोड़ा खेल से उचटा, तो अपने-अपने साथ लाये क्रोसिये और धागों से परदे बुनने में तल्लीन............। परदा ज्यों-ज्यों बुनने लगता है, त्यों-त्यों परदे के उस पार किसी अनजाने प्रियतम का स्निग्ध कलेवर उभरने लगता है ।
धूप एक चाबी है, जिससे स्मृतियों का संदूक खुल जाता है । दो भेले गुड़ और एक लोटा पानी मुझे सबसे पहले याद आता है और इसके साथ ही याद आते हैं -दूर गाँव से पधारे पहुना । पहुना के लिए दोपहर में गुड़-पानी अमृततुल्य होता है । फिर पिताजी का पैबंद लगा छाता और गाँव के मोची से न जाने कितनी बार सिलाये गये जूते ऑंखों में झिलमिलाने लगते हैं । यही असली भारत की तस्वीर है । मन के किसी कोने से एक कड़वाहट उभरती है-आजादी के इतने युग बीत जाने के बाद गाँवों की ऐसी दुर्दशा ? उत्तरदायी कौन-धूप निवासी या छाँव-निवासी ? धूप-निवासी ऐसी हरकत क्यों कर करेगा ? यह तो छाँव निवासियों का चरित्र हैं । दरअसल उन्हें पेड़ से लगाव नहीं होता है।
इधर दोपहर गर्म और तेज हवा की फौज लेकर जंगल-झाड़ी खेत-खार, नदी-नालों से भटकते-भटकते गाँव के हर द्वार पर आ धमकता है उधर गाँव का बेटा सिर पर पागा और तुमड़ी में पानी बांध कर जंगल जा धमकता है । वह दो घड़ी घर मे विलम जाए तो चार-चिरौंजी, डोरी, महुआ, गोंद संघरायेगा कौन ? जीवन का नमक जुटेगा कैसे ? साँझ के घिरते ही दीया-वाती जलेगी क्या ? भगवानो पटेल के पास गिरवी पर पड़े खेत को मुक्ति मिल सकेगी ? बेटे के माथे पर लकीरें उभर आती हैं तो क्या, वह इस समय किसी राजा-महाराजा से कम नहीं जान पड़ता है । माथे पर मुकुट जो है । कंठ पर श्रम बिन्दु माणिक्य-सा चमक हो रहा है । हाथ में अस्त्र (टँ गिया )जो है ।
झुरमुट की आड़ में कोयल की कूक से मन में सुषुप्त तरंगें ऍंगड़ाई लेने लगती हैं। घर पर छोड़ आये नई नवेली का मुखड़ा उसकी ऑंखों में झूलने लगता है और बरबस कोई लोकगीत जनम लेता है-
चाँदी के मुंदरी उलारंव कइसे
मोर जोही तोला बन मा बलावव कईसे ।
मारे ला मछरी धरेला सेहरा
ऑंखी-ऑंखी म झुलथे तोरेच्च चेहरा
भांटा के महुवा दमकी के दार
तोर बिना जिनगी मा नइये सार ।
प्रियतमा के बिलगाव के लपेटों से दोपहर की शिथिल पड़ जाती हैं । जंगल साँय-साँय करने लगता है । अज्ञात भय मन को लीलने लगता है । वह नितांत अकेलेपन की खाई में धँसने लगता है । ऐसे में कौने का काँव-काँव ही उसका संगी-साथी बन जाता है । कड़वी वाणी भी यथासमय रसदार लगती है । है न इसमें दोपहर की भूमिका!
दोपहर की भूमिका को समझ पाना कोई हँसी-मजाक का खेल नहीं । दोपहर का सामर्थ्य उसी के लिए सुलभ होता है, जो दोपहर का स्वागत करता है, उसमें रम जाता है । दोपहर में रमने का मतलब स्थितप्रज्ञता की ओर अग्रसर होना है । स्वयं दोपहर ध्यान की चरममुद्रा है । सूर्य ध्यान में स्थितप्रज्ञता का प्रतीक है । इस समय व्यक्तित्व इतना एकनिष्ठ हो उठता है कि उसकी छाया भी उसी में विलीन हो जाती है । 'एकोऽहं द्वितीयो नास्ति' का सूत्र चरितार्थ हो उठता है । प्रात: और सायंकाल में यह कहाँ संभव हो पाता है ? वहाँ तो व्यक्ति का एक दूसरा रूप भी दिखाई देता है-उसकी परछाई,जो कि भ्रम का कारण भी है । साहित्य में दोपहर का चित्र संत्रासात्मक ही बना रहा । रीतिकालीन कवि सेनापति के अनुपम ग्रीष्म चिंतन को ही लें, जिन्होंने पवन को छाँव का कोई कोना पकड़ा कर दोपहर को कितना भयावह बना दिया है-
मेरी जान पौना सीरी छांह को पकरि कोनौ
धरी एक बैठि कहू् घामो बितवति है ।
कवियों ने दोपहर को त्रासद निरूपित कर उसे जिस तरह त्याज्य समय की श्रेणी में रखा है, वह उनकी एकांगी भावुकता है । मुझे गरमी का दोपहर वाला चेहरा सबसे अधिक रुचता है । छुटपन से ही । ऐसी दोपहर के अनगिनत रंग हैं मेरे मन में । ग्रीष्म की दोपहरी आग का गोला लेकर ही नहीं आती, उसके साथ हम बच्चों को अतिरिक्त स्नान का उपहार भी मिलता है । उन दिनों मुझे त्रिसंध्या का संस्कार भी कहाँ पता था पर सुबह-शाम के अलावा मध्याह्न -स्नान से चुकता भी न था । गरमी इतनी पडती कि घर से दोपहर में फिर से नहाने की स्थायी आज्ञा मिली हुई होती । घर के पास ही तालाब था, मित्रगण के इकट्ठे होने की देरी रहती, फिर जो डुबकी लगती कि जलपाँखी भी किनारा पकड़ लेती । मेरा सिध्दार्थ मन सरस हो उठता । सूर्यदेव की ओर नजरें जातीं, तो वे भी सरल दीखते । मुझे लगता, जैसे उन्हें हमारी जलक्रीड़ा भा गई हो-
इत्थं कुमारस्य सहावरोधै: सलीलमारामविहारभाज:
आलोकनायैव सहस्त्रभानुराकाशमध्यं परमध्यरुक्षत् ।
(सिध्दार्थचरितम्,7/22)
गाँव से लगा हुआ अमरैया हो । सुरसुरी हवा चली, डालें लहराईं नहीं कि पीले-पीले रसीले आम टपकने वाले हों, तो आप ही बताइये कोई घर के भीतर कैद रह पायेगा ? चाहे चैत बौखलाया हुआ क्यों न हो । ऊपर से कोकिल से बतियाने का अवसर हो । चैत की दोपहरी में गाँव के बच्चे भी कोकिल हो जाते हैं । उधर से कोकिल कूकता है, इधर से बच्चे । बचपन के उन दिनों में कोकिल हो जाने का रस ही कुछ और है । एक रस और है मन में -नई नवेली कोकिला को दूर से निहारने का रस । मैं ही क्यों, सारा गाँव उस रस से भींगने के लिए उमड़ पड़ता था । पगडंडी की धूल में आग लगी है तो लगने दो । पाँव में पनही नहीं है तो रहने दो । किसे मतलब है कि बरात किस गाँव की है, कहाँ जा रही है, किस जात की है ? मतलब है तो बस दूल्हे-दुलहिन को एक नजर देखने की । आप भी लें उस परम रस का आनंद - ठंडी और घनी छाया देखकर सारे बरातियों ने अमराई में दोपहर गुजारने का मन बना लिया है । बाजा वाले भी पस्त हो चुके हैं । सकुचायी-शरमायी सी दुलहिन कहे तो किससे कहे कि उसे बड़ी जोरों की प्यास लगी है । यहाँ न माँ है, न छोटी बहन, न ही भाभी । उनसे भी कहे तो कैसे कहे कि अजी सुनिए, डोला रुकवाएँ ना ! लोक की दृष्टि से यह भला बच सकता है ! लोकगीतकार से रहा नहीं जाता । वह गुनगुना उठता है-''जरगे मझनिया के घाम,आमा तरी डोला उतार दे ।'' डोले से दुलहिन को उतारा जाता है । यहाँ दुलहिन के दाई-ददा नहीं तो क्या! इस गाँव में तो बेटियाँ हैं । जहाँ बेटियाँ होगीं, वहाँ महतारी भी होगी । ददा भी होगा। भाई भी होंगे और बहनें भी । देखते ही देखते गाँव से पानी आ जाता है और पानी के साथ लाई-मुर्रा भी । दोपहर बीतते ही बराती हँसते-खिलखिलाते अपने गाँव की ओर चले जाते थे, पर जाने क्यों सारे गाँव को लगता कि उनके घर से एक बेटी विदा हो गई या एक बेटी उनके घर लक्ष्मी बन कर आ गई । अब बरात तो ट्रैक्टर,जीप, बस के बिना निकलती ही नहीं । अब वे गाँव भी कहाँ रहे ! हाँ अमराई वहीं है, पर उस अमराई में दोपहर का सुनसान ही पसरा हुआ है।
दोपहर केवल समय की सामान्य इकाई नहीं । दोपहर की शास्त्रीयता है । वह आततायी रावण के नाश का बीज समय भी है । सृष्टिकर्ता ने रामावतार के लिए न ब्रह्ममुहूर्त की घडी की ओर निहारा, न गोधूलि लगन की प्रतीक्षा की । उसने भरी दोपहरी को ही नियत किया :
मध्य दिवस अति सीत न घामा
पावन काल लोक विश्रामा ।
रामजन्म का समय संघर्षों से विमुखता का समय नहीं हो सकता है । यह उछाह- मंगल का प्रवेशद्वार है । दोपहर मथुरा के ग्वाले-सा आता है, जिसके पास धूप का दूध है । जिन्हें संपुष्ट होना हो ,जिन्हें कंस से जूझना हो,वे जितना चाहें पी लें, कभी नहीं ख्रघने वाला । आजकल के पढ़े-लिखों को, अपनी गोरी काया की माया में उलझे रहने वालों को समझ में आये, न आये, गाँव आज भी दोपहर का माहात्म्य बखूबी समझता है और मेरे जैसे किसी गाँव में पला- बढ़ा कवि संतोषरंजन भी –
आतप की ज्वाला में जलते
पेड़ों पर फिर भी हरियाली ।



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