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मुझे विदुर चाहिए

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हे भीष्म!

आप महा हैं, धर्मात्मा हैं, ज्ञानी हैं, वीर हैं
पितृभक्त हैं, बुजुर्ग हैं, संत हैं, खंड ब्रह्मचारी हैं
अष्ट वसुओं में श्रेष्ठ हैं, नके अवतार हैं

आप देवी गंगा मैया के पुत्र हैं
आपको कोई हरा हीं सता
परशुराम को भी आप उनकीकात बता सते हैं

निश्चय ही आप महाता के शिर पुरुष हैं
लेकिन आप मेरे किकाके हैं?

क्योंकि
आप
के सामने ही द्रौपदी का जब अपमा किया जाएगा
तब आप अपनी आँखें मूँद लेंगे
कोनारी जब अपनी लाज बचाने के लिए गुहार लगागी
तब अपने आस से आप हिलेंगे भी हीं
जब आपके सामने ही कृष्ण को बंदी बनाने की कोशिश होगी
तब भी आप कुछ हीं सकेंगे
जब कर्ण का कुगोत्र पूछा जाएगा
और मुक़ाबले से उसे बाहर र दिया जाएगा
तब भी आप अपने गुरुभाई की सहायता हीं रेंगे
आप तो अर्धरथी र उसे अपमानिने की नीचता दिखाएंगे

र्मयुद्ध में आप पांडवों का साथ देने की हिम्मत हीं जुटा पाएंगे
अंबा को अपहर के लाएंगे पर शादी ने से इंकार र देंगे!
आपका सारा ज्ञा बेकार है,
आपकाखंड ब्रह्मचर्य व्यर्थ है
आपकी वीरता बेमानी है,
आपकी पितृभक्ति अनुकरणीय नहीं है
आप किसी काके हीं हैं
आपके मूल्य और आदर्श वरेण्य हीं हैं
यु पर आप भारस्वरूप हैं
आपका होना होना बराबर है
ए यु में आपकी कोई जरूरत हीं है

आप विदा हो जाइए
आपको तो इच्छामृत्यु का वरदा है;
आप स्वेच्छा से चले जाइए।
आप सड़ी-ली व्यवस्था के पोष हैं
आप व्यवस्था से अंधों की तरह बंधे हुए हैं
व्यवस्था आपको चा रही है
व्यवस्था के आप गुलाम हैं
व्यवस्था के इशारे पर आप हर कुकर्म ने को राजी हैं
व्यवस्था के हर कुकृत्य के आप मू साक्षी हैं, सहयोगी हैं
आप धन्य
हैं,
आपको धिक्कार है!

मुझे चाहिए विदुर
वह दासीपुत्र, विनी, अभिमाशून्य
समझदार, नीतिनिपु, नीतिपराय
सत्यवादी, सत्यकामी, सत्यधर्मी
वही सच्चा वीर है
अपने सामने वह कोई अन्याहीं होने दे सता
द्रौपदी के अपमा का मू, बेबस साक्षीने रहना उसे वारा हीं है
किसी भी वक्त व्यवस्था को छोड़ सकने की तैयारी उसकी है
व्यवस्था का वह गुलाम हीं है
वह लत का, असत्य का, न्या
का हमेशा विरोधी रहा है
वह कुर्सी छोड़ देगा पर अपना ज़मीर हीं छोड़ेगा
मुझे वही चाहिए

मैं केशव की तरह उसके घर सा-रोटी खाना पसंद रूँगा
और अपने हृदय में उसके प्यार को हमेशा बसार रखूंगा
भीष्म! मुझे आप हीं,
मुझे तो विदुर चाहिए।

साभार: http://srijanshilpi.com/index.php?paged=4

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