Home | साहित्य | तुम मेरे होकर रहो कहीं…
Newsletter
Email:

तुम मेरे होकर रहो कहीं…

Font size: Decrease font Enlarge font
स्व.रमानाथ अवस्थीजी उन गीतकारों में से थे जिनको सुनते समय लगता था मानों समय ठहर गया है। उन्हीं की स्मृति में यह लेख लिखकर मैं अपनी जिंदगी के उन दुर्लभ क्षणों दुबारा महसूस करने का प्रयास कर रहा हूं जो मैंने रमानाथ जी के साथ या उनकी कविता सुनते हुये जिये। लेख की कवितायें रमानाथजी की कविताओं के संकलन आखिर यह मौसम भी आया से ली गई हैं। लेख की सामग्री भी काफी कुछ इसी पुस्तक की कन्हैयालाल नंदन जी द्वारा लिखित भूमिका से जस की तस ली गई है। बाकी के कुछ अंश मेरी स्मृतियों के हैं। अगर रमानाथजी की झलक मैं अपने पाठकों को दिखाने में सफल हो सका तो अपने को खुशनसीब समझूंगा।

सन्‌ १९८५-८६ की बात होगी शायद। मैं बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से एम.टेक. कर रहा था। शायद काशी यात्रा का मौका था। कवि सम्मेलन हो रहा था। काफी कवि पढ़ चुके थे। फिर संचालक ने तमाम तारीफ के साथ एक कवि को बुलाया। भीड़ तथा तारीफ इतनी हो गई कि मुझे कवि का नाम ठीक से सुनाई न दिया। कवि ने भी बिना किसी ताम-झाम तथा लटके-झटके के केवल ,कविता प्रस्तुत कर रहा हूं कहकर ,शुरु किया:-

सो न सका कल याद तुम्हारी आई सारी रात
और पास ही बजी कहीं शहनाई सारी रात ।

गीत के बोल हमें चमत्कृत करते से लगे ।आगे की पंक्तियां लगा कि जिंदगी का व्याकरण समझा रहीं हों:-

गगन बीच रुक तनिक चन्द्रमा लगा मुझे समझाने
मनचाहा मन पा लेना है खेल नहीं दीवाने।

गीत के साथ हैसियत की जानकारी बढ़ी:-

रात लगी कहने सो जाओ देखो कोई सपना
जग ने देखा है बहुतों का रोना और तड़पना ।

लेकिन जीत का सुख भी मिला:-

मुझे सुलाने की कोशिश में जागे अनगिन तारे
लेकिन बाज़ी जीत गया मैं वे सबके सब हारे।

यह कविता तब से सैकड़ों बार सुन चुका हूं। कविता की कशिश कुछ ऐसी है कि खत्म होते ही दुबारा गुनगुनाने का मन करता है।बाद में पता चला कि गीतकार थे स्व.रमानाथ अवस्थी।जिन्होंने उनके गीत सुने है वे ही उनको महसूस कर सकते हैं। बाकी लोग केवल कल्पना कर सकते हैं।रमानाथ जी की स्मृतियों के बारे में बताते हुये डा.कन्हैयालाल नंदन लिखते हैं:-

अजब रसायन की रचना लगते हैं मुझे पंडित रमानाथ अवस्थी,जिसमें पांच ग्राम निराला,सात ग्राम बाबा तुलसीदास,दो ग्राम कबीर और डेढ़ ग्राम रविदास के साथ आधा ग्राम ‘ठाकुरजी’ को खूब बारीक कपड़े से कपड़छान करके आधा पाव इलाचंद्र जोशी में मिलाया जाए तथा इस सबको अंदाज से बच्चनजी में घोलकर खूब पकाया जाए। रमानाथजी का मानसिक रचाव कुछ ऐसे ही रसायन से हुआ है।वे निराला के स्वाभिमान को अपने अंतर्मन में इतना गहरे जीते हैं कि अनेक लोग सकते मेंआ जाते हैं।

रमानाथ जी की कविता की खासियत है कि लगता है जैसे बतियाते अंदाज में वाक्य उठाकर कविता पंक्ति बना दिये गये हैं। उनकी एक कविता है:-

तुमने मुझे बुलाया है ,मैं आऊँगा
बंद न करना द्वार देर हो जाये तो

उसी में आगे है:

मेरे आने तक मन में धीरज धरना
चाँद देख लेना मन घबराये तो।

इसी के साथ अंतिम संकल्प विश्वास भी है:

मेरा और तुम्हारा मिलना तो तय है
शंकित मत होना यदि जग बहकाये तो।

बंद न करना द्वार के नाम से कविता संग्रह भी छपा था रमानाथ जी का। धर्मयुग में एक बार होली पर प्रसिद्ध पुस्तकों के नाम की पैरोडी छपी थीं। तब लिखा गया:-

बंद न करना द्वार -चाहे सो भले जाना।

सहज विश्वासी-आस्तिक रमानाथ जी कहते हैं:-

करने वाला और है,किसी को क्यों पुकारूँ
जीवन की नाव किसी घाट क्यों उतारूँ।

वे पराजित-मन जरूर नहीं जीते,लेकिन योद्धा-मन होकर समर भी नहीं करते। रडियो के अपने कार्यकाल में उन्हें प्रशासन के हाथों अन्यायवश अपमान की स्थितियों तक भी पहुंचा दिया, तब भी वे इसी पर डटे रहे कि:-

टूटने का दर्द जहाँ समझा न जाये
ऐसी दुनिया को किस वास्ते सँवारूँ।

दुनियावी चाल-चलन का उनको बखूबी अंदाजा है:-

चंदन के वन में आग लगी
खुशबू उड़ कर पहले चल दी
दुर्दिन में अपनों के जाने की
होती है कितनी जल्दी

उनकी सहज स्वीकारोक्तियां सहज विश्वसनीय हैं:-

देवता तो हूं नहीं स्वीकार करता हूं।
आदमी हूं क्योंकि मैं तो आदमी को प्यार करता हूं।

…और प्यार करते हैं तो इतना करते हैं कि अपने प्रेयस के बिना कोई सपना मुकम्मल नहीं मानते और बिना ऐसे सपने के कोई रात बिताना नहीं चाहते :-

बीते सपनों में आये बिना तुम्हारे
ऐसी तो कोई रात नहीं जीवन में।

उनकी मान्यता है कि ऐसी प्रीति के लिये प्रेयस का पास होना जरूरी नहीं है,मन की नजदीकी बहुत है:-

तन की दूरी क्या कर लेगी
मन से पास रहो तुम मेरे।

इसी विश्वास और अधिकारभाव को शब्द देती उनकी बहुत प्रसिद्ध कविता है:-

तुम मेरे होकर रहो कहीं
मैं बहुत -बहुत खुश
तनिक-तनिक नाराज ।

तुम शीतल शीतल छांह
प्रीति के झुलसे झुलसे वन में
तुम चांदी के से फूल
धुएं से काले-काले घन में।

तुम मेरे होकर खिलो कहीं,
मैं बहुत-बहुत खुश
तनिक-तनिक नाराज।

प्यार के इस समूचे जीवन -व्यापार में दर्द ही ज्यादा मिलता है । उसे भी वे धनात्मक रूप में लेते हैं:-

दुनिया बेपहचानी ही रह जाती
यदि दर्द न होता मेरे जीवन मे।

रमानाथ जी कविता में तात्कालिकता से परहेज करते थे। लेकिन उनकी तमाम सार्वभौमिक कवितायें लोगों को अपनी ही बात कहती दिखती हैं। जब चन्द्रशेखरजी प्रधानमंत्री थे तो स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर उन्होंने लालकिले से कविता पढ़ी:-

मेरे पंख कट गये हैं
वरना मैं गगन को गाता।

जब उन्होंने पढ़ा:-

वह जो नाव डूबनी है
मैं उसी को खे रहा हूं,
तुम्हें डूबने से पहले
एक भेद दे रहा हूं।

मेरे पास कुछ नहीं है
जो तुमसे मैं छिपाता।
मेरे पंख कट गये हैं
वरना मैं गगन को गाता।

तो चन्द्रशेखरजी को लगा तथा बाद में उन्होंने पूछा भी रमानाथ जी से क्या ये पंक्तियां खासतौर से उनके लिये लिखीं गई हैं। बाद में उनकी सरकार गिर गई थी।

उनकी कविता धुयें का रंग है:-

चाहे हवन का हो
या कफन का हो
धुयें का रंग एक है!

किसी का अलगाव क्या
किसी का पछताव क्या
अभी तो और सहना है!

चाहे हो महलों में
चाहे हो चकलों में
नशे की चाल एकहै!

किसी को कुछ दोष क्या!
किसी को कुछ होश क्या!
अभी तो और ढलना है!

शाहजहांपुर में दशहरे के बाद हमेशा कवि सम्मेलन-मुशायरा कराया जाता है। एक बार मन किया कि रमानाथ जी को बुलाया जाये। संपर्क करने पर मंजूरी तो दे दी लेकिन यह भी शर्त कि साथ में नंदन जी को बुलाओगे तो आयेंगे। दोनों लोग आये । उन्हीं दिनों बायपास सर्जरी हुई थीं। काफी देखभाल की जरूरत थी सो हमारे घर में ही ठहरे।हमारा घर पुराना टाइप का बंगला था वहां। चारो तरफ पेड़ ,हरियाली देखकर खूब खुश हुये। जाड़े के दिन थे। धूप में बैठे रहे काफी देर।

नंदनजी को तो पत्रकार घेरे रहे साक्षात्कार के लिये। रमानाथ जी शाम को हमें समझाते हुये बोले :-

आप लोग रोज थोड़ी देर यूं ही अपने आसपास प्रकृति को देखा करें। बादलों को देखा करें। हवा को महसूस किया करें। मन बहुत अच्छा महसूस करेगा।

बायपास सर्जरी के कारण गाकर कविता पढ़ने से वो परहेज करने लगे थे। हमने उनसे कवितायें सुनाने का अनुरोध किया। पहले तो उन्होंने ऐसे ही पढ़कर कुछ सुनाया। फिर जब हमारी श्रीमतीजी ने ये पीला वासंतिया चांद गाकर सुनाया तो वे खुश हो गये। तथा कविताओं की कुछ पंक्तियां गाकर सुनाईं।

रात को कवि सम्मेलन में जब वे पढ़ने को खड़े हुये। तो आम आशीर्वाद मांगने के बहाने तालियों की मांग करने वाले कवियों के विपरीत वे बोले:-

आप अपने हाथों को बिल्कुल कष्ट न दें। गले पर बिल्कुल जोर न डालें। आप सिर्फ सुनें। कविता से जुड़ेंगे तो मुझे अच्छा लगेगा।

यह कहकर उन्होंने गुनगुनाना शुरु किया:-

आज इस वक्त आप हैं,हम हैं
कल कहां होंगे कह नहीं सकते।
जिंदगी ऐसी नदी है जिसमें
देर तक साथ बह नहीं सकते।

सारे श्रोता शान्त हो गये। आगे उन्होंने सुनाया तो लगा कोई सन्त कह रहा हो:-

वक्त मुश्किल है कुछ सरल बनिये
प्यास पथरा गई तरल बनिये।
जिसको पीने से कृष्ण मिलता हो,
आप मीरा का वह गरल बनिये।

जिसको जो होना है वही होगा
जो भी होगा वही सही होगा।
किसलिये होते हो उदास यहाँ
जो नहीं होना है नहीं होगा।

हमारे कान तृप्त हो गये।

महानगर उनको रास न आते थे। वे कहते थे:-

सड़कों पर मेरे पांव हुये कितने घायल
यह बात गाँव की पगडण्डी बतलायेगी
सम्मान सहित हम कितने अपमानित हैं
यह चोट हमें जाने कब तक तड़पायेगी।

शहरों में रहने के बारे में कहते थे:-

भीड़ में भी रहता हूं वीरान के सहारे
जैसे कोई मंदिर किसी गांव के सहारे।

सन् १९४७ में जब देश की धरती का बंटवारा हो गया तो भी उनका स्वर सार्वभौम तत्व से अलग नहीं हुआ।उसी समय दिल्ली में एक कवि सम्मेलन हुआ जिसमें इसी विषय पर कविता पढ़नी थी। रमानाथ जी ने पढ़ा:-

धरती तो बंट जायेगी
पर नीलगगन का क्या होगा?
हम तुम ऐसे बिछड़ेंगे
तो महामिलन का क्या होगा?

कविता को सुनकर कहते हैं मंच पर अनेक लोगों की आंखे भर आयी थीं,खासकर पाकिस्तान से आये शायरों की। यह थी रमानाथ जी के शब्दों की शक्ति।

रमानाथ जी को लोग गीत ऋषि कहते थे। वे बहुत सरल हृदय,बहुत सहज आत्मा थे। सिर्फ दो दिन मेरे घर रहे थे लेकिन जब भी कभी बात करता तो सारे घर का हालचाल पूछते थे। वायदा किया था कि अगले साल जाड़े में आऊंगा धूप सेंकने कुछ दिन तुम्हारे यहां।

लेकिन वे सशरीर आ न पाये। शायद इसी दिन के लिये उन्होंने कहा था:-

आज इस वक्त आप हैं,हम हैं
कल कहां होंगे कह नहीं सकते।
जिंदगी ऐसी नदी है जिसमें
देर तक साथ बह नहीं सकते।

आगे फिर न आ पाने की चेतावनी भी दे गये थे:-

आपने चाहा, हम चले आए
आप कह देंगे,हम लौट जाएँगे।
एक दिन होगा,हम नहीं होंगे
आप चाहेंगे ,हम न आएँगे।

उनका शरीर भले चला गया हो लेकिन उनकी स्मृतियां हमेशा बनी रहेंगी। इसी विश्वास से मैं उन्हें आज ८ नवंबर को उनके जन्मदिन उन्हीं की कविता-पंक्तियों के माध्यम से श्रद्धापूर्वक स्मरण कर रहा हूं:-

मैं पुकारूंगा तुम्हें हर बोल में ,बोलो न बोलो।

मेरी पसंद

मेरी रचना के अर्थ बहुत से हैं
जो भी तुमसे लग जाये लगा लेना।

मैं गीत लुटाता हूं उन लोगों पर
दुनिया में जिनका कोई आधार नहीं
मैं आंख मिलाता हूं उन आंखों से
जिनका कोई भी पहरेदार नहीं ।

आंखों की भाषायें तो अनगिन हैं
जो भी सुंदर हो समझा देना।

पूजा करता हूं उस कमजोरी की
जो जीने को मजबूर कर रही है
मन ऊब रहा है अब उस दुनिया से
जो मुझको तुमसे दूर कर रही है।

दूरी का दुख बढ़ता ही जाता है
जो भी तुमसे घट जाये घटा लेना।

कहता है मुझसे उड़ता हुआ धुआँ
रुकने का नाम न ले तू उड़ता जा
संकेत कर रहा नभ वाला घन
प्यासे प्राणों पर मुझ सा गलता जा।

पर मैं खुद ही प्यासा हूं मरुथल सा
यह बात समंदर को समझा देना।

चांदनी चढ़ाता हूं उन चरणों पर
जो अपनी राहें आप बनाते हैं
आवाज लगाता हूं उन गीतों को
जिनको मधुवन में भौंरे गाते हैं।

मधुवन में सोये गीत हजारों हैं
जो भी तुमसे जग जायँ जगा लेना।

साभार : http://hindini.com/fursatiya/?p=64

Comments (1 posted):

इला on 15 June, 2007 02:31:24
avatar
बहुत ही सुन्दर संस्मरण । यदि फ़ुरसतिया जी ने स्व. रमानाथ अवस्थी जी की कविताएँ उनकी आवाज में टेप की हों तो इस कैफ़े में आनेवालों को भी उन्हें सुनने का सौभाग्य दें । इस रचना को पढ़कर यह भी समझ में आया कि अनूप शुक्ला जी साहित्य से क्यों और कैसे जुड़ गए। सब संगति का असर है !

Post your comment comment

Please enter the code you see in the image:

  • email Email to a friend
  • print Print version
  • Plain text Plain text
Tags
No tags for this article
Rate this article
1.60