यह कवि अपराजेय निराला
निराला ने बीस साल की उमर होते-होते अपनी पत्नी, भाई और तमाम परिवारी जनों को खो दिया था। पत्नी के जीवित रहते उन्होंने उनकी कद्र न की। उनके बालों को लेकर उन पर ताने कसे। गोस्त खाने के पीछे गढ़ाकोला में अपने साथ रहना दूभर कर दिया। अपने निठल्लेपन के कारण एन्ट्रेन्स परीक्षा न पास कर पाये। इससे अपने साथ उन्हें भी अपमानित कराकर घर से निकले। पर वह कितनी उदार थीं! कभी पति या ससुर के रूखे व्यवहार की शिकायत न की। मात्र अठारह की उम्र में संसार छोड़कर चलीं गयीं। कैसा सुन्दर कंठ, कैसा म्रदुल स्वभाव,कैसा सात्विक सौन्दर्य! निराला ने देखा कि उनके हृदय में पत्नी के प्रति अगाध प्यार है। यह प्यार अब तक क्यों नहीं दिखाई दिया था? किस मोह ने उनकी आंखों पर पर्दा डाल दिया था? क्या मृत्यु ही यह पर्दा उठा सकती थी कि वह मनोहरा देवी की वास्तविक छवि देखें?
निरालाजी के बारे में पोस्ट किये मेरे पिछले लेख पर साथियों की प्रतिक्रियाओं को देखते हुये निरालाजी के बारे में और जानकारी देने का मन किया। यहां मैं उनके जीवन के उन पक्षों की जानकारी देने का प्रयास करना चाहता हूं जिनसे उनके मानसिक संतुलन खोते जाने के कारणों के संकेत मिलते हैं। यहां मैं फिर से स्पष्ट कर देना चाहता हूं उसमें से मेरा कुछ भी लिखा हुआ नहीं है। अधिकांश सामग्री स्व. डा. रामविलास शर्मा जी के द्वारा लिखित ‘निराला की साहित्य साधना’ से ली गयी है। यह किताब अद्भुत है। अगर रामविलाश शर्माजी ने यह किताब न लिखी न होती तो शायद निरालाजी के बारे में आज सम्यक जानकारी न मिलती। शायद अपने जीवन में घटी घटनाऒं के अतिरंजित वर्णन से निरालाजी एक अबूझ पहेली बनकर रह जाते। मेरा योगदान केवल इस पुस्तक में से जो ज्यादा जरूरी लगा उसे पोस्ट करने तक है इससे अधिक कुछ नहीं. - फुरसतिया |
अपने बच्चों को सास के पास छोड़कर वे काम में जुट गये। साधना पथ पर अपने को समर्पित कर दिया।
निरालाजी की आर्थिक स्थिति कभी ऐसी नहीं रही कि आराम की जिंदगी जी सकें। कष्टों में जीवन चल रहा था।
इसी बीच अपनी पुत्री सरोज के विवाह की चिंता भी उन्हे सता रही थी। सरोज अपनी नानी के साथ रह रही थी। अपने एक मित्र को उन्होंने सरोज के लिये लड़का देखने के लिये लिखा। उनके मित्र दयाशंकर बाजपेयी ने अपने दोस्त शिवशेखर द्विवेदी से सरोज के विवाह के लिये पहले हामी भरी फिर द्विवेदीजी सूचित किया। इस बारे में द्विवेदीजी लिखते हैं:-
उनकी (निरालाजी) कामना थी कि सरोज का विवाह पास-पडो़स के किसी कुलीन घर में हो जाये। दो एक जगह उन्होंने चर्चा भी की। तब उन्होंने हमारे लिये श्री दयाशंकर बाजपेयी को लिखा। बाजपेयीजी ने हमें कुछ बताने से पहले ही स्वीकृति भेज दी। फिर हमें बताया। इसके तीन माह बाद हमें गड़ाकोला जाने का समाचार मिला। हम बहुत ही श्रद्धा करते थे। हम गये और वहां जाकर देखा, कुछ भी पास नहीं है। सिर्फ नब्बे रुपये हमारे पास थे। यही धन हमारी शादी में सहायक था। बिना किसी आडम्बर के उन्होंने जैसा चाहा,वैसा हमने किया। पुरोहित को मनोनुकूल देने में असमर्थ थे। इसीलिये वे (निराला) खुद पुरोहित थे। माली का काम भगवान वेदव्यास और महाकवि तुलसीदास ने किया-गीता रामायण ही मौर्य-मौरी थे।
सरोज की शादी के ड़ेढ़ साल बाद गौना हुआ। बाद में वे बीमार हो गयीं। साल भर बीमार रहीं। पता चला बायां फेफड़ा छलनी हो गया है। वैद्यों ने कहा उसे गंगा धारा में रखना चाहिये। निराला को पैसों की सख्त जरूरत थी। लेकिन कुछ इंतजाम न हो पा रहा था। प्रकाशक अपने अर्थभाव का रोना रो रहे थे। बाद में सरोज की मौत हो गयी। इस घटना के बारे में डा. रामविलास शर्मा लिखते हैं:-
गर्मी बीत चुकी थी। वर्षा का आरम्भ था।
डाकिये ने आवाज दी-पंडितजी।
वह खुद ही नीचे गये।
लौटते हुये जीने से ही बोले-डाक्टर सरोज इस नो मोर।
मैं हत्बुद्धि- सा बैठा रहा। वह कार्ड लिये कमरे में आये। मैंने एक बार उनके चेहरे की तरफ़ देखा, दुख के मारे जैसे स्याह हो गया हो।
उन्होंने एक आंसू न गिराया, एक शब्द भी न कहा। कुछ देर कमरे में चक्कर लगाते रहे। फिर कुर्ता पहना,छड़ी उठाई और घर से बाहर निकल गये। सरोज की मौत ने निराला के सारे जीवन की सार्थकता और निर्थकता का प्रश्न विकट रूप में उनके सामने रख दिया। जियें तो किसके लिये। अब तक जीकर जो कुछ झेलते रहे उसका क्या फल मिला? महिषादल में नौकरी करते रहते तो बेटी की यह दुर्दशा नहीं होती। सब-कुछ छोड़ा साहित्य के लिये लेकिन साहित्य सेवा के लिये हमेशा पेट के लाले रहे।आलोचना सुनने से मालूम होता है कि हिंदी में लिखकर निराला ने भारी अपराध किया है। नेकनामी कम बदनामी ज्यादा मिली।
इसी मन:स्थित में रहे होंगे निराला जब उन्होंने राम की शक्ति पूजा में लिखा-
धिक जीवन जो पाता ही आया विरोध,
धिक साधन, जिसके लिये किया सदा ही शोध।
खून में किसी ने जहर घोल दिया है और वह जल रहे हैं। निराला ने मन की सारी ताकत बटोरकर अपने को दुख से अलग किया। खुद से अलग किया। खुद को देखा-दुखी, उदास, जर्जर। और अपना यह रूप देखकर उनका मन सजग हुआ। अन्तस में जमे हुये दुख को निराला ने सहेजना शुरू किया, उसे निहारते-समेटते निराला अनजाने ही उसे मूर्त रूप देने लगे। उन्होंने कविता लिखी- सरोज स्मृति|
सरोज स्मृति में निरालाजी ने अपनी पुत्री के तमाम चित्र खींचते हुये अपने बारे में भी लिखा है। उनकी अपनी कथा है यह। उन्हें जब याद आया कि कुंडली में लिखे भाग्य अंक को मिटाने का फैसला लिया था, दूसरा विवाह नहीं करेंगे यह तै किया था ,तब अपने पुरुषार्थ पर गर्व हुआ और उन्होंने लिखा-
खंडित करने को भाग्य अंक, देखा भविष्य के प्रति अशंक।
दुनियादारी में असफल रहे पिता का दर्द व्यक्त किया-
धन्ये, मैं पिता निरर्थक था,
कुछ भी तेरे हित कर न सका!
जाना तो अर्थागमोपाय
पर रहा सदा संकुचित-काय
लखकर अनर्थ आर्थिक पथ पर
हारता रहा मैं स्वार्थ समर।
सम्पादकों के हाल बयान किये-
कवि जीवन में व्यर्थ भी व्यस्त
लिखता अबाध गति मुक्त छन्द,
पर सम्पादकगण निरानन्द
वापस कर देते पढ़ सत्वर
रो एक-पंक्ति-दो में उत्तर।
ब्राह्मणों को कोसा :-
ये कान्यकुब्ज-कुल-कुलाड्गार;
खाकर पत्तल में करें छेद,
इनके कर कन्या, अर्थ खेद,
इस विषय-बेलि में विष ही फ़ल,
यह दग्ध मरूस्थल-नहीं सुजल।
परेशानी के बावजूद अपात्र से अपनी कन्या का वरण न करने की बात याद की-
कल घ्राण-प्राण से रहित व्यक्ति
हो पूजूं, ऎसी नहीं शक्ति।
ऎसे शिव से गिरिजा-विवाह
करने की मुझको नहीं चाह।
इस कविता का सबसे उल्लेखनीय पक्ष कवि पिता के द्वारा अपनी पुत्री का सौन्दर्य वर्णन करना लगता है। प्रेमिका, प्रेयसी के सौन्दर्य वर्णन के विपरीत यहां कवि होने के अलावा पिता की मर्यादा की चुनौती थी। निरालाजी ने लिखा-
बाल्य की केलियों का प्रांगण
कर पार, कुंज-तारूण्य सुधर
आयी, लावण्य-भार थर-थर
कांपा कोमलता पर सस्वर
ज्यों मालकौश नव वीणा पर :
नैश स्वप्न ज्यों तू मन्द-मन्द
फ़ूटी ऊषा जागरण-छन्द,
कांपी भर निज आलोक-भार,
कांपी वन, कांपा दिक प्रसार।
परिचय-परिचय पर खिला सकल-
नभ, पृथ्वी,द्रुम,कलि, किसलय-दल।
युवा पुत्री के लिये लिखी ये लाइने मैंने पहली बार तीस वर्ष पढ़ीं थीं और आज भी याद करता हूं-
उर में भर झूली छबि सुन्दर,
प्रिय की अशब्द श्रंगार-मुखर
तू खुली एक-उच्छ्वास-संग,
विश्वास-स्तब्ध बंध अंग-अंग,
नत नयनो से आलोक उतर
कांपा अधरों पर थर-थर-थर।
पर जैसे-जैसे कविता के अंतिम चरण की ऒर पहुंचे, उनका धैर्य टूट गया, प्रकाश देखने वाले कवि का सपना चूर हो गया-
मुझ भाग्यहीन की तू सम्बल,
युग वर्ष बाद जब हुयी विकल।
पर इसके बाद क्या हुआ ,निराला में कहने की सामर्थ्य न रही। वाक्य विश्रंखल हो गया-
दुख ही जीवन की कथा रही,
क्या कहूं आज जो कही नहीं।
निराला ने हिन्दी को, हिन्दी-साहित्य सेवा को, अपने को शाप दिया-
हो इसी कर्म पर वज्रपात
यदि धर्म, रहे नत सदा माथ
इस पथ पर, मेरे कार्य सकल
हों भ्रष्ट शीत के-से शतदल!
कन्ये, गत कर्मो का अर्पण
कर, करता मैं तेरा तर्पण!
जब निरालाजी ने रामविलासजी को कविता पढ़ाई उसके बारे में उन्होंने लिखा-कविता पढ़कर मैंने चुपचाप उसे एक तरफ़ रख दिया। उनकी तरफ़ देखने का साहस मुझमें न था। उन्होंने नहीं पूछा-कैसी है? मैंने नहीं कहा-सुन्दर है।
उन दिनों की निराला की मन:स्थिति के बारे में बताते हुये रामविलासजी ने लिखा- वह आलोचकों के लिये कहते-जिसे देखो, वही निराला को देखकर टिल-टिलाता है।
निराला मानो जीते हुये मृत्यु का अनुभव कर रहे थे। प्रसाद की पंक्तियां वह बड़े दर्द से पढ़ते मानो वह सब प्रत्यक्ष देख रहे हों जो प्रसाद ने देखा था, जो साधारण
लोगों की आंखों से ओझल था-
चढ़कर मेरे जीवन रथ-पर
प्रलय चल रहा अपने पथ पर
मैंने निज दुर्बल पदबल पर
उससे हारी होड़ लगाई।
आह वेदना मिली विदाई।
निराला के मन में व्यथा के केन्द्र कौन थे, वे कब सक्रिय हो उठते हैं, यह सब रहस्य था। अपने दुख की बातें सुनाकर दूसरों को दुखी करना उनके स्वभाव में न था। पर वह किस तरह की पंक्तियां गुनगुनाते हैं, उनके स्वर से, उनकी आखों से मैं समझने लगा था कि इन्हें घोर मानसिक कष्ट है। वे धीरे-धीरे दुखी आवाज में गालिब का शेर गुनगुनाते:
रहिये अब ऐसी जगह चलकर जहां कोई न हो,
हम-सुखन कोई न हो और हम जबां कोई न हो।
बेदरो दीवार-सा इक घर बनाना चाहिये,
कोई हमसाया न हो और पासबां कोई न हो।
पड़िये गर बीमार तो कोई न हो तीमारदार,
कोई अगर मर जाये तो नौहख्वां कोई न हो।
धीरे-धीरे निराला के मन में विषाद भरता चला गया। उनके परम प्रिय मित्र बलभद्र दीक्षित’पढ़ीस’ का देहावसान हुआ। उन्होंने अपने आदर्शों के अनुसार सरकारी नौकरी छोड़कर जनता के बीच रहकर उसे शिक्षित करने, उसी की तरह खेतों में काम करने और गांव में रहते हुये साहित्य लिखने का निश्चय किया। पढी़सजी ने कुलीन ब्राह्मणों की रूढ़ियां तोड़कर हल की मुठिया पकड़ी। अछूत बालकों को घर पढ़ाने लगे। उनके दुबले-पतले मुख पर परिश्रम की थकान दिखने लगी पर आंखों में नई चमक आयी, वाणी में नया ओज आया। बलभद्र प्रसाद दीक्षित के देहावसान पर निराला ने लिखा:-
दीक्षित के लिये बहुत सोचता हूं, मगर वह नस मेरी कट चुकी है जिसमें स्नेह सार्थक है। अपने आप दिन-रात जलन होती है। किसी से अपनी तरफ़ से प्राय: नहीं मिलता। मिल नहीं सकता। कोई आता है तो थोड़ी सी बातचीत। आनेवाला ऊब जाता है। मुझे भी बातचीत अच्छी नहीं लगती।कभी रात भर नींद नहीं आती। तम्बाकू छूटती नहीं। खोपड़ी भन्नाई रहती है। चित्रकूट में एक दफा बीमारी के समय छोड़ दिया था खाना, फिर आदत पड़ गयी।
बाद में इलाहाबाद में रहते हुये निराला और फिराक में दोस्ती हो गयी। निराला फिराक के यहां जाते, कभी बहस करते, धमकाते- इस तरह लिखोगे तो अभी सर के बल खड़ा करेंगे।
निराला के अर्थाभाव चल रहे थे तो उनको सहयोग करने वाले भी आगे आ रहे थे। जबलपुर की हितकारिणी संस्था ने निराला को आमंत्रित किया। सुभद्राकुमारी चौहान ने उन्हें देने के लिये तीन सौ रुपये की निधि एकत्रित की। निराला ने विद्यार्थियों से कुछ भी लेने से इन्कार कर दिया। लोगों के आग्रह करने पर राह-खर्च के लिये सौ रुपये रख लिये। दो सौ कांग्रेस को दे देने को कहा। जब उन्हें बताया गया कि कांग्रेस की रकम सरकार जब्त कर लेती है तब उन्होंने दो सौ रुपये जबलपुर के साहित्य संघ को दे दिये।
निराला के एक परम भक्त उन्हें कवि-सम्मेलन में बुलाने आये। सब बातें हो गयीं। भक्त लेखक भी थे, निराला उन्हें मित्रवत मानते थे। संकोचवश पेशगी रुपया न मांग सके। जाड़े के दिन थे। निराला के पास गरम कपड़ों, रजाई-बिस्तर वगैरह की कोई उचित व्यवस्था न थी। भक्त के जाने पर वह बोले- द्याखौ सारे का, कहत है हुआं यहु द्याव, वहु द्याब। हुआं तक जाई कैसे? न गद्दा, न रजाई, न जूता न जड़ावर।
धीरे-धीरे निराला की हालत खराब होती गयी। लेकिन निराला का मन हारकर भी न हारा था, थके हुये मन में हास्य और व्यंग्य का स्रोत सूख न पाया था। परिवेश से जो कुछ कुछ देखते-सुनते थे, उससे विवेकवाला तार जोड़कर वह अब भी हंसते थे।
निराला दारागंज (इलाहाबाद) की गली में घुटनों तक लुंगी बांधे टहलते हुये, अक्सर अपने से बातें करते हुये देखे जाते थे। अब वह आवेश में जोर से कम बातें करते थे, धीरे-धीरे बुदबुदाते ज्यादा थे। वे लोगों से अक्सर अंग्रेजी में बात करने लगे थे। रेणुजी ने पूछा-आप हिंदी में क्यों नहीं बोलते? इस पर क्रुद्ध होकर उन्होंने कहा- No, I hate the language like hell. रेणुजी ने उनकी तुलसीदास कविता की प्रशंसा की। निराला ने कहा- No, it is nothing but trash. रेणुजी और उनके साथियों को मठा पिलाया; स्वयं पानी पीकर रह गये।वह हिंदी को , कवि निराला के व्यक्तित्व को अस्वीकार कर रहे थे। अपने लिये नित नये-नये नाम चुनते। कलम से अपना नाम लिखने पर आपत्ति करते। इसी सिलसिले में वे अपने जन्म के बारे में कथायें गढ़ रहे थे।
इसी तरह के ध्यान में एक दिन वह बच्चन के यहां पहुंच गये। वहां सुमित्रानन्दन पन्त को देखकर उन्होंने कहा था- मैं निराला नहीं हूं, मैं हूं तुत्तन खां का बेटा मुत्तनखां। मैंने गामा, जेविस्को और टैगोर सबको चित्त किया है। आओ।
कभी-कभी लोग उनका दर्शन करने उनको खोजते-खोजते दारागंज की उनकी गली में आ जाते। निराला कहते- निराला यहां नहीं रहते। जिन निराला को ढूंढते हो, वह कब के मर गये।
निराला का एक मन हिंदी-भाषियॊं से विद्रोह करता था, अपनी हिंदी जातीयता, अपना कवि का व्यक्तित्व अमान्य करता था वहीं उनका दूसरा मन हिंदी से प्रेम करता था, हिंदी लिखने-पढ़ने-बोलनेवालों को अपना परम आत्मीय मानता था। वह अब भी गीत लिखे जा रहे थे।
निराला का स्वास्थ्य गिरता जा रहा था। सुमित्रानन्दन पन्त उनको देखने गये। निराला ने प्रसन्न होकर कहा-
हम रहें न रहें
तुम सलामत रहो हजार बरस।
…और एक दिन वह समय भी आ गया। निराला की हालत खराब होती गयी। किडनी ने काम करना बन्द कर दिया, नेत्रों की ज्योति जाती रही। तेरह अक्टूबर की शाम से पन्द्रह अक्टूबर सन ६१ के सबेरे तक जलोदर और हार्निया से पीड़ित शरीर में मृत्यु-यंत्रणा झेलने और अनेक बार मित्रों और डाक्टरों को स्वास्थ्य के आभास से प्रसन्न करने के बाद निराला ने अपनी जीवन लीला समाप्त की।
उनकी मृत्यु के कुछ दिन बाद सरस्वती के संपादकीय स्तम्भ में श्रीनारायण चतुर्वेदी ने लिखा-
"निरालाजी अब नहीं हैं। भारतेन्दु ने अपने बारे में लिखा था, प्यारे हरिचन्द्र की कहानी रह जायेगी। सो अब निरालाजी की कहानी भर रह गयी है। अवश्य ही उनका भौतिक शरीर नहीं रहा,किन्तु जब तक हिन्दी भाषा है, जब तक काव्य के शुद्ध पारखी हैं, जब तक दलित,पतित और पीड़ित मानव हैं और जब तक दलित,पतित और पीडि़त मानव हैं और जब तक उनके कष्टों को वाणी देने की या वकील की आवश्यकता है, तब तक निरालाजी का यश:शरीर अमर है, तब तक उनकी वाणी जीवित है। हिन्दी के तो वे गौरव थे। उनके समान तेजस्वी, मेधावी,मौलिक और ऊंची उड़ान लेने वाला कवि तथा ‘शब्दों का बादशाह’ यदा-कदा ही जन्म लेता है। "



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