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मूषक पीर सही न जाये!!

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मैने देखा है जो चुप रहता है और सीधा होता है, उसका फायदा सब लोग उठाते हैं. अब जरा सी आत्मा, बेचारा चूहा, क्या हालत कर डाली है सबने उसकी. कहाँ तो गजब का मान सम्मान था. गणेश जी तक उस पर बैठ कर सवारी करते थे. हर समय लड्डू के पास बैठा कर रखते थे कि जितना खाना है खाओ. उसके नाम लेकर शेर लिखे जाते थे: मूषक वाहन गजानना बुद्धिविनायक गजानना।.. और एक आज का समय आया है. अब गणेश जी भी यात्रा पर कम ही निकलते हैं और जब कभी कहीं जाना भी हो, तो ऐसा माहौल है कि बिना बुलेट प्रूफ गाड़ी में निकल ही नहीं सकते. चूहा वहाँ से भी बरखास्त! बस पुरानी फोटूओं में उनके साथ दिख जाता है.

सिर्फ पूजा का सामान बन गया है. वैसे भी आज के जमाने में, जो भी कभी बड़े काम का रहा हो या बड़े नाम का रहा हो, जब किसी काम का नहीं रह जाता तो उसे पूजनीय घोषित कर किनारे बैठा देने का रिवाज है और फिर खूब करो उसकी छत्र छाया में उसके पुराने प्रभाव और नाम का इस्तेमाल. वो कुछ नहीं कहेगा, बस पूजते रहो.वो इसी में खुश रहता है. इस तरह का प्रयोग राजनीति में तो खूब होता है. उम्र का शतक होने में मात्र १६-१७ साल बचे हैं. ठीक से चल नहीं पाते, घुटने साथ नहीं देते. आँखे मानो नशे में बंद हो रही हों. एक वाक्य बोलते बोलते बीच में ऐसा रुके कि लगने लगा कि बात ही खत्म हो गई. मगर नहीं साहब, हमारे पूजनीय हैं. फिर जो भी तुम कहना चाहो, वो बस वो ही कहेंगे. खूब पूजा की जाती है उनकी और उनकी छत्र छाया में चाहे जो कर जाओ. वो बुरा नहीं मानते. चाहे तो ड्रग्स के चक्कर में पड़ जाओ, साथ वाला मर जाये. सब संभल जायेगा. पूजनीय कह देंगे कि बच्चा है, गल्ती हो जाती है. जवानी का जोश है. सब रफा दफा. बस पूजा चलती रहे, आरती करते रहो, खूब खुश रहो और खूब खुश रखो. फिर चाहे जो जो न फजीयत करा दो. लेकिन चलो, इनका व्यवहार तो फिर भी समझ आता है,

वैसे भी आज के जमाने में, जो भी कभी बड़े काम का रहा हो या बड़े नाम का रहा हो, जब किसी काम का नहीं रह जाता तो उसे पूजनीय घोषित कर किनारे बैठा देने का रिवाज है और फिर खूब करो उसकी छत्र छाया में उसके पुराने प्रभाव और नाम का इस्तेमाल. वो कुछ नहीं कहेगा, बस पूजते रहो.वो इसी में खुश रहता है. इस तरह का प्रयोग राजनीति में तो खूब होता है.

ये तो मानव हैं, समझते हैं, चल जाता है. मगर चूहा!! वो तो बेचारा मूक प्राणी है. कुछ बोल नहीं पाता. चुप रहता है तो तुम तो उसकी हालत और खराब किये दे रहे हो. मूक प्राणी से झटकेबाजी. फोटो की पूजा करते हो और जिंदा को पिंजडे में फंसाने की फिराक में हो. क्या क्या नहीं जतन करते. कभी पिंजडा, कभी उसमें ब्रेड का टुकड़ा अटका कर ऐसी चालबाजी से आमंत्रित करते हो जैसे डिनर पर बुलाया है. तुम्हारा बस चले तो उसके पिंजडे में घुसने के पहले नाटकबाजी में द्वारचार का आयोजन भी करा दो. गले मिल कर मिलनी सिलनी हो जाये और जैसे ही बेचारा डिनर करने अंदर जाये और बाहर से ठक-बन्द, अटक गया. उसका तो तुमने, अपनी इसी करनी से, इंसानों पर से विश्वास ही डुलवा दिया. जब यह चाल न चलती, तो आंटे की गोलियां, लड्डू का भ्रम पैदा करती, बना कर उसमें चूहा मार दवाई डाल कर जगह जगह बगरा दी. सीधा सादा चूहा बेचारा, गणेश जी ने लड्डू का लती बना दिया, बस भ्रमवश खा ले और तुम्हारा काम बन गया. वो मर गया. हँसते खेलते परिवार का एक सदस्य गुजर गया. तुम्हें सुकुन मिल गया. नाक पर रुमाल धर कर उसका पार्थिव शरीर सड़क के किनारे फेंक आये और आकर शांति से चाय पीने लगे. हो गये खुश!! क्यूँ ?? कभी सोचा, उसके परिवार पर क्या गुजरी? खैर, इस तरह सोचो, यह तुम्हारा स्वभाव नहीं. मैं भी कहाँ बीन बजा रहा हूँ, तुम तो मुर्राते ही रहोगे. वो एक पोराणिक शेर है न: भैंस के आगे बीन बजाओ, भैंस खड़ी पगुराय. --इसी दिन के लिये लिखा गया होगा.

बात चलती है चूहे की और मैं बार बार तुम पर आ जाता हूँ. मैं भी न!! जब तब अखबार पढ़ता हूँ. देखता हूँ कि मेडिकल साईंस में बड़ी रिसर्च चल रही है. तरह तरह की दवाईयां बन रही हैं. तरह तरह के परिक्षण किये जा रहे हैं. बहुत तरक्की चल रही है. परिक्षण सफल रहा. चूहे पर किया गया. चूहा बच गया. जिस तरह उसका व्यवहार होना चाहिये था, वैसा ही हुआ परिक्षण के बाद. बिल्कुल स्वस्थ. अब वो अगले परिक्षण के लिये उपयोगी नहीं क्योंकि एक

ठीक डर है तुम्हारा. तुम इंसान हो, इंसान की तरह ही तो सोच सकते हो. इसमें क्या गलत है. अरे, अगर उसे नहीं मारोगे तो कल को यही चूहा न उठ खड़ा हो कि तुम मेरे कारण बचे. अपनी सेहत का और सम्पति में एक हिस्सा मेरा भी लगाओ. डर स्वभाविक है. जैसा अपने आस पास होता देखते हो, उसी से तो सीखते हो. ठीक तो किया जो मार दिया उसको.
परिक्षण में उसने आशातीत परिणाम दे दिये. वो स्वस्थ है. इसलिये अब उसको मार दिया जायेगा. उसकी अब उपयोगिता नहीं रही क्योंकि उसके शरीर में उस दवा की गुणधर्मिता आ गई है. अब उन परिणामों के आधार पर मरते हुए तुम, फिर से सेहतमंद होकर जी सकोगे. अगले परिक्षण के लिये दूसरे नये चूहे पकड़ कर लाये जायेंगे और यह दिन रात चलता रहेगा अनवरत. न तो रोग खत्म हुये जा रहे हैं और न ही शोध. चूहों पर परिक्षण और उनको मारा जाना जारी रहेगा.ठीक डर है तुम्हारा. तुम इंसान हो, इंसान की तरह ही तो सोच सकते हो. इसमें क्या गलत है. अरे, अगर उसे नहीं मारोगे तो कल को यही चूहा न उठ खड़ा हो कि तुम मेरे कारण बचे. अपनी सेहत का और सम्पति में एक हिस्सा मेरा भी लगाओ. डर स्वभाविक है. जैसा अपने आस पास होता देखते हो, उसी से तो सीखते हो. ठीक तो किया जो मार दिया उसको. सही कहा है: न रहेगा बांस, न बजेगी बांसूरी.

किसी ने यह भी सही ही कहा है:

सच मानो या झूठ इसे तुम,
गुर सारे जिंदा रहने के,
यह जीवन ही सिखलाता है.


लेकिन जो चुप रहता है और सीधा होता है, उसे कमजोर न समझो. वो जब बोलता है न!! तब सारे पूँजी का जमा खर्च एक ही बार में बोलता है. जबाब देना भारी हो जाता है. चुप रहने वाला विचारक होता है और विचारक के तर्कों का तो तुम्हारे पास यूँ भी जबाब नहीं होता.

तो सुनो, बताओ!! आज चूहा पूछता है कि "आखिर उसकी ही ऐसी क्या खता है जो उसे तुम अपने परिक्षण का साधन बनाये हो और फिर मार देते हो ? क्या तुम्हें और कोई नहीं मिलता?"

तुम्हारे पास कुछ देर तक बहस करने की शक्ति तो हमेशा रही है जिसके आधार पर तुम अपना गलत सही सब सिद्ध करने की कोशिश करते हो. अपने को सबसे बड़ा ज्ञानी समझने लगते हो. तुम उस चूहे को भी जबाब देने लगते हो, अपने बड़े बड़े सुने हुये तर्कों के साथ:

क्यूँ न करें तुम पर परिक्षण? क्यूँ न मारे तुमको? तुम और हो किस काम के?

तुम जिस गोदाम में घुस जाओ, वहाँ का सारा अनाज खा जाओ. पूरे देश को खोखला कर डाल रहे हो. तुम्हारे पास कोई काम नहीं, सिवाय नुकसान करने के और अपनी जमात बढ़ाने के. बिना सोचे समझे बच्चे पैदा करते जाते हो. हर तरफ बस गन्दगी फैलाते हो. जहाँ से गुजर जाओ, पूरा माहौल खराब कर दो. बदबू ही बदबू. तुम्हें पकड़ने के लिये लोग पिंजड़ा लगाते है, तुम बच निकलते हो. जो भी जाल बिछा लो, तुम्हें उसे कुतर कर बच निकलने के सब गुर मालूम हैं. अरे, तुम खुद बच कर निकल लो तब भी ठीक. तुम तो जिस पर अपनी उदार नजर रख दो, उसे तक जाल कुतर कर छुड़ा ले जाते हो. तुम बस चेहरे से भोले लगते हो, अंदर से कुछ और ही हो. बिल्ली तक को चकमा देकर निकल जाना तुम्हारे बायें हाथ का खेल है. तुम तो पूरे समाज के लिये घातक हो. दफ्तर की जरुरी जरुरी फाईलें तक कुतर डालते हो. न जाने कितने साक्ष्य मिटा डाले इस तरह तुमने, कुछ पता भी है.कई बार तो लगने लगता है कि तुम भ्रष्ट नौकरशाहों और क्रिमनल्स के लिये कमीशन पर काम करते हो. अरे, हमने तो यह तक देखा है कि जब माड लगा तिरंगा झंडा गणतंत्र दिवस पर फहरने के बाद स्वतंत्रता दिवस के लिये लपेट कर रखा गया, तब तुम उसे तक कुतर गये. राष्ट्र के सम्मान का जरा भी ख्याल नहीं. तुम देशद्रोही हो. तुम महामारी फैलाते हो. (शायद यह प्लेग की बात की है)!!!

चूहा तुम्हारी हर बात को गौर से सुन रहा है चुपचाप. जो चुप रहते हैं न! वो बहुत समझ कर और गौर से सुनते हैं. लो, अब वो चूहा कह रहा है:

वही तो!! फिर हम को ही क्यूँ. नेताओं को क्यूँ नहीं पकड़ते. उन पर क्यूँ नहीं करते यही परिक्षण और सफल होने के बाद उन्हें क्यूँ नहीं मार देते. तुमने जितने भी कारण गिनाये हैं, बताओ तो जरा, उनमें से कौन सा इन नेताओं में नहीं है? अरे! हम जो महामारी फैलाते हैं न प्लेग की. वो तो एक गाँव या ज्यादा ज्यादा एक शहर में सीमित होकर रह जाती है. और ये तुम्हारे नेता!! ये जो महामारी फैला रहे हैं-भ्रष्टाचार की, संप्रदायिकता की, धर्म के नाम पर बँटवारे की-वो तो पूरे राष्ट्र को संक्रमित कर रही है. कोई भी इस संक्रमण की चपेट से नहीं बच पा रहा है. न तो इसका कोई इलाज है, न दवा!!


हर गली कूचे से लेकर, ब्लॉक से शहर तक, प्रदेश से राष्ट्रीय स्तर तक हर जगह बहुतायत में हैं. पकड़ो न इन्हें!!! करो न परिक्षण!! मारो न इन्हें. हम लिख कर दे सकते हैं कि हमारी प्रजाति तो खत्म हो सकती है, मगर ये तुम्हें अपनी उपलब्धता की कमी का एहसास कभी न होने देंगे. हम छोटे से प्राणी, कितना अन्न खा जायेंगे, कितना बिगाड़ कर लेंगे.

अब तुम्हारे पास जबाब नहीं है. बहस तो शुरु कर ली, पूरा ज्ञान एक ही बारी में उलट कर रख दिया और अब खिसकने का रास्ता देख रहे हो!! खिसको..खिसको!! यही तुम्हारी फितरत है. जब जबाब न सूझे, तो खिसक लो!!

वाह रे इंसान! बहुत खूब. नमन करता हूँ तुम्हारी होशियारी को.

साभार: http://udantashtari.blogspot.com/2007/04/blog-post_23.html

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