सत्य बनाम समोसा
| अभी कुछ देर पहले एक स्कूल में चीफ गेस्ट बनकर गया, तो एक भाषण दिया। फिर बेटी के स्कूल में एक फंक्शन में गया, तो किसी चीफ गेस्ट का भाषण सुना। फिर फिर शाम को एक लेखक के शोक समारोह में गया, तो भाषण सुना। फिर एक लेखक के सम्मान समारोह में गया, तो भाषण सुना। कभी-कभी मुझे लगता है कि मरने के बाद बंदा ऊपर जाता होगा,तो सबसे पहले यमराज भी भैंसे पर लादकर ले जाते समय एक भाषण दे देते होंगे। फिर चित्रगुप्त भी पाप-पुण्य की एकाउंटिंग करते हुए एकाध प्रवचन ठोंक देते होंगे। फिर नाना प्रकार के ऋषि –मुनि ब्रह्मचर्य के महत्व से लेकर झूठ बोलने के नुकसान तक के विषयों पर भाषण ठोंकते होंगे। अभी एक अमेरिकन ने भारी रिसर्च करके बताया है कि भाषणों के मामले में इंडिया जैसा देश कोई और नहीं है। जैसी परिस्थितियों में जितने भाषण भारत में दिये गये हैं, वैसे पूरे ब्रह्मांड में कहीं दिये गये हैं। उसने बताया है कि भगवान श्रीकृष्ण ने तो महाभारत के युद्ध के मौके पर भी एक कोना तलाशकर भाषण का जुगाड़ बैठा लिया। अर्जुन जरा सी आनाकानी कर रहा था, तो पूरे अठारह अध्याय का भाषण दिया, जिसे हम गीता के नाम से जानते हैं। भाषण कला मध्यकाल में कुछ लुप्त टाइप हो गयी थी। वरना मेरा यकीन है कि इतनी मारकाट नहीं होती। उदाहरण के लिए महाराणा प्रताप और अकबर के बीच झगड़ा नहीं होता, अगर अकबर बिजी होता तरह-तरह के भाषणों में-जैसे सांप्रदायिक एकता में अकबर के धर्म -सुलहकुल के महत्व पर भाषण, जैसे फतेहपुर सीकरी की स्थापत्यकला में पश्चिम के योगदान पर भाषण, जैसे बीरबल के सेंस आफ ह्यूमर पर भाषण, जैसे फतेहपुर सीकरी के जल संकट में निजी क्षेत्र का योगदान। इतने विषय हैं साहब अकबर की पूरी जिंदगी कट जाती, भाषण खत्म नहीं होते। महाराणा प्रताप भी भाषण दे सकते थे-राजस्थान में राजपरिवारों के कलह का विकास पर असर, चेतक नामक घोड़े की केस स्टडी............। जिंदगी भाषणों में निकल जाती, टेंशन कम होते। मेरा एक छात्र परम जुआरी और सिगरेटबाज है। उसके पापा रोज उसे इसके खिलाफ भाषण देते हैं। पांच सालों से मैं देख रहा हूं। इधर सर्वे करके मैंने पता किया है कि तमाम टीवी चैनलों पर चलने वाले तमाम तरह के प्रवचनों –भाषणों में कोई सौ टन सत्य, नैतिकता, प्रेम झरता है। इतना सत्य निकलकर जाता कहां है,किसी को नहीं पता। सप्लाई तो धुआंधार होती है, पर कोई लेता नहीं है। यह टेकनीक इधर चल निकली है। लिखित भाषण की सप्लाई हो जाती है, फिर उसे आटोमेटिक दिया हुआ मान लिया जाता है। इसके बाद चाय-पान की ठोस सप्लाई होती है, उसे आटोमेटिक दिया हुआ नहीं माना जाता। समोसा सत्य से ज्यादा ठोस सत्य होता है।
चलूं, भाषण कला पर एक लेक्चर सुनने जाना है। टेंशन है कि सच्ची में सुनना पड़ेगा। साभार : आलोक पुराणिक मोबाइल-0-9810018799 |



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