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टपकाओ उर्फ ट्रिकल डाऊन थ्योरी

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चालूचक्रम नगर की चतुरा कंपनी में तीन अधिकारी कार्य करते थे-सींचू, भींचू और टपकंचू।

इन सबके अपाइटमेंट का समय लगभग एक ही था। तीनों ही अपने हिसाब से काम करने में लगे हुए थे। सींचू की आदत थी कि वह कंपनी में नये-नये चेले बनाता था। उन्हे सींचता था, उन पर बहुत मेहनत करता था और उन्हे अपना सारा ज्ञान दे देता था। जैसे ही चेलों को पता लगता कि सींचू गुरु ने उन्हे सारा ज्ञान दे दिया है, चेले कहीं और टहल लेते थे। इस तरह से सींचू के पास कभी सालिड नेटवर्क नहीं हो पाया। वह नये चेले तैयार करता, कुछ समय बाद वह उसके पास से टहल लेते।
सींचू बहुत परेशान हो गया, क्योंकि किसी भी सामान्य कंपनी की तरह इस कंपनी में भी प्रोग्रेस उसी की होती थी, जिसके चाहे जैसे काम-धंधे चाहे जैसे हों, पर टाप पर बंदे जरुर हों।
सिर्फ टाप पर ही नहीं हों, मिडिल लेवल और डाऊन लेवल पर हों।
वह जानता था कि आजकल टाप,मिडिल और डाऊन लेवल –हर लेवल की रणनीतियां अपनाने वाले को ही प्रमोशन मिलता है। इसके लिए जरुरी है कि डाऊन लेवल पर अपने समर्थक चपरासी प्रतिद्वंदी बंदों के बारे अफवाह फैलायें कि फलां दारु बहुत पीता है, फलां जुआ बहुत खेलता है।
मिडिल लेवल के अपने बंदों को चाहिए कि वो प्रतिद्वंदियों की फाइलों को चलने ही न दे। और टाप पर लेवल बैठे अपने बंदों का कर्तव्य़ है कि वो मीटिंग में प्रतिद्वंदियों के नाम की चर्चा होने ही न दें। पर सींचू का मामला जमता ही नहीं था, बंदे उसके हो ही नहीं पाते थे।
भींचू की समस्या भी यही थी कि बंदे उसके हो ही नहीं पाते थे। भींचू जिसे भी चेला-चमचा बनाते थे, वह कुछ ही टाइम बाद टहल लेता था, यह आरोप लगाते हुए कि भींचू अपने चेलों को कुछ देता नहीं है। सब कुछ अपने पास ही भींच कर रखता है। जैसे उसे दफ्तर में मेहमानों को चाय-वगैरह पिलाने के लिए जो इंटरनेटमेंट एलाउंस मिलता है, वो सारा की सारा वह खुद ही खा-पी लेता है, चेलों को उसमें से एक कप चाय तक नहीं मिलती। ऐसी चमचागिरी का क्या फायदा, जिसमें कुछ भी रिटर्न ना हो।
पर टपकंचू का मामला एकैदम टनाटन था। टाप से लेकर डाऊन लेवल तक उसके बंदे थे, उसके तमाम तरह के धंधे थे। एक बार दफ्तर में प्रमोशन-प्रक्रिया शुरु हुई। सब पीछे रह गये, टपकंचू टाप पोजीशन पर पहुंच गया।
सींचू और भींचू दोनों ने टपकंचू से प्रश्न किया-हे मित्र किस विधि तुम टाप टू डाऊन लेवल पर बंदों को कैसे सैट करते हो।
टपकंचू ने बताया-देखो, जिस तरह से देश की पालिटिक्स में मध्यमार्गियों की मौज होती है, उसी तरह से दफ्तर की पालिटिक्स में भी मध्यमार्गी की विजय होती है। देश की पालिटिक्स में मध्यमार्गियों की मौज होती है, वो कभी भी किधर भी छलांग मार सकते हैं। इसी को फालो करते हुए दफ्तर में करना यह चाहिए कि कभी चेले-चमचों को फुलमफुल सींचना नहीं चाहिए। उन्हे सब कुछ आफर नहीं करना चाहिए। जिस क्षण चेलों को लगता है कि अब सिंचन-प्रक्रिया संपन्न हो चुकी है, तो वह टहलायमान हो जाते हैं। सो सींचू तुम तो यूं फ्लाप हुए कि तुमने फुलमफुल सिंचन प्रक्रिया अपनायी।
और भींचू तुम इसलिए फ्लाप हुए कि तुमने बिलकुल ही भींचन प्रक्रिया अपनायी। अरे किसी को कुछ नहीं मिलेगा, तो कोई चमचागिरी क्यों करेगा। बिना रिटर्न की उम्मीद के तो समझदार किसी से प्यार तक नहीं करते। सो भींचू, सफलता का राज न फुलमफुल देने में है, न भींचने में है। सफलता टपकऊल यानी ट्रिकल डाउन के सिद्धांत में है। यानी थोड़ा सा टपकाते रहना चाहिए, पर पूरे फल को दूर रखना चाहिए। फल लागे अति दूर के सिद्धांत को यूं समझना चाहिए कि कुछ न देने वाली सिर्फ कांटों की झाड़ियों के पास कोई नहीं जाता। और बहुत नीची ऊंचाई वाले अमरुद के पेड़ को पब्लिक एक झटके में खाली कर देती है। पर खजूर का पेड़ एकदम सेफ सी स्थिति में रहता है। उस तक पहुंचने की आस कई लगाते हैं, और उनमें से कुछ को फल मिलते भी हैं।
टपकंचू के ऐसे वचन सुनकर सींचू और भींचू दोनों ने कहा-आगे से हम भी ट्रिकल डाऊन और टपकाऊ सिद्धांत पर कार्य करेंगे।

बास से दूर यानी फल लागे अति दूर
चतुरा कंपनी में ही नीयरू और टहलू नामक दो बंदे काम करते थे।
नीयरु बास के नीयर करीब रहकर हेडक्वार्टर में ही बने रहना चाहता था, जबकि टहलू का मानना था कि जीवन का उद्देश्य सिर्फ बास के करीब रहना नहीं है, जीवन का उद्देश्य है माल पैदा करना। बास तो क्षणभंगुर नहीं तो महीनाभंगुर या सालभंगुर होता है। पर एक बार कायदे से माल पैदा कर लिया जाये, तो पूरी जिंदगी का जुगाड़मेंट हो जाता है।
नीयरू ने ऐसी सैटिंग-गैटिंग की, बास ने उन्हे हमेशा अपने साथ हेडक्वार्टर में रखने की कोशिश की। नीयरु बास के साथ कार में घूमने और बास को चुटकुले सुनाते हुए अत्यधिक गौरवान्वित महसूस करता था। उधर टहलू का ट्रांसफर हेडक्वार्टर से दूर एक दूरस्थ नगर में कर दिया गया।

टहलू ने हेडक्वार्टर की नजर से दूर डीलरों से कमीशन लेना शुरु किया और टनाटन रकम पैदा की, कुछ ही समय में टहलू ने इस रकम से एक पेट्रोल पंप बना लिया और चैन से जिंदगी बसर करने लगा। उधर हेडक्वार्टर में पुराने बास का ट्रांसफर हो गया और नया बास अपने नये खास लेकर आया। बेचारा नीयरु अपने पुराने चुटकुलों के साथ हेडक्वार्टर के पुराने गोदाम में ट्रांसफर कर दिया गया।
टहलू एक बार हेडक्वार्टर आया और उसने नीयरु की दुर्गति देखी और फिर बताया कि हेडक्वार्टर से दूर रहकर उसने कैसी मौज की है।
टहलू ने बताया-देखो, हेडक्वार्टर में रहकर सिर्फ बास की करीबी हासिल होती है। और बास की करीबी से सबको कुछ हासिल नहीं होता है। अगर कुछ हासिल नहीं होना है, तो बास की करीबी हो या दूरी बेकार है। सो बंदे का फोकस क्लियर होना चाहिए। फोकस होना चाहिए कि माल कैसे पीटा जाये। कई बार माल हेडक्वार्टर से दूर ही कमाया जाता है। सो हेडक्वार्टर में बास के करीब रहने के चक्कर में समझदारों को नहीं पड़ना चाहिए।

शिक्षाएं

  1. न तो चेलों को झमाझम सींचना चाहिए, न ही उन्हे पूरा भींचना चाहिए। मामला बैलेंस का होना चाहिए।
  2. टपकऊल थ्योरी दफ्तर की पालिटिक्स में बहुत काम की होती है।
  3. जीवन का उद्देश्य सिर्फ बास के करीब रहना नहीं है, जीवन का उद्देश्य है माल पैदा करना। बास तो क्षणभंगुर नहीं तो महीनाभंगुर या सालभंगुर होता है। पर एक बार कायदे से माल पैदा कर लिया जाये, तो पूरी जिंदगी का जुगाड़मेंट हो जाता है।
  4. कई बार माल हेडक्वार्टर से दूर ही कमाया जाता है। सो हेडक्वार्टर में बास के करीब रहने के चक्कर में समझदारों को नहीं पड़ना चाहिए।

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