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धन दे मातरम्

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भाईजी नाराज थे, डांट रहे थे, क्या अगड़म-बगड़म विषयों पर लिखते हो, ट्रांसफार्मर से लेकर वाटर पार्क तक। अब कुछ सीरियस विषयों पर लिखो। उन्होने बताया, लिखो वंदे मातरम् पर।
साहब सोचा वंदे मातरम् पर।
बचपन में स्कूल में जब वंदे मातरम् गवाया जाता था, तब आंख खोलकर यह ताकते थे कि कौन नहीं गा रहा है। बाद में गुरुजी को बताते थे कि हम तो गा रहे थे, वो नहीं गा रहा था। बाद में बड़ा हुआ, तो पता लगा कि बड़े-बड़े भी यही कर रहे हैं। एक बार भाजपा वालों ने शिकायत कि हम तो गा रहे थे और लोग नहीं गा रहे थे। हम तो गा रहे थे देखो, सोनियाजी ने नहीं गाया। देखो, उनने नहीं गाया।
बचपन और बचपने में यही फर्क होता है। बचपन की उम्र होती है, बचपने की कोई उम्र नहीं होती।
बच्चों से कहता हूं कि वंदे मातरम् गाया करो रोज, तो हंसते हैं। कहते हैं गुरुजी पढ़-लिखकर अमेरिका जाना है। आप कहें, तो वंदे अमेरिकाम् कर लें।
और समझाओ, बच्चों को कि बेटे मातरम् यानी मां यानी देश को मां मानकर वंदन करना है। मदर इंडिया के बारे में सोचना है।
बच्चे और हंसते है, गुरुजी मदर इंडिया के बारे में सोचने का टाइम गया, अब तो मिस इंडिया के बारे में सोचने का वक्त है।
नेतागण वंदेमातरम् को अलग स्टाइल से समझते हैं। इसमें सुजलां, सुफलांम् का फंडा कई नेताओं को भरपूर समझ में आया है, पर दूसरे तरीके से। मेरे शहर में एक टाप क्लास पार्टी का मंझोले लेवल का नेता पानी का कारोबार करता है। उसकी कृपा से वाटर वर्क्स की सप्लाई कई मुहल्लों में नहीं आती, इन मुहल्लों में पानी वाले नेताजी के टैंकर रेगुलरली आते है। जल सप्लाई सुजलांम् में कैसे तबदील होती है, इन नेताजी को समझ में आ गया है। पब्लिक के लिए जब जल गायब हो जाता है, नेताजी का सुजलाम् हो जाता है। इसके सुफल आते ही आते हैं। पर सिर्फ नेताजी के लिए। वंदे मातरम् के फुल्ल कुसुमित को मामला तो बहुत कुंठित करता है। ईमान से कहूं, तो नयी पीढ़ी को फुल्ल कुसुमित का फंडा समझाने में शर्म आती है। जिस पीढ़ी को एक डंडीकट गुलाब खरीदने के लिए भी दस रुपये खर्चने पड़ते हों, वह प्रति फूल का मतलब दस के नोट से ही लगायेगी। जिसे कमाना आसान नहीं है।
अभी खबर पढ़ रहा हूं कि देश के 150 जिलों में नक्सलवाद प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर आ पहुंचा है, गन दे मातरम् का स्वर वहां से गूंजता प्रतीत हो रहा है।
अभी फिर एक नौजवान को समझाने की कोशिश की कि वंदे मातरम् यानी अपनी माता की वंदना करनी चाहिए, नौजवान अमेरिकन दूतावास जाने वाला था। वह बोला-माता का सम्मान कर सकते हैं, पर सेवा तो उसकी करेंगे, जहां से नोट मिलते हैं।
धन दे मातरम् -कहता हुआ नौजवान अमेरिका की सेवा करने चला गया।

Comments (1 posted):

debbe on 21 June, 2007 03:20:02
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Jab tak rastrabhakti is desh kelogomein nahin aayegi, vande mataram kewal matra cinema ki chees banakar rah jayegi. Bankim Chandra Chattopadhyay ke ilake log hi jab isase parhej kar rahe hain to phir poore restra ke liye , kahana hi bekar hai. Kisi neta se pooch lein ki Vande mataram kya hai, vah khu hi kuch nahim bata payega. Aap chahein to sarvey karake dekh sakate hain. Jab Rastra hit, Rastra Gaurav, Rastra Bhakti hi logon ke dilon se gayab ho gayi hai to Vande Mataram jaisa bekar ka jumala kya mayane rakhata hai.

Bahar hal aapka prayas accha hai. Is lekha se vaicharik parivartan ki thodi gunjayas hai.

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