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जूते की सुनो, वो तुम्हारी सुनेगा...

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तो हमारे महात्म का हम खुद क्या बखान करें. बड़ा शरमा सा जाते हैं. आप तो जानते ही हैं कि हम १४ साल तक अयोध्या के राज सिंहासन पर विराजमान रहे. हुआ यूँ कि जब राम चन्द्र जी को वनवास हो गया, तो उनके चक्कर मे हम जबरदस्ती लपिटिया गये और चले साथ साथ जंगल की तरफ.

वो तो भला हो भरत भाई का जो मौके से आ गये और अपने बड़े भईया राम चन्द्र जी से बोले कि आपको जाना हो तो जायें लेकिन अपनी पादुका मुझे दे जायें. पुराने जमाने के भाई थे और एक दूसरे की बात रखा करते थे. बिना पूछे कि तुम्हारे पास तो तुम्हारी पादुकायें हैं ही, फिर काहे हमारी माँगे ले रहे हो, बस हमें उतारे और भरत भाई को थमा दिये. हम भी खुशी खुशी भरत भाई के साथ ठुमकते हुये महल आ गये. हमने और भरत भाई ने रास्ते में मिल कर तुलसी दास का गीत गाया:

करि नृप क्रिया संग पुरबासी। भरत गए जहँ प्रभु सुख रासी।।
पुनि रघुपति बहु बिधि समुझाए। लै पादुका अवधपुर आए।।

फिर तो क्या सम्मान दिया भरत भाई ने-वाह. हमें सिंहासन पर बैठालें और खुद नीचे बैठें. हर रोज हमें नमस्ते करने के बाद ही कोई काम शुरु करते थे. ऐसा आदर-सत्कार देखकर हमारी तो खुशी से आँख भर आई और गला ऐसा रौंधा कि आभार के दो शब्द भी न कह पाये. हम तो मन ही मन यही आशीष देते रहे कि भरत भईया, आप ही राजा बने रहो और मनाते रहे कि राम चन्द्र जी जंगल ही रहें. उन दिनों जूते की भाषा प्रचलन में नहीं थी, तो कोई हमारी बात समझ ही न पाया और एक दिन देखते हैं कि बड़के भईया लौट आये और हमें सिंहासन से उतार दिया गया.

फिर समय बदला, जमाना बदला और लोग बदले. यहाँ तक कि देखते देखते युग भी बदल गये. रामयुग से ढ़लकते ढ़लकते कलयुग में पहूँच गये. बाकि तो अधिकतर मान्यतायें और सामाजिक महत्व मटियामेट हो गये मगर हमारा महत्व आज भी काफी हद तक बरकरार है. अच्छे जेन्टलमैन की पहचान उसके सूटेड बूटेड होने से की जाती है. इसमें जो बूटेड वाली बात है, वो हमारी हो रही है. बड़ा अच्छा लगता है. लोग बाग व्यक्ति की संभ्रांतता का अंदाजा हमें देखकर लगाते हैं.

 अच्छे जेन्टलमैन की पहचान उसके सूटेड बूटेड होने से की जाती है. इसमें जो बूटेड वाली बात है, वो हमारी हो रही है. बड़ा अच्छा लगता है. लोग बाग व्यक्ति की संभ्रांतता का अंदाजा हमें देखकर लगाते हैं..
कई होशियार तो हमें देखकर यहाँ तक पता कर लेते हैं कि हमारा धारक किसान है, गाँव से आ रहे है, बर्फिले इलाके का रहने वाला है या किसी पॉश लोकेलिटी का वासी है. जब कहीं पार्टी शार्टी में जाने की बात हो या शादी ब्याह में या फिर किसी मीटिंग में, तब तो हमारी बड़ी खातिर होती है. बढ़िया मेकअप पॉलिश होती है और सज सूज कर हम चलते हैं. आखिर प्रतिष्ठा का सवाल होता है जो हम से ही आँकी जाती है.

हालात तो यह हैं कि हमारे भाव आसमान छूने लगे हैं, देशी विदेशी कम्पनियां हमें बना बना कर पैसे कमाये जा रही हैं. बाटा से लेकर रिबोक, नाईकी, गुची और न जाने कौन कौन..सब हमारे मुरीद हैं. विदेशी उपक्रमों का बोलबाला एक जमाने से रहा है. हीरो इठला इठला कर गाता है..

मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंगलिस्तानी
सर पे लाल टोपी रूसी, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी
मेरा जूता...

वाह, क्या फक्र की बात है. हर रुप में प्रतिष्ठित-पैर में रहूँ तो धारक का सम्मान और सर पर बजा दिया जाऊँ तो उसका अपमान. अब तो बहुत से लोग हो गये हैं जो हमारी भाषा ही समझते हैं, दूसरी भाषा उनको समझ में ही नहीं आती. यह फर्क आ गया है जमाने में.

रामाआसरे जी, जो आरक्षित कोटे से इस शहर के कलेक्टर हैं. नये नये कलेक्टर हुये हैं. कुछ अरसे पहले हम शहर की सबसे बड़ी दुकान से खरीद कर उनके लिये लाये गये. यह अलग बात है कि हमारा दाम दारु के ठेकेदार ने भरा और रामाआसरे जी ने बस हमारे आने से खुश होकर उनका एक ठेका पास कर दिया. यह तो उनकी आपसी समझबूझ है, उससे हमें क्या. हम तो रामाआसरे, कलेक्टर की पैर की शोभा बढ़ाने आ गये. रामाआसरे जी हमें पहन कर बड़ी शानोशौकत से दफ्तर गये. हमारे कारण उनके चेहरे पर आत्म विश्वास था और आँखें चमक रही थीं. मातहतों की निगाहें हमें देख देख कर रश्क खाती थीं. दिन भर वो हमें पहनें कभी इस मीटिंग कभी उस मीटिंग. कभी यहाँ दौरे पर और कभी मंत्री जी के साथ गाँव की परिक्रमा. हमने उनके पग में भर सामर्थ सुविधायें बिछा दीं. हर कंकड़ की चुभन हमने झेली, हर धूल, कींचड़ को अपने शरीर पर ले लिया. धूप की जलन हमने झेली और रामाआसरे को महसूस भी नहीं होने दिया कि सड़क कितनी तप रही है. हर तकलीफ झेलते रहे ताकि रामाआसरे को कोई तकलीफ न हो और फिर शाम हो गई.

शाम को मंदिर में महाआरती में मंत्री जी को भाग लेना था सो रामाआसरे, कलेक्टर को साथ होना ही था और हम तो साथ थे ही. मगर यह क्या, जैसे ही मंदिर आया वो हमें बाहर ही छोड़ कर चल दिये. हम उनसे भी बड़े अछूत हो गये क्योंकि हम कलेक्टर नहीं. अरे, अगर अर्जुन सिंग न होते, अगर आरक्षण न होता तो अभी तो ये भी कहीं जूता ही सिल रहे होते. बहुत गुस्सा आया रामाआसरे पर. यही सब देखकर हमें लगता है कि यह हमारे लिये कितने गर्व की बात है-इन मानवों की संगत में लगातार रहते हुये भी हमने खुद को इनकी सभ्यता से बचा कर रखा. हमारे लिये तो क्या हिन्दु, क्या मुसलमान और क्या ईसाई, सब एक हैं. हम सबकी वैसे ही सेवा करते हैं और सबके साथ एक ही व्यवहार रखते हैं. आज तो रमाआसरे के बारे में खराब खराब विचार मन में आने लगे मगर क्या करते, वहीं पड़े रहे. फिर थोड़ी देर में रामाआसरे लौटे और हमें पहन कर फिर चल दिये. हमारा दिमाग तो सटका हुआ था ही, बस गुस्से मे काट खाये उनको. पूरे चव्वनी भर का छाला बनाया. घर पहूँच कर वो अपने नौकर पर गुस्साये. कहे कि कल हमें वापस दुकान ले जायें, जहाँ से हम लाये गये थे. हम तो डर ही गये.

 मगर यह क्या, जैसे ही मंदिर आया वो हमें बाहर ही छोड़ कर चल दिये. हम उनसे भी बड़े अछूत हो गये क्योंकि हम कलेक्टर नहीं. अरे, अगर अर्जुन सिंग न होते, अगर आरक्षण न होता तो अभी तो ये भी कहीं जूता ही सिल रहे होते..
खैर, हम डब्बे में रख कर दूसरे दिन वापस दुकान पर ले जाये गये. नौकर ने बढ़ चढ़ कर हमारी शिकायत लगाई. चव्वनी को अठ्ठनी बताया गया. दुकानदार ने हमें गुस्से में अलटाया पलटाया और अंदर ले गया. लोहे के बत्ते पर चढ़ाया और दो हथौड़ी मरम्मत कर दी. हमारी तो चीख ही निकल गई. फिर मोम मलहम लगा कर वापस भेज दिये गये कि अब नहीं काटेगा. इतनी जबरदस्त पिटाई के बाद काट भी कौन सकता है, कम से कम हम तो नहीं. अभी आदमी होने के गुण हममें आना बाकि हैं.

हम वापस आ गये. अब मंदिर में बाहर छोड़ दिये जाने की जलालत झेलना हम सीख चुके थे. कौन फिर फिर अपनी मरम्मत कराये- जूते हैं कोई नेता तो हैं नहीं. दिन बीतते गये. हम बिना अपनी बढ़ती उम्र और क्षीण होती शक्ति की परवाह किये बगैर, हर पल हर क्षण रामाआसरे की रक्षा और सेवा करते रहे. एक दिन गुस्से और बदहवासी में उन्होंने एक पत्थर पर ऐसी ठोकर मारी कि दर्द से हमारा जो मुँह खुला तो खुला ही रह गया. वो घर लौट आये. उनके लिये नया जूता आ गया. हम पीछे के कमरे के स्टोर में डाल दिये गये. हम अपनी हालात पर रोते रहे और नौकर हमें देख लालायित होता रहा. फिर एक दिन कलेक्टराईन से पूछ कर वो हमें अपने घर ले आया. जूते के डॉक्टर कल्लू मोची से हमारा इलाज करा कर नया रंग रोगन करा, उसने हमें अपनी अलमारी में बड़ी इज्जत से सजा लिया. अब वो हमे अपने विशिष्ट समयों में पहन कर गौरवान्वित होता है. हमारी यही किस्मत है, बस यही सोच कर रुह काँप जाती है कि अब अगर मुँह फिर खुल गया तो आगे क्या होगा.

 आज वो माँ, उसी कलेक्टर के घ्रर में पीछे वाले कमरे में रहती है. बेटे की कमायाबी से खुश हो लेती है.बेटे के पास समय नहीं है, बस माँ पीछे के कमरे से उसे दफ्तर जाते और देर रात लौटते देखकर संतुष्ट हो लेती है. उसकी पत्नी कीटी पार्टियों और सामाजिक कार्यों में व्यस्त रहती है. आज तो अखबार में कलेक्टराईन की वृद्धाश्रम में सेवा करते हुये तस्वीर भी छपी है.रामाआसरे के बच्चे अपनी दुनिया में ही खोये रहते हैं. दादी को प्यार और आदर देना है यह उनके माँ-बाप ने समयाभाव में कभी सिखाया ही नहीं और न ही उन्होंने सीखा..
रामाआसरे से मुझे कोई शिकायत नहीं. मेरी तरह बल्कि मुझसे ज्यादा उसके लिये, अब बूढी हो चली उसकी माँ ने तकलीफें झेली थीं. बचपन में ही रामाआसरे के पिता गुजर गये थे. माँ ने मुहल्ले के कपड़े सी सी कर उसे पाला. हर तकलीफें खुद झेलीं मगर रामाआसरे को महसूस भी नहीं होने दिया. खुद भूखी रही, रामाआसरे को कभी अहसास नहीं होने दिया कि भूख क्या होती है. खुद लोगों के कपड़े सीती रही मगर रामाआसरे को नीचा न देखना पड़े इसलिये हमेशा अच्छे कपड़े पहनाये. अपनी तबियत की चिंता किये बिना, उसे पढ़ाया, लिखाया. कलेक्टर बनाया और आज वो माँ, उसी कलेक्टर के घ्रर में पीछे वाले कमरे में रहती है. बेटे की कमायाबी से खुश हो लेती है.बेटे के पास समय नहीं है, बस माँ पीछे के कमरे से उसे दफ्तर जाते और देर रात लौटते देखकर संतुष्ट हो लेती है. उसकी पत्नी कीटी पार्टियों और सामाजिक कार्यों में व्यस्त रहती है. आज तो अखबार में कलेक्टराईन की वृद्धाश्रम में सेवा करते हुये तस्वीर भी छपी है.रामाआसरे के बच्चे अपनी दुनिया में ही खोये रहते हैं. दादी को प्यार और आदर देना है यह उनके माँ-बाप ने समयाभाव में कभी सिखाया ही नहीं और न ही उन्होंने सीखा. माता जी को बस नौकर कलेक्टर साहब की माँ होने की वजह से सम्मान देते हैं और वो उसी में संतुष्ट हैं. और करें भी क्या बेचारी. जीर्ण क्षीण काया लिये पड़ी रहती है. तब फिर हम तो सिर्फ जूता हैं, हम क्यूँ न संतुष्ट रहें इस नौकर द्वारा दिये सम्मान से.

 

अब जब मैं फिर फट जाउँगा, नौकर भी मुझसे मुँह मोड़ लेगा, तब मेरी कथा क्या होगी, यह सुनिये जल्द ही फुरसतिया जी से..फटे जूते की वेदना में. मुझे उम्मीद है कि फुरसतिया जी अपने पसंद का इससे मिलता जुलता टॉपिक आगे किसी को उसकी शैली में सुनाने को कहेंगे. टॉपिक तो लगातार बने रहेंगे-मोजा, पेन्ट, टाई, शर्ट,टोपी और यहाँ तक कि रुमाल, बनियान, धोती..बढ़ाओ भई आगे आगे...

साभार :http://udantashtari.blogspot.com/2007/04/blog-post.html

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