भाई जैसे और बेटे जैसे की कहानी
नोटवर्धन नगर में प्रेक्टीकू और इमोशू नामक दो कर्मचारी नोटदाबू कंपनी में काम करते थे।
प्रेक्टीकू एकदम प्रेक्टीकल किस्म का बंदा था।
वह मानकर चलता था कि इस धरती पर जो भी कुछ होता है, वह किसी न किसी मतलब से ही होता है।
सूरज निकलता है, तो जरुर बल्बों की कंपटीशन से घबरा कर निकलता है कि कहीं ऐसा न हो, कि एक दिन बल्बों के सामने लोग उसे भूल न जायें।
चंद्रमा निकलता है, तो जरुर इस डर से कि अगर नहीं निकला, तो उसका टीए डीए कट जायेगा। कोई नदी बहती है, तो सिर्फ इसलिए कि उसकी पूजा हो सके और लोग उसमें पैसे डाल सकें।
हवा चलती है, तो सिर्फ इसलिए कि वह जरुर किसी पंखे या कूलर की माडलिंग करती है।
यानी कुल मिलाकर इस जीवन-जगत में जो भी होता है, वह किसी न किसी मतलब से होता है।
पर इमोटू एक इमोशनल किस्म का बंदा था।
वह मानता था कि इंसानों और गधों में फर्क यही होता है कि गधे इमोशनल होते हैं, और अपने बास के प्रति मुहब्बत का भाव रखते हैं। ऐसा ही भाव अपने बास के प्रति रखना चाहिए, ऐसा वह सबसे कहता था।
इमोटू कहता था कि उसके रिश्ते ही सब कुछ हैं, जो आपको भाई माने, उसके लिए जान भी लगा देनी चाहिए।
भाई उर्फ शेयर बाजार
सो इसी प्रकार अपने बास की बिना छुट्टी लिये सेवा करने वाला इमोटू बराबर अपने बास को भाई मानता रहा और प्रत्युत्तर में भाई माना जाता रहा। कालांतर में इमोटू के बालक-बच्चे बड़े हुए, उन पर ध्यान देने के लिए कभी-कभार वह दफ्तर से घर भी आने लगा।
ऐसे मौकों पर बास की बीबी के सम्मुख सवाल उठा कि घर की सब्जी कौन लेकर आयेगा।
मुन्नू को मेले में कौन ले जायेगा।
टामी को सांध्यकालीन पार्क-भ्रमण कौन करवायेगा।
इमोटू के बच्चे जैसे-जैसे बड़े होते गये, बास के घर से उसकी अनुपस्थिति बढ़ती चली गयी।
एक दिन बास ने उसे बताया कि अब इमोटू की सेवाओं की जरुरत कंपनी को नहीं है, उसके बदले एक बंदा इमोटू की सेलरी की आधी सेलरी में रख लिया गया है।
इमोटू ने देखा कि नया बंदा घर और दफ्तर दोनों का काम उसी तेजी से कर रहा है, जिस तेजी से इमोटू अपनी नौजवानी के दिनों में करता था।
इमोटू ने बास से कहा-आप तो मुझे छोटा भाई मानते थे, और अब मुझे बाहर कर रहे हैं।
इस बार बास ने बताया कि वह तो अपने छोटे भाई को भी घर से बेदखल कर चुके हैं।
इमोटू दफ्तर की सीढ़ियों पर फूट-फूटकर रोने लगा।
उसे रोता देखकर प्रेक्टीकू उसके सामने आया और बोला-
इमोटू तूने इमोशन के चक्कर में अपनी बुद्धि इतनी मोटी कर ली कि तुझे कुछ अच्छी और सच्ची बातें सूझी ही नहीं। अरे बेवकूफ,
- जिस प्रकार शेयर बाजार में तमाम शेयर तमाम वजहों से ऊपर नीचे होते रहते हैं, उसी तरह से भाईगिरी के बाजार में भाईयों के भाव ऊपर-नीचे होते रहते हैं।
- दफ्तर-गीता के मुताबिक दफ्तर में कोई किसी का भाई नहीं है, कोई किसी का बाप नहीं है।
- सब के सब से यूं ही मेल हैं, अपने-अपने खेल हैं।
- जिस तरह आत्मा एक शरीर छोड़कर दूसरे शरीर को पकड़ लेती है, उसी तरह से बास मौका आने पर एक भाई को छोड़कर दूसरे भाई को पकड़ लेता है।
- छूटा हुआ भाई अगर अपने लिए दूसरा जुगाड़ नहीं बना पाता, तो यह उसकी मूर्खता है, और मूर्खों का भला कर पाना उसी तरह से मुश्किल है, जिस तरह से नगर निगम के नल के पानी का आना।
प्रेक्टीकू के ऐसे वचन सुनकर इमोटू बोला-हे मित्र, मुझे अब समझ में आ गया है कि बास अगर भाई माने, तो भी दूसरे भाईयों से सैटिंग, गैटिंग में लगे रहना चाहिए। पता नहीं, कौन कब भाई गोली दे जाये।
पैसा सच है, रिश्ते फानी
नोटू और रिश्तू नामक दो कर्मचारी नोट खेंचू कंपनी में काम करते थे।
एक दिवस बास ने दोनों को पचास लाख के कैश कलेक्शन के लिए भेजा।
कलेक्शन करने के बाद दोनों वापस आ रहे थे कि नोटू ने प्रस्ताव किया- हे मित्र इस रकम में आधी-आधी पार करते हैं और इस शहर की हद से पार हो जाते हैं।
इस पर रिश्तू ने कहा-नहीं, यह बास तो हम पर बेटों की तरह विश्वास करता है। यह तो हमारे बाप की तरह है।
इस पर नोटू ने कहा-अरे बेवकूफ, कोई भी समझदार अपने बेटों पर विश्वास नहीं करता और कोई समझदार बेटा अपने बाप का विश्वास नहीं करता। तूने इतिहास नहीं पढ़ा क्या, बता अगर औरंगजेब अपने बाप शाहजहां को गोली देकर उसे कैद करके सत्ता नहीं हथियाता, तो बता क्या औरंगजेब का नाम कोई इतिहास में जानता भी क्या। नहीं ना, बता क्या तुझे औरंगजेब के और भाईयों के नाम पता भी हैं कि शाहजहां के एक बेटे का नाम दारा था कि मुराद था। बेटा इतिहास में उनके ही नाम जाते हैं, जो अपने बाप को गोली देने की कला जानते हैं। मैं तो भाग रहा हूं, अपने हिस्से की रकम लेकर, अपने हिस्से की रकम लेकर तू चाहे तो वापस चला जा।
नोटू रकम लेकर भाग गया और कालांतर में दूसरे शहर में नेतागिरी और नकली दारु का कारोबार करते हुए अत्यधिक ही संपन्न हुआ और मंत्री बनकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगा। पर रिश्तू रिश्तों का लिहाज करते हुए वापस कंपनी में आ गया। उक्त घटना के पांच साल बाद नोटखेंचू कंपनी के मालिक की जगह नये बेटों ने टेकओवर किया। उन्होने आते ही कास्टकटिंग के तहत पचास साल से पुराने सारे कर्मचारियों को रिटायर कर दिया। रिश्तू भी रिटायर कर दिया गया, रिश्तू रोते-रोते हुए गया पुराने मालिक के पास। पुराने मालिक ने कहा-मैं नये बेटों के मामले में कुछ नहीं कर सकता, पुरानी सेवाओं के बदले में मैं सिर्फ इतना कह सकता हूं कि आज रात का खाना मेरे घर ही खाकर जाना।
ऐसा सुनकर रिश्तू ने कहा मुझे अब शिक्षा मिली है कि समझदार बेटे अपने बाप को गोली देते हैं, जैसे नोटू ने आपको दी थी।
शिक्षाएं
- जिस तरह आत्मा एक शरीर छोड़कर दूसरे शरीर को पकड़ लेती है, उसी तरह से बास मौका आने पर एक भाई को छोड़कर दूसरे भाई को पकड़ लेता है। छूटा हुआ भाई अगर अपने लिए दूसरा जुगाड़ नहीं बना पाता, तो यह उसकी मूर्खता है, और मूर्खों का भला कर पाना उसी तरह से मुश्किल है, जिस तरह से नगर निगम के नल के पानी का आना।
- अगर औरंगजेब अपने बाप शाहजहां को गोली देकर उसे कैद करके सत्ता नहीं हथियाता, तो बताइए क्या औरंगजेब का नाम कोई इतिहास में जानता भी क्या।



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