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मान गये भाई कवि!!

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मान गये भाई कवि जी आपको. बड़े अजू्बे जीव हो. रात को जब सारा जग सो जाता है, घोर अंधेरा छा जाता है तब जागते हो. जब सारा घर दिन भर कामकाज करके, दुनियावी झंझावतों से जूझकर, थक हार के सो जाता है तब तुम सोकर उठते हो. लाईट भी नहीं जला सकते. नाकारों की कमाने वालों के सामने कहाँ चल पाती है. लाईट जलाओ तो सबसे डांट खाओ. तो अंधेरे कमरे में ही भटकते रहते हो. ज्यादा से ज्यादा छत पर चले गये. अब जब लाईट ही नहीं जला सकते तो अंधेरे में उजाले की किरण, आशा की किरण खोजते हो. सन्नाटों की आवाजें सुनते हो. जुगनुओं की जल बुझ निहारते हो. चाँद को देखकर कृदन करते हो. तन्हाई का रोना रोते हो. अरे भाई, इतनी रात रात में तन्हाई नहीं तो क्या तुम्हारी माशूका तुम्हारे साथ बैठी रहे. तुम्हें तो कुछ करना नहीं है. सूरज उगने तक तो तुम सो जाओगे. फिर दिन भर पलंग तोडो़गे. उसे तो दफ्तर जाना है. घर चलाना है. कविता तो खा कर जिंदा नहीं रहा जा सकता. उसके लिये अनाज, सब्जी, दूध-घी सब लगता है और उसके लिये चाहिये पैसा. वो तो उसको कमाना है. तुम्हें तो बस कविता करना है तो तन्हाई, अंधेरा, जुगनु ही न साथ देंगे!!


कविता तो खा कर जिंदा नहीं रहा जा सकता. उसके लिये अनाज, सब्जी, दूध-घी सब लगता है और उसके लिये चाहिये पैसा. वो तो उसको कमाना है. तुम्हें तो बस कविता करना है तो तन्हाई, अंधेरा, जुगनु ही न साथ देंगे!!

न प्रेमिका से मिलना न जुलना. मिलोगे भी कैसे, जब वो जागती है, तब तुम सोते हो. अक्सर तो उसे यह तक नहीं पता चल पाता कि तुम उसे चाहते हो. तुम तो बस रात रात भर रोते रहो और आंसूओं की बरसात में भींग भींग कर गम के तराने रचो और सुबह होते ही उनका तकिया लगा कर सो जाओ. फिर उसकी शादी कहीं और हो जाये. तुम्हें बेवफाई के नये मैटर मिल जायें और तुम फिर शुरु हो जाओ इस पर लिखने को. क्या कमाल की चीज हो यार!!.

मकान है बड़के नाले के पास. शहर भर की बजबजाती गंदगी उसमें ठहरी हुई. दुर्गंध ही दुर्गंध. घर के पिछवाड़े मुहल्ले भर के कचरे का ढ़ेर और तुम रात में खिड़की पर बैठे, मन की उड़ान में बिना टिकिट सवारी करते, उपवन में टहलते हो. फूलों में महक खोजते हो. फिजाओं में उसके बदन की खुशबू तलाशते हो. अगर उसके बदन से केवड़े की खुशबू भी उठे न, तो भी हवाओं के संग तुम्हारे दर पर पहुँचने के लिये नाला पार करते करते सिवाय कचरे की सड़ांध के तुम्हारे नथूनों में कुछ नहीं पहुँचेगा. और तो और, दरवाजे पर आहट हो तो कहते हो शायद हवाओं ने खटखटाया होगा. अब इतनी रात गये और कौन खटखटायेगा? चोर तो खटखटा कर आता नहीं और आता भी होगा तो तुम्हारे यहाँ क्यूँ आयेगा. वो भी जानता है तुम कवि हो. फक्कड़ दीन के यहाँ कैसी चोरी. आज तक का पुलिस इतिहास उठा कर देख लो अगर किसी कवि के यहाँ चोरी हुई हो तो.

अब इतनी रात गये और कौन खटखटायेगा? चोर तो खटखटा कर आता नहीं और आता भी होगा तो तुम्हारे यहाँ क्यूँ आयेगा. वो भी जानता है तुम कवि हो. फक्कड़ दीन के यहाँ कैसी चोरी. आज तक का पुलिस इतिहास उठा कर देख लो अगर किसी कवि के यहाँ चोरी हुई हो तो.


और हाँ, अपना पहनावा और लुक वगैरह भी ठीक करो यार. कभी कदा जो देर शाम सामने ठेले तक चाय पीने निकलते भी हो तो वही खद्दरिया कुर्ता पैजामा, चट चट करती बाटा की स्लीपर, काले मोटे फ्रेम का चश्मा, रफ लुक दाढ़ी और उस पर से कँधे से झूलता वो कपड़े का झोला. चाय भी पिओगे तो काली- नींबू डालकर, उस पर से नम आँखें, बुझा चेहरा, जली सिगरेट- कौन देखेगा यार तुमको. उन्हें तो बेवफा कहलाने में ही फक्र होगा.

आज अपनी एक रचना देख कर लगा कि शायद ऐसे ही किसी माहौल में अटके हमने भी कभी यह कविता रची होगी, आप भी सुनें:

लिखता हूँ बस अब लिखने को
लिखने जैसी बात नहीं है
सोचा समय बिताऊँ कैसे
कटने वाली रात नहीं है

यादों का मेला भरता है
मैं तो फिर भी तन्हा हूँ
बेहोशी में सिमटा सिमटा
डर कर खुद से सहमा हूँ

हैं बेबस सब प्यार के मारे
सब के यह ज़ज्बात नहीं है
लिखता हूँ बस अब लिखने को
लिखने जैसी बात नहीं है

गिनता जाता हूँ मैं अपनी
आती जाती इन सांसों को
नहीं भूला पाता हूँ फिर भी
प्यार भरी उन बातों को

आँखों से गिरती जाती जो
थमती वो बरसात नहीं है
लिखता हूँ बस अब लिखने को
लिखने जैसी बात नहीं है.

--समीर लाल ‘समीर’

नोट: यह सिर्फ मौज-मस्ती के लिये है. कृप्या कोई आहत न हो!!

साभार: http://udantashtari.blogspot.com/2007/04/blog-post_06.html

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